कैंसर की Rs. 2,700/- PTR वाली दवा का MRP Rs.27,000/- होने पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने दवाओं पर 16% मार्जिन के प्रस्ताव पर केंद्र से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।

New Delhi: देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया सुनवाई ने निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों में दवाओं की कीमतों तथा मरीजों से वसूली के तौर-तरीकों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। मामला केवल किसी एक दवा की कीमत का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें गंभीर बीमारी से जूझ रहा मरीज अस्पताल और दवा के बीच ऐसा फंस जाता है कि उसके पास कीमत पर सवाल उठाने का विकल्प लगभग समाप्त हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को कैंसर की एक दवा का उदाहरण सामने आने पर बेहद गंभीर चिंता जताई। कोर्ट के सामने बताया गया कि जिस दवा की Price to Retailer (PTR) करीब 2,700/- थी, उसी दवा का MRP करीब 27,000/- रखा गया था। यानी खुदरा कीमत और अस्पताल/मरीज तक पहुंचने वाली कीमत के बीच करीब दस गुना का अंतर। कोर्ट ने इस तरह की स्थिति को बेहद तीखे शब्दों में “carnage” यानी कत्लेआम बताया और यह सवाल उठाया कि आखिर इतनी बड़ी रकम का लाभ किसे मिल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता शामिल थे। अदालत दवाओं की कीमत, जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल और मेडिकल डिवाइस से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने उस उदाहरण पर गंभीर सवाल उठाया जिसमें करीब 2,700 की PTR वाली कैंसर की दवा का MRP 27,000 था। अदालत ने यह भी पूछा कि दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों होना चाहिए और इसके पीछे जाने वाली अतिरिक्त रकम आखिर किसके पास पहुंचती है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कैंसर जैसी बीमारी में दवा मरीज के लिए कोई वैकल्पिक वस्तु नहीं होती। डॉक्टर ने दवा लिख दी तो मरीज के परिवार के सामने उसे खरीदना लगभग मजबूरी बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने केवल MRP और PTR के अंतर पर ही सवाल नहीं उठाया। अदालत ने इस बात को भी गंभीरता से लिया कि कई कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल की अपनी फार्मेसी या किसी निर्धारित मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने के लिए कहा जाता है। अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि यदि मरीज बाहर से वही दवा खरीदकर लाता है तो कुछ अस्पताल इलाज की जिम्मेदारी लेने में आनाकानी करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस व्यवस्था की भी जांच करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का संदर्भ देते हुए कहा कि यदि किसी सरकारी योजना के तहत मरीज का इलाज हो रहा है और बढ़ी हुई कीमत वाली दवा की लागत का भुगतान सरकारी व्यवस्था से होता है, तो अंततः इसका बोझ करदाताओं पर पड़ता है। यानी सवाल दोहरा है— मरीज से ज्यादा पैसा लिया जा रहा है तो उसकी जेब पर बोझ पड़ता है और सरकारी योजना के तहत वही ऊंची कीमत चुकाई जाती है तो सार्वजनिक धन पर बोझ पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि दवाओं पर एक समान व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती और क्या सभी दवाओं के लिए MRP को PTR से 16 प्रतिशत तक के मार्जिन के आधार पर सीमित करने पर विचार नहीं किया जा सकता। यह ध्यान रखना जरूरी है कि 16 प्रतिशत की व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल/विचार रखा है; यह अभी अंतिम फैसला या लागू किया गया नया नियम नहीं है। केंद्र सरकार को इस विषय पर विचार करके जवाब देना है और मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध की गई है।
यहां सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का असली महत्व सामने आता है। अदालत ने निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में अत्यधिक व्यावसायीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए सवाल किया कि कॉरपोरेट अस्पतालों का संचालन सेवा के रूप में हो रहा है या उद्योग की तरह। एक रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने टिप्पणी की कि कॉरपोरेट अस्पताल उद्योग की तरह व्यवहार कर रहे हैं और सवाल उठाया कि आम आदमी को इसका खामियाजा क्यों भुगतना चाहिए। लेकिन इसे देश के हर निजी अस्पताल पर आरोप के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की चिंता उन कथित मूल्य निर्धारण और बिक्री प्रथाओं को लेकर है जिन पर सुनवाई में सवाल उठाए गए हैं। कैंसर, हृदय रोग, किडनी और दूसरी गंभीर बीमारियों के मरीजों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि इलाज टाला नहीं जा सकता। सामान्य बाजार में ग्राहक महंगी वस्तु खरीदने से इनकार कर सकता है, लेकिन गंभीर बीमारी में मरीज के परिवार के पास ऐसा विकल्प बहुत सीमित होता है। यही कारण है कि दवाओं की कीमत में असामान्य अंतर का सवाल केवल व्यापारिक मार्जिन का सवाल नहीं रह जाता। यह मरीज के अधिकार, पारदर्शिता और स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसे का सवाल बन जाता है।
अदालत ने इसी बिंदु को सीधे उठाया कि यदि किसी दवा की PTR लगभग 2,700 है और उसका MRP 27,000 है तो बीच की इतनी बड़ी राशि आखिर किसे मिलती है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मामले पर अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा। रिपोर्टों के मुताबिक केंद्र ने यह भी संकेत दिया कि समस्या का ऐसा समाधान तलाशना होगा जिसमें सभी पक्षों के हितों का संतुलन हो।
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने अभी अंतिम रूप से यह घोषित नहीं किया है कि सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत मार्जिन लागू होगा या निजी अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था पर क्या नई कानूनी व्यवस्था बनेगी।
लेकिन इस सुनवाई ने एक बेहद महत्वपूर्ण बहस को देश के सामने ला दिया है—
क्या जीवन बचाने वाली दवा को सामान्य कारोबारी उत्पाद की तरह देखा जा सकता है?
और अगर किसी दवा की कीमत मरीज के लिए दस गुना तक बढ़ जाती है, तो उस अतिरिक्त बोझ की जिम्मेदारी किसकी होगी?
12 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में केंद्र सरकार का जवाब इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।
मरीज जब अस्पताल पहुंचता है तो वह मुनाफे का ग्राहक नहीं, इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचा इंसान होता है। यदि किसी जीवन रक्षक दवा की कीमत खरीद मूल्य से कई गुना बढ़ती है, मरीज को उसी अस्पताल की फार्मेसी से खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है और सरकारी योजना में भी उसी बढ़ी हुई कीमत का भुगतान होता है, तो इस पूरी व्यवस्था की पारदर्शी जांच जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस मुद्दे को ‘कत्लेआम’ जैसे बेहद कठोर शब्दों में उठाया है, वह अब केवल अदालत की फाइल में बंद रहने वाला मामला नहीं है। यह देश के करोड़ों मरीजों और उनके परिवारों के स्वास्थ्य खर्च से जुड़ा सवाल बन चुका है।
विज्ञापन