सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर मामले में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया। अभिजीत दिपके ने कार्रवाई पर सवाल उठाए। जानिए पूरा मामला।

News Delhi: दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजे जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि आखिर उनका गुनाह क्या था—तिरंगा फहराना और देशभक्ति के नारे लगाना? दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि सरकार विरोध की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, दिल्ली पुलिस का पक्ष इससे अलग है। पुलिस के मुताबिक, दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई केवल तिरंगा फहराने के कारण नहीं, बल्कि जंतर-मंतर के प्रतिबंधित प्रदर्शन क्षेत्र में कथित तौर पर बिना अनुमति प्रवेश करने और पहले से भरे शांति बनाए रखने के बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन के आरोपों के आधार पर की गई है। News Delhi:
बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। इसके बाद दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया गया। पुलिस के अनुसार, यह कार्रवाई शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड की कथित अवहेलना और जंतर-मंतर क्षेत्र में बिना अनुमति प्रवेश करने के मामले से जुड़ी है। इस मामले में पार्टी से जुड़े अजिंक्य शिंदे को भी हिरासत में लिया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, शिंदे की रिहाई के लिए जमानत संबंधी औपचारिकताएं पूरी की जा रही थीं। दोनों नेताओं को जेल भेजे जाने से सीजेपी के समर्थकों और नेतृत्व के बीच नाराजगी बढ़ गई है। पार्टी इस कार्रवाई को अपने विरोध प्रदर्शन और असहमति जताने के अधिकार से जोड़कर देख रही है। News Delhi:
सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत के बाद अभिजीत दिपके ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि तिरंगा लहराने और देशभक्ति के नारे लगाने के लिए आखिर इतनी सख्त कार्रवाई क्यों की गई? दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए कहा कि विरोध की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे असहमति को कुचलने की कोशिश बताया और चुनौतीपूर्ण लहजे में अपनी नाराजगी जाहिर की। सीजेपी का कहना है कि उसके कार्यकर्ता लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने और चुनाव व्यवस्था से जुड़े मुद्दे पर जवाब मांगने के लिए जंतर-मंतर पहुंचे थे। वहीं, पुलिस का तर्क है कि प्रदर्शन के लिए निर्धारित नियमों और कानूनी प्रतिबंधों का पालन करना आवश्यक है।
इस पूरे विवाद की जड़ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की जगह और अनुमति से जुड़ी है। दिल्ली पुलिस ने हाल ही में जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया था। इसके बाद प्रदर्शनकारियों के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जैसे वैकल्पिक स्थलों का उल्लेख किया गया। मंगलवार, 13 अक्टूबर को सीजेपी के नेता सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ जंतर-मंतर क्षेत्र में पहुंचे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग पार कर क्षेत्र में प्रवेश किया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर नारेबाजी की। सीजेपी के नेताओं का दावा था कि वे अपने विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर वहां पहुंचे थे। प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराया गया और 'भारत माता की जय' सहित अन्य नारे लगाए गए। इसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। पुलिस की ओर से मामले में बिना अनुमति प्रवेश, निषेधाज्ञा के उल्लंघन, शांति बनाए रखने के बॉन्ड की कथित अवहेलना और सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया है। News Delhi:
सौरव दास और आशुतोष रांका को जेल भेजे जाने के बाद अभिजीत दिपके ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि किसी भी लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने और विरोध दर्ज कराने की जगह होनी चाहिए। सीजेपी इस कार्रवाई को केवल दो नेताओं की हिरासत का मामला नहीं, बल्कि विरोध प्रदर्शन के अधिकार से जुड़ा विवाद बता रही है। पार्टी की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी है कि उसके अनुसार जंतर-मंतर जैसे स्थान पर प्रदर्शन की उपलब्धता सीमित होने से सरकार तक अपनी बात पहुंचाना कठिन हो सकता है। हालांकि, किसी भी प्रदर्शन के अधिकार के साथ लागू कानूनी आदेशों और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े नियमों का सवाल भी जुड़ा होता है। इस मामले में पुलिस की कार्रवाई की वैधता और नेताओं की ओर से लगाए गए आरोपों का अंतिम आकलन संबंधित कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। News Delhi:
इस घटना ने दो अहम सवाल खड़े किए हैं। पहला, लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए नागरिकों को कितनी जगह और कितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए? दूसरा, जब किसी स्थान पर प्रदर्शन के लिए प्रतिबंध लागू हों, तो उन नियमों और नागरिकों के विरोध के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? तिरंगा राष्ट्रीय सम्मान और एकता का प्रतीक है। लेकिन इस मामले में कानूनी विवाद केवल झंडा फहराने तक सीमित नहीं है। पुलिस ने बिना अनुमति प्रवेश और बॉन्ड की कथित अवहेलना को कार्रवाई का आधार बताया है, जबकि सीजेपी का नेतृत्व इस कदम को विरोध की आवाज दबाने वाला बता रहा है। इसलिए इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए दोनों पक्षों के दावों, लागू आदेशों और न्यायिक प्रक्रिया को साथ रखकर देखना जरूरी है।
सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद अब इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई पर नजर रहेगी। सीजेपी की ओर से सरकार के खिलाफ आक्रामक बयानबाजी जारी रहने के संकेत हैं, लेकिन पार्टी आगे क्या कदम उठाएगी, इस बारे में किसी नए कार्यक्रम की आधिकारिक पुष्टि के बिना निश्चित दावा नहीं किया जा सकता। फिलहाल, जंतर-मंतर का प्रदर्शन, तिरंगा फहराने पर उठे सवाल और दो नेताओं को तिहाड़ जेल भेजे जाने की कार्रवाई राष्ट्रीय राजधानी में विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर नई बहस का विषय बन गई है। News Delhi:
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