दिल्ली-एनसीआर में जहरीली होती हवा के बीच सुप्रीम कोर्ट की एक अहम टिप्पणी ने प्रदूषण की लड़ाई को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने सरकार और प्रशासन के सामने कई सवाल रखे हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं, पराली और बच्चों की सेहत को लेकर सुनवाई में क्या-क्या बातें सामने आईं?

Delhi News : राजधानी दिल्ली और NCR में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा है कि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए केवल प्रतिबंध लगाना और बार-बार न्यायिक आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई को जन आंदोलन का रूप देना होगा, ताकि लोग खुद अपनी जिम्मेदारी समझें और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचें। 6 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि जब तक लोग खुद प्रदूषण की समस्या को नहीं समझेंगे और अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक प्रतिबंधों का प्रभाव सीमित रहेगा। उन्होंने चिंता जताई कि अदालत जितने अधिक आदेश जारी करेगी, उनके उल्लंघन की आशंका भी उतनी ही बढ़ सकती है। पीठ ने दिल्ली सरकार और संबंधित अधिकारियों से कहा कि स्थानीय पार्षदों को भी इस अभियान से जोड़ा जाए। उन्हें लोगों के बीच जाकर जागरूकता फैलानी चाहिए, ताकि दीपावली का त्योहार प्रदूषण बढ़ाए बिना मनाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं, जब दिल्ली की हवा लगातार जहरीली होती जा रही है। 6 नवंबर को राजधानी का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 382 दर्ज किया गया था, जो बहुत खराब श्रेणी में आता है। यह स्तर गंभीर श्रेणी की सीमा के बेहद करीब था। अदालत ने कहा कि नवंबर से अगले कई महीनों तक दिल्ली में प्रदूषण की समस्या बनी रह सकती है। ऐसे में केवल पुराने उपाय दोहराने के बजाय प्रभावी और नए समाधान तलाशने की जरूरत है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और NCR में वाहनों की बढ़ती संख्या तथा सड़कों पर लगने वाले लंबे जाम पर चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दिल्ली के साथ-साथ नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहरों में भी वाहनों की भीड़ और लगातार ट्रैफिक प्रदूषण की बड़ी वजह है। पीठ ने यह भी कहा कि लोगों को निजी वाहनों पर निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि सार्वजनिक परिवहन की सुविधाएं अभी पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने इस समस्या के समाधान के लिए बेहतर सार्वजनिक परिवहन और प्रभावी दीर्घकालिक योजनाओं की जरूरत पर जोर दिया।
सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र अपराजिता सिंह ने बताया कि पराली जलाने का दिल्ली के प्रदूषण में योगदान है, लेकिन वाहनों से निकलने वाला धुआं और स्थानीय प्रदूषण के स्रोत भी बड़ी समस्या हैं। उन्होंने 5 नवंबर के आंकड़ों के हवाले से पराली जलाने का योगदान करीब 14 प्रतिशत बताया। उन्होंने टोल प्लाजा पर वाहनों की लंबी कतारों, कूड़ा जलाने और औद्योगिक प्रदूषण जैसे मुद्दे भी उठाए। अदालत ने कहा कि प्रदूषण से निपटने के लिए अलग-अलग स्रोतों पर एक साथ काम करना होगा।
अदालत ने प्रदूषण का बच्चों की सेहत पर पड़ने वाले असर को भी गंभीरता से लिया। सुनवाई के दौरान दिल्ली में बच्चों के फेफड़ों की कार्यक्षमता से संबंधित एक अध्ययन का हवाला दिया गया। न्यायमित्र ने बताया कि 2012 के CPCB अध्ययन में दिल्ली के 43.5 प्रतिशत स्कूली बच्चों की फेफड़ों की कार्यक्षमता कम पाई गई थी। इस दौरान स्कूलों को बंद करने या ऑनलाइन कक्षाएं चलाने जैसे कदमों पर भी चर्चा हुई। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े फैसले विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक आधार पर लिए जाने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 अक्टूबर के आदेश में दिल्ली-NCR में प्रमाणित ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल को सीमित समय के लिए अनुमति दी थी। इसके तहत 4 से 6 नवंबर तक इनकी बिक्री की अनुमति थी। 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 बजे तथा रात 8 से 10 बजे तक पटाखे जलाने की अनुमति दी गई है। अदालत के आदेश के अनुसार, 9 नवंबर से दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध फिर से लागू होना है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों की ओर से प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दी गई। इसमें वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक प्रदूषण, कूड़ा जलाने और पराली प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित एजेंसियों की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर लेते हुए प्रदूषण नियंत्रण के उपायों के क्रियान्वयन की जानकारी मांगे जाने के संकेत दिए। दीपावली अवकाश के बाद इस मामले में आगे सुनवाई होनी है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल सरकार, प्रशासन और अदालतों तक सीमित नहीं रह सकती। आम लोगों को भी निजी वाहनों का सीमित इस्तेमाल, कूड़ा न जलाना, पटाखों से परहेज और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाने जैसे कदम उठाने होंगे। अदालत का जोर इस बात पर है कि प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई केवल सरकारी अभियान न रहकर हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी बने।
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