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“किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार…” फिल्म आनाड़ी का यह गीत आप सभी ने अपने अपने मोबाइल फोन, टीवी, रेडियो या अन्य माध्यमों के जरिए सुना होगा। लेकिन क्या आप इस गीत के रचियता से वाकिफ है।

Bollywood News : “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार…” फिल्म आनाड़ी का यह गीत आप सभी ने अपने अपने मोबाइल फोन, टीवी, रेडियो या अन्य माध्यमों के जरिए सुना होगा। लेकिन क्या आप इस गीत के रचियता से वाकिफ है। बॉलीवुड के इस महान गीत के रचियता अच्छे -अच्छे फिल्मी दर्शको को भी नहीं पता है और ना ही इस गीत के रचियता के प्रारंभिक जीवन के बारे में किसी को पता होगा। इस महान गीत के रचियता का नाम शैलेन्द्र था। शैलेन्द्र का वास्तविक जीवन भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। आपको बता दें कि इस अमर गीत के रचयिता शैलेंद्र ने पारंपरिक साहित्यिक या उच्च अकादमिक शिक्षा का लंबा सफर तय नहीं किया था। इंटरमीडिएट तक पढ़ाई के बाद उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा और वेल्डिंग में विशेषज्ञता हासिल की, लेकिन असली सीख उन्होंने किताबों से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों और अपने भीतर की संवेदनशीलता से पाई। मशीनों के बीच काम करते हुए भी उनका मन शब्दों की दुनिया रचता रहा, जिसने आगे चलकर हिंदी सिनेमा को कुछ सबसे यादगार गीत दिए।
शैलेंद्र हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया का वह नाम हैं, जिनके लिखे गीत आज भी लोगों की जुबान पर आसानी से बस जाते हैं। “प्यार हुआ इकरार हुआ”, “आवारा हूं” और “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार” जैसे अमर गीत इसी बात की मिसाल हैं। कम ही लोग जानते हैं कि शैलेंद्र का जन्म 1923 में तत्कालीन रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। हालांकि उनका पारिवारिक रिश्ता बिहार के आरा से जुड़ा था। उनका असली नाम शंकरदास केसरीलाल था। उनके पिता ब्रिटिश मिलिट्री अस्पताल में ठेकेदार के रूप में कार्यरत थे। बाद में जीवन की परिस्थितियों ने उनके परिवार को कई जगहों से होकर गुजरने के लिए मजबूर किया। परिवार की आर्थिक परिस्थितियों ने शैलेंद्र के जीवन की दिशा बदल दी। रावलपिंडी से निकलकर उनका परिवार मथुरा आ बसा, जहां उन्होंने सरकारी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई में वे शुरू से ही मेधावी रहे और इंटरमीडिएट परीक्षा में उन्होंने उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान हासिल किया। बचपन से ही कविता लिखने का शौक उनके भीतर धीरे-धीरे साहित्य के प्रति गहरी रुचि में बदल गया। इस दौरान उन्होंने कई भाषाओं का भी अध्ययन किया, जिससे उनकी अभिव्यक्ति और समृद्ध होती गई। परिवार की जिम्मेदारियों के चलते शैलेंद्र ने रेलवे की परीक्षा पास की और मुंबई में मैकेनिक (अप्रेंटिस) के रूप में नौकरी शुरू की। यह काम उनके मन का नहीं था, लेकिन घर की जरूरतों ने उन्हें इसे स्वीकार करने पर मजबूर किया। नौकरी के साथ-साथ उनका लेखन जारी रहा और यही कविताएं उन्हें नाट्य जगत से जोड़ती चली गईं, जो आगे चलकर फिल्मी दुनिया तक पहुंचने का रास्ता बनीं।
महज 43 वर्ष की उम्र में शैलेंद्र ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी अमर हैं। फिल्मी दुनिया में उनकी और राज कपूर की दोस्ती बेहद गहरी मानी जाती है, और दोनों की जोड़ी ने कई यादगार गीत दिए। यह एक भावुक संयोग ही था कि शैलेंद्र का निधन 14 दिसंबर 1966 को हुआ, जो राज कपूर के जन्मदिन का दिन भी था। उनके जाने की खबर से फिल्म जगत स्तब्ध रह गया, और राज कपूर इस घटना से गहरे सदमे में चले गए। शैलेंद्र भले ही समय से पहले चले गए, लेकिन उनकी लिखी पंक्तियां आज भी भारतीय सिनेमा की आत्मा मानी जाती हैं। उनके कुछ अमर गीत इस प्रकार हैं “प्यार हुआ इकरार हुआ”, “मेरा जूता है जापानी”, “आवारा हूं”, “सब कुछ सीखा हमने”, “दोस्त-दोस्त ना रहा”, “रमैया वस्तावैया” और “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार”। इन गानों के जरिए उन्होंने दर्शको के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई
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