उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक विज्ञप्ति के बाद प्रभावी हुई। उन्होंने विनय कुमार सक्सेना की जगह ली है, जिन्हें अब लद्दाख का उपराज्यपाल बनाया गया है। संधू की तैनाती ऐसे समय में हुई है, जब दिल्ली की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।

Delhi News : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को नया उपराज्यपाल मिल गया है। भारत के पूर्व राजनयिक और अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत तरणजीत सिंह संधू ने बुधवार, 11 मार्च 2026 को दिल्ली के नए उपराज्यपाल के रूप में शपथ ली। उनकी नियुक्ति के साथ ही विनय कुमार सक्सेना का कार्यकाल समाप्त हुआ और उन्हें लद्दाख का उपराज्यपाल बनाया गया है। उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक विज्ञप्ति के बाद प्रभावी हुई। उन्होंने विनय कुमार सक्सेना की जगह ली है, जिन्हें अब लद्दाख का उपराज्यपाल बनाया गया है। संधू की तैनाती ऐसे समय में हुई है, जब दिल्ली की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। आबकारी नीति मामले में निचली अदालत ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को डिस्चार्ज किया था, लेकिन इस आदेश को CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, और हाईकोर्ट ने मामले से जुड़ी कुछ टिप्पणियों पर अंतरिम राहत भी दी है। ऐसे में नए एलजी की नियुक्ति को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
तरणजीत सिंह संधू भारतीय विदेश सेवा के 1988 बैच के अधिकारी रहे हैं और उन्हें देश के अनुभवी कूटनीतिज्ञों में गिना जाता है। उन्होंने फरवरी 2020 से जनवरी 2024 तक अमेरिका में भारत के राजदूत के रूप में जिम्मेदारी निभाई। इससे पहले वे श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त और फ्रैंकफर्ट में महावाणिज्य दूत जैसे अहम पदों पर भी रह चुके हैं। लंबे राजनयिक अनुभव के कारण उनकी पहचान एक संतुलित, सधे हुए और परिणामोन्मुख अधिकारी के रूप में रही है।
दिल्ली के नए उपराज्यपाल की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी बेहद मजबूत मानी जाती है। तरणजीत सिंह संधू ने अपनी शुरुआती पढ़ाई द लॉरेंस स्कूल, सनावर से की। इसके बाद उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से इतिहास (ऑनर्स) में स्नातक किया। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का रुख किया, जहां से उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। यानी प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालने जा रहे इस नए चेहरे के पास अकादमिक मजबूती के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मामलों की गहरी समझ भी है।
तरणजीत सिंह संधू की नियुक्ति को केवल एक नियमित प्रशासनिक बदलाव मानना शायद जल्दबाजी होगी। दिल्ली देश की राजधानी है, जहां न सिर्फ केंद्र सरकार का राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा सक्रिय रहता है, बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी दूतावास, वैश्विक एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहते हैं। ऐसे में संधू जैसा अनुभवी कूटनीतिज्ञ राजधानी के लिए केंद्र की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। विनय कुमार सक्सेना के कार्यकाल में आम आदमी पार्टी सरकार और उपराज्यपाल कार्यालय के बीच कई मुद्दों पर तीखा टकराव देखने को मिला था। फाइलों की मंजूरी से लेकर प्रशासनिक अधिकारों तक, कई बार दिल्ली की राजनीति सीधे राज निवास बनाम निर्वाचित सरकार की लड़ाई में बदलती नजर आई। अब जबकि दिल्ली की सत्ता में भाजपा की सरकार है और रेखा गुप्ता मुख्यमंत्री हैं, ऐसे में केंद्र शायद एक ऐसे एलजी पर दांव लगाना चाहता है जो टकराव की जगह संस्थागत नियंत्रण और संतुलित प्रशासन पर जोर दे सके।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तरणजीत सिंह संधू की नियुक्ति से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं? इसका सीधा और तात्कालिक जवाब देना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि संधू नियम, प्रक्रिया और प्रशासनिक अनुशासन को गंभीरता से लेने वाले अधिकारी माने जाते हैं। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी अब दिल्ली की सत्ता में नहीं, बल्कि विपक्ष की भूमिका में है। ऐसे में उसकी राजनीति का बड़ा हिस्सा सरकार और प्रशासन की जवाबदेही पर टिका रहेगा। यहीं पर संधू की भूमिका अहम हो जाती है। अगर वे फाइल-स्तर पर कड़ाई, विकास परियोजनाओं की सख्त मॉनिटरिंग, कानून-व्यवस्था, प्रदूषण, यमुना सफाई और पुराने भ्रष्टाचार मामलों में सक्रिय रवैया अपनाते हैं, तो इसका राजनीतिक दबाव विपक्ष पर पड़ना तय है। खासकर तब, जब आबकारी नीति केस अभी कानूनी रूप से पूरी तरह बंद नहीं हुआ है और हाईकोर्ट में सुनवाई जारी है। हालांकि एक दूसरा पक्ष भी है। चूंकि अब दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच वैचारिक दूरी पहले जैसी नहीं है, इसलिए एलजी और सरकार के बीच पहले वाला टकराव कम होने की संभावना है। इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले दिनों में राजनीतिक घमासान का केंद्र सरकार बनाम एलजी नहीं, बल्कि सरकार बनाम विपक्ष हो सकता है। इस स्थिति में आम आदमी पार्टी के लिए नई चुनौती यह होगी कि वह प्रशासनिक सख्ती को राजनीतिक मुद्दा कैसे बनाती है। Delhi News