खास तौर पर CO की स्थिति सबसे खराब पाई गई, जो मुख्य रूप से गाड़ियों से ही निकलती है। इन 59 दिनों के डेटा से पता चला कि दिल्ली के 22 मॉनिटरिंग स्टेशनों पर CO का स्तर 30 से ज़्यादा दिनों तक मानक सीमा से ऊपर रहा। वहीं, हवा में मौजूद PM2.5 धीरे–धीरे जमा होकर हालात को और बिगाड़ता रहा।

Delhi Pollution: दिल्ली–एनसीआर में ठंड की दस्तक के साथ ही एक बार फिर ज़हर घुली हवा लोगों की सांसों पर भारी पड़ने लगी है। सुबह होते ही घना स्मॉग सड़कों और कॉलोनियों पर चादर की तरह फैल जाता है, कई इलाकों में विज़िबिलिटी 50 मीटर से भी कम रह जाती है। कागज़ों पर भले ही ‘पीक पॉल्यूशन’ पिछले कुछ सालों की तुलना में थोड़ा नीचे दिख रहा हो, लेकिन औसत प्रदूषण स्तर लगभग वहीं का वहीं है यानी आम लोगों को राहत जैसी कोई स्थिति नहीं बन पाई है। यही वजह है कि अब एक बड़ा सवाल फिर सामने है दिल्ली की हवा को रोज़ कौन जहरीला बना रहा है? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की ताज़ा रिपोर्ट ने इस सवाल का जवाब काफी हद तक साफ कर दिया है।
CSE की ओर से सोमवार को जारी की गई इस रिपोर्ट में 1 अक्टूबर से 15 नवंबर तक यानी 59 दिनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक रोज़ाना बढ़ते प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान सड़कों पर दौड़ते वाहनों से निकलने वाले धुएं का है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) जैसे गैसियस पॉल्यूटेंट कई इलाकों में सुरक्षित सीमा से लगातार ऊपर दर्ज किए गए। खास तौर पर CO की स्थिति सबसे खराब पाई गई, जो मुख्य रूप से गाड़ियों से ही निकलती है। इन 59 दिनों के डेटा से पता चला कि दिल्ली के 22 मॉनिटरिंग स्टेशनों पर CO का स्तर 30 से ज़्यादा दिनों तक मानक सीमा से ऊपर रहा। वहीं, हवा में मौजूद PM2.5 धीरे–धीरे जमा होकर हालात को और बिगाड़ता रहा।
स्टडी के मुताबिक, द्वारका सेक्टर–8 सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में सबसे ऊपर रहा। यहां CO का स्तर लगातार 55 दिनों तक मानक सीमा से ऊपर दर्ज किया गया।
इसके बाद जहांगीरपुरी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस जैसे इलाकों में भी हालात बेहतर नहीं दिखे, जहां लगभग 50 दिनों तक नियमों की खुली धज्जियां उड़ती रहीं।
सबसे चिंता बढ़ाने वाली बात ये सामने आई कि सुबह 7–10 बजे और शाम 6–9 बजे के बीच, यानी ऑफ़िस–स्कूल टाइम और दफ्तर से लौटने के समय, PM2.5 और NO₂ दोनों के स्तर एक साथ ऊपर जाते और नीचे आते दिखे। यह सीधा संकेत है कि ट्रैफिक जाम और वाहनों की आवाजाही का प्रदूषण पर तत्काल और गहरा असर पड़ रहा है।
रिपोर्ट में दर्ज पैटर्न बताता है कि रोजाना का प्रदूषण लगभग सभी जगहों पर एक जैसा ट्रेंड दिखा रहा है, जिससे साफ है कि दैनिक पॉल्यूशन का बड़ा हिस्सा ट्रैफिक जनित है।
सर्दियों में जब हवा ज़मीन के क़रीब ‘फंस’ जाती है और ऊपर उठ नहीं पाती, तब वाहन, इंडस्ट्री और दूसरे स्रोतों से निकलने वाला धुआं ऊंचाई पर फैलने के बजाय शहर के ऊपर ही चादर बनाकर लटक जाता है। इसी वजह से स्मॉग की परतें मोटी होती जाती हैं और हवा और जहरीली लगने लगती है। CSE की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता रॉयचौधरी का कहना है कि अलग–अलग गैस और पार्टिकुलेट पॉल्यूटेंट मिलकर एक खतरनाक कॉकटेल तैयार कर रहे हैं, जो सांसों पर सीधा वार कर रहा है। पूर्व एयर लैब प्रमुख दीपांकर साहा भी मानते हैं कि वाहन और ट्रैफिक जाम पूरे साल प्रदूषण फैलाते हैं, लेकिन सर्दी के मौसम में इनका असर दोगुना हो जाता है। खासकर बड़े चौराहों और ट्रैफिक सिग्नल के आसपास जहरीली हवा का घेरा और घना हो जाता है। रिपोर्ट इस बात की भी सख्त चेतावनी देती है कि जब चर्चा केवल पराली जलाने या धूल नियंत्रण तक सीमित रह जाती है, तो रोजाना ट्रैफिक से निकलने वाला प्रदूषण नज़रअंदाज हो जाता है। हर साल सर्दियों में धूल कंट्रोल, पानी का छिड़काव और पराली पर राजनीति सुर्खियों में रहती है, लेकिन वाहन, इंडस्ट्री, कचरा जलाना और ठोस ईंधन जैसे बड़े स्रोतों पर वैसी सख्ती और गंभीरता नहीं दिखती, जिसकी ज़रूरत है।
CSE ने साफ सुझाव दिया है कि अगर दिल्ली–एनसीआर की हवा को सच में बचाना है, तो ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर कड़ी नीति और तेज़ कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता।
रिपोर्ट में सुझाए गए कुछ बड़े उपाय: