
Gulzar ji[/caption]
Gulzar Birthday Special: उस किताब को पढ़कर मेरे जीवन की दिशा ही बदल गई। वो किताब गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर की किताब का उर्दू अनुवाद थी। उसके बाद मैंने रविन्द्र नाथ टैगोर जी को पढ़ना शुरू किया और मेरी सोच बदल गई। मैंने फिर पढ़ने के अलावा लिखना भी शुरू कर दिया।
जब घर पर ये बात पता चली, तो पिताजी गुस्सा हुए और बोले "लिखने का शौक पालोगे, तो लंगर में खाना खाने की नौबत आ जाएगी।" लेकिन गुलज़ार जी (Gulzar) कहाँ मानने वाले थे। वो चोरी छिपे गुलज़ार दीनवी के नाम से लिखने लगे। इसके बाद वो मुंबई आ गए, पारिवारिक जरूरतों ने उन्हें मुंबई के वायकुला में एक गैराज का रास्ता दिखा दिया।
जहाँ वो एक्सीडेंट में चोट खाई गाड़ियों को फिट करने का और रंगने का काम करते थे। लेकिन समय मिलते ही वो दिलों के जख्मों को सही करने और जीवन दर्शन के रंग में अपनी रचनाओं को रंगने के काम में लग जाते। उन्होंने कठोर परिश्रम किया और अपने लिखने के हुनर को मरने नहीं दिया, उसे जिंदा रखा।