धर्म आधारित राजनीति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी : 'जातिगत राजनीति भी खतरनाक', एआईएमआईएम की मान्यता रद करने की याचिका खारिज
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 11:03 PM
Delhi News : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलिमीन (एआईएमआईएम) की मान्यता रद करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता तिरुपति नरसिंहा मुरारी ने आरोप लगाया था कि एआईएमआईएम धार्मिक आधार पर वोट मांगती है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एआईएमआईएम का संविधान भारतीय संविधान का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि अल्पसंख्यकों को दिए गए संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की बात करता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसी समुदाय के अधिकारों के लिए काम करना असंवैधानिक नहीं माना जा सकता, जब तक वह संविधान की सीमाओं में हो।
'जातिगत भावनाएं भी खतरनाक'
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा जातिगत भावनाओं को भुनाने पर भी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा, "कुछ दल ऐसे भी हैं जो पूरी तरह जातियों पर आधारित राजनीति करते हैं, और यह भी उतना ही खतरनाक है जितना धर्म आधारित राजनीति।" कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह किसी विशेष दल को निशाना बनाने की बजाय व्यापक राजनीतिक सुधारों की मांग करते हुए एक नई याचिका दाखिल कर सकता है।
शिक्षा देना अपराध नहीं
एआईएमआईएम के खिलाफ पेश वकील विष्णु जैन ने दलील दी कि पार्टी इस्लामिक शिक्षा को बढ़ावा देती है, और यदि कोई हिंदू आधारित पार्टी वेदों की शिक्षा दे, तो उसे रोक दिया जाता है। इस पर अदालत ने कहा, कोई भी धार्मिक ग्रंथ या साहित्य पढ़ना या पढ़ाना कानून के खिलाफ नहीं है, बशर्ते वह संविधान की मयार्दाओं के भीतर हो। जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग किसी धार्मिक सामग्री पर आपत्ति जताता है, तो उसके लिए विधिक मंच मौजूद हैं।
सिर्फ मुसलमानों की एकता क्यों?, कोर्ट का संतुलित जवाब
जब वकील जैन ने सवाल उठाया कि एआईएमआईएम केवल मुसलमानों की एकता की बात क्यों करती है, तो कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 1989 के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान में अल्पसंख्यकों को अपने अधिकारों की रक्षा करने की अनुमति है। सुप्रीम कोर्ट ने अंतत: कहा कि एआईएमआईएम का घोषणापत्र और संविधान भारतीय संविधान के दायरे में हैं, और याचिका खारिज कर दी गई। इस फैसले से स्पष्ट संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट न केवल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों की रक्षा को प्राथमिकता देता है, बल्कि यह भी चाहता है कि सुधार की मांगें राजनीतिक तौर पर निष्पक्ष और संवैधानिक मयार्दाओं में हों। अदालत ने जाति और धर्म आधारित राजनीति को समान रूप से गंभीर मानते हुए, समावेशी राजनीति की जरूरत पर बल दिया।