वह अपनी बातें ‘दलीलों’ और ‘रिसर्च’ के हवाले से रखने की कोशिश करता, ताकि सामने वाला सवाल न उठा सके। अक्सर वह अपने साथियों से कहता, “यह दीन का काम है, इसमें सवाल उठाना ठीक नहीं। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद उसके भीतर सुरक्षा बलों के प्रति गहरी नफरत पनपी और उसी नफरत ने उसे बड़े आतंकी हमले की

दिल्ली के लाल किले के पास हुए कार बम धमाके की जांच ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने हैरान कर देने वाली तस्वीर रख दी है। जांच में साफ हुआ है कि यह धमाका अधकचरे आईईडी टाइमर मैकेनिज्म के जरिए किया गया था, जिसे बेहद आम और आसानी से मिल जाने वाली चीज़ों से तैयार किया गया था। शुरूआती जांच में जो विस्फोटक बरामद हुए, उनकी फॉरेंसिक तुलना से यह भी पुख्ता हो गया कि फरीदाबाद से मिला बम और लाल किले के पास फटाया गया बम, दोनों एक ही तरह के थे। इसी कड़ी ने जांचकर्ताओं को इस पूरे मॉड्यूल के मास्टरमाइंड डॉक्टर उमर मोहम्मद तक पहुंचाया, जिसकी अब मौत हो चुकी है।
जांच का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि यह पूरा मॉड्यूल आपस में बातचीत के लिए चीनी भाषा का इस्तेमाल करता था। गिरफ्त में आए आतंकियों के कबूलनामे के अनुसार, उमर ने महज़ छह महीने में चाइनीज़ सीख ली थी। इसके बाद उसने एक सीक्रेट ग्रुप बनाया, जिसका नाम भी चीनी भाषा में था और उसमें होने वाली सारी चैट भी इसी भाषा में होती थी।
इस ग्रुप का एडमिन खुद उमर था। मॉड्यूल के बाकी सदस्य उससे और आपस में चीनी भाषा में ही बात करते थे, ताकि सुरक्षा एजेंसियां या किसी थर्ड पार्टी की नज़र पड़ने पर भी बातचीत की असल मंशा समझना मुश्किल हो जाए। यही वजह है कि जांच एजेंसियां अब इस ‘चीनी कनेक्शन’ को भी अलग से खंगाल रही हैं।डॉक्टर उमर अपने साथियों के बीच खुद को ‘अमीर’ कहता था – यानी ऐसा शख्स जो फैसले लेने वाला, सेनानी या फिर एक तरह का ‘कमांडर’ हो। उसे नौ से अधिक भाषाओं पर पकड़ थी – हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, फ़ारसी, अरबी, चीनी और फ़्रेंच जैसी भाषाएँ वह धाराप्रवाह समझता और बोलता था। गिरफ्तार आतंकी मुज्जमिल के मुताबिक, उमर का दिमाग बेहद तेज था। अगर वह दूसरे रास्ते चुनता तो न्यूक्लियर साइंटिस्ट बनने की क्षमता रखता था, लेकिन कट्टरपंथ ने उसे हिंसा और आतंकी रास्ते पर धकेल दिया। उमर मजहब के नाम पर अपने साथियों पर गहरा मानसिक दबाव बनाता था। वह अपनी बातें ‘दलीलों’ और ‘रिसर्च’ के हवाले से रखने की कोशिश करता, ताकि सामने वाला सवाल न उठा सके। अक्सर वह अपने साथियों से कहता, “यह दीन का काम है, इसमें सवाल उठाना ठीक नहीं। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद उसके भीतर सुरक्षा बलों के प्रति गहरी नफरत पनपी और उसी नफरत ने उसे बड़े आतंकी हमले की साजिश रचने की तरफ धकेला।
पुलिस और एजेंसियों के अनुसार, जुलाई 2023 में नूंह हिंसा और नासिर–जुनैद भिवानी हत्याकांड की घटनाओं ने उमर के ज़ेहन में और ज़हर घोल दिया। इसके बाद उसने एक बड़े और प्रभावी हमले की योजना पर गंभीरता से काम शुरू कर दिया। पूछताछ में सामने आया कि 2022 में श्रीनगर में उमर, मुज्जमिल, डॉक्टर अदील, डॉक्टर शाहीन और मुफ्ती इरफान पहली बार एक साथ आए। इसी मुलाकात से इस आतंकी मॉड्यूल की बुनियाद पड़ी और धीरे–धीरे इसका नेटवर्क फरीदाबाद और नूंह–मेवात तक फैलता चला गया। उमर और उसके साथी नूंह–मेवात इलाके से फर्टिलाइज़र और अन्य रसायन खरीदते थे। इन्हें अल-फलाह यूनिवर्सिटी के कमरों सहित कई ठिकानों पर जमा किया जाता था। चूंकि ये सभी पढ़े-लिखे डॉक्टर थे, इसलिए किसी को उन पर शक भी नहीं हुआ। उमर अपने कमरे में ही विस्फोटक तैयारियों की टेस्टिंग करता था और उसका सूटकेस हमेशा बम बनाने में उपयोग होने वाले सामान से भरा रहता था।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस मॉड्यूल का फंडिंग नेटवर्क पहले से तैयार था। डॉक्टर शाहीन के बैंक खाते से करीब 25 लाख रुपये आतंकी गतिविधियों और तैयारियों पर खर्च किए गए। उमर और मुज्जमिल अफ़गानिस्तान या सीरिया जाने की योजना बना चुके थे, जहाँ वे आगे ट्रेनिंग और ‘जिहादी फ्रंट’ से जुड़ने की तैयारी में थे। इससे पहले उमर तुर्की की यात्रा कर चुका था। वहीं उसने कुछ हैंडलर्स से मुलाकात की, जिनके असली नाम और पहचान उससे भी पूरी तरह साझा नहीं की गई थी – जो इस नेटवर्क की गुमनामी और परतदार संरचना को दिखाता है।
एजेंसियों के मुताबिक, योजना के अंतर्गत विस्फोटकों की बड़ी खेप जम्मू-कश्मीर ले जानी थी और वहां सुरक्षा बलों पर बड़े हमले की साजिश थी। लेकिन इस पूरी प्लानिंग को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शुरुआती स्तर पर ही झटका दे दिया। अक्टूबर के मध्य में पुलिस ने पोस्टर लगाने वाले दो युवकों और एक प्रिंटिंग प्रेस कर्मचारी को हिरासत में लिया। पूछताछ के दौरान मुफ्ती इरफान का नाम सामने आया। 18 अक्टूबर को जैसे ही इरफान गिरफ्तार हुआ, उसके मोबाइल फोन और चैट रिकॉर्ड ने पूरे मॉड्यूल के चेहरे खोल दिए। इन्हीं डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर फरीदाबाद से लगातार गिरफ्तारियों की कड़ी शुरू हुई और एक–एक कर ऑपरेशन ‘अमीर’ की पूरी साजिश सामने आती चली गई। एजेंसियों की अब तक की जांच स्पष्ट रूप से दिखाती है कि लाल किले के पास हुआ कार बम धमाका और फरीदाबाद में बरामद विस्फोटक, दोनों एक ही आतंकी नेटवर्क से जुड़े थे। तकनीकी और फॉरेंसिक विश्लेषण से यह स्थापित हो चुका है कि दोनों जगह इस्तेमाल विस्फोटक की प्रकृति और तैयारी का पैटर्न एक जैसा था।