उनकी सैन्य कुशलता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने फर्जी नाम से हिजबुल मुजाहिदीन में घुसपैठ की, दुश्मन के बीच रहकर पाकिस्तान तक उनके नेटवर्क, ठिकानों और साज़िशों की अहम जानकारी जुटाई और वही जानकारी बाद में भारत की सुरक्षा की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई।

बॉलीवुड में इन दिनों जिस फिल्म ‘धुरंधर’ ने हलचल मचा रखी है। इसकी चर्चा सिर्फ सिनेमाहॉल तक सीमित नहीं, बल्कि आम लोगों की बातचीत से लेकर सोशल मीडिया की टाइमलाइन तक फैल चुकी है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह महज़ किसी लेखक की कल्पना नहीं, बल्कि एक सच्चे भारतीय वीर की ज़िंदगी से प्रेरित कहानी है। जी हाँ, ‘धुरंधर’ की जड़ में एक असली हीरो की धड़कती हुई दास्तान छिपी है। यह कहानी है पारा स्पेशल फोर्स के शूरवीर कमांडो मेजर मोहित शर्मा की है। वह अफसर, जो दुश्मनों के बीच घुसकर उनके मंसूबे तोड़ आता था और आख़िरी सांस तक मोर्चे पर डटा रहकर देश के लिए प्राण न्योछावर कर देता है। भारतीय सेना की इलीट यूनिट 1 पैरा (स्पेशल फोर्स) से जुड़े मेजर मोहित का नाम सुनते ही घाटी में बैठे आतंकी गिरोह खामोश हो जाते थे। साल 2009 में एक भीषण ऑपरेशन के दौरान उन्होंने अपने साथियों की जान बचाते हुए चार आतंकियों को ढेर कर दिया और वहीं रणभूमि पर अमर हो गए। उनकी सैन्य कुशलता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने फर्जी नाम से हिजबुल मुजाहिदीन में घुसपैठ की, दुश्मन के बीच रहकर पाकिस्तान तक उनके नेटवर्क, ठिकानों और साज़िशों की अहम जानकारी जुटाई और वही जानकारी बाद में भारत की सुरक्षा की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई।
हरियाणा के रोहतक की धरती पर जन्मे मेजर मोहित शर्मा बचपन से ही अनुशासन, मेहनत और लगन का दूसरा नाम माने जाते थे। उन्होंने पहले NDA से कड़े प्रशिक्षण की राह चुनी और फिर देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से पासआउट होकर सेना में अधिकारी बने। शुरुआत से ही उनकी पहचान ऐसे ऑफिसर की रही, जो दबाव भरे हालात में भी ठंडे दिमाग से फैसले लेते, क्षण भर में रणनीति बदल देते और अपनी शानदार फिजिकल फिटनेस से जवानों के लिए मिसाल बन जाते।भारतीय सेना की इलीट यूनिट 1 पैरा (स्पेशल फोर्स) में चयन अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, लेकिन मेजर मोहित ने यहां भी सिर्फ वर्दी नहीं, बल्कि अपने जज़्बे से अलग पहचान बनाई। वे उन चुनिंदा अफसरों में थे, जो हर बार सबसे ख़तरनाक और चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन के लिए खुद आगे बढ़कर “मुझे भेजिए” कहते थे। फ्रंट लाइन पर रहकर लीड करना, टीम को मोटिवेट रखना और खुद सबसे आगे गोलियों का सामना करना – यही अंदाज़ उन्हें बाकी सभी से अलग और सचमुच ‘धुरंधर’ बना देता था।
मेजर मोहित की वीरता की सबसे अनोखी मिसाल 2004 में दक्षिण कश्मीर के शोपियां में चलाया गया एक गोपनीय ऑपरेशन माना जाता है। इस मिशन के लिए उन्होंने सिर्फ वर्दी नहीं, बल्कि अपनी पूरी पहचान बदल डाली। वे आतंकियों की दुनिया में ‘इफ्तिखार भट्ट’ बनकर दाख़िल हुए घनी दाढ़ी, लंबे बाल, बदला हुआ लहजा और साथ में एक दर्द भरी कहानी कि उनके भाई को भारतीय सेना ने मार दिया है, अब वे बदला लेने के लिए हथियार उठाना चाहते हैं। इस नकली किरदार पर हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने भरोसा कर लिया और धीरे–धीरे उसे अपने नेटवर्क की अंदरूनी परतों तक पहुंच दे दी। इसी दौरान मेजर मोहित ने उनके ठिकानों, सप्लाई लाइनों, फंडिंग के सोर्स, संपर्कों और ऑपरेशन के तरीकों से जुड़ी कई अहम जानकारियां इकट्ठी कीं, जो बाद में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़े हथियार की तरह साबित हुईं। कहा जाता है कि इसी सिलसिले में वे पाकिस्तान की ज़मीन तक गए, आतंकियों के साथ बैठे, उनकी ही थाली में बिरयानी खाई, लेकिन मन में सिर्फ एक ही संकल्प था दुश्मन को उसके ही घर में घेरकर मात देनी है। जब हिजबुल के नेटवर्क को इस “इफ्तिखार” की असलियत पर शक हुआ तो उन्होंने जानलेवा हमला कर दिया। मगर उस घड़ी में भी मेजर मोहित पीछे हटने वाले नहीं थे। गोलियों की बरसात के बीच उन्होंने डटकर मुकाबला किया और हिजबुल के दो ख़तरनाक आतंकियों अबू तोरारा और अबू सब्ज़ार को मौत के घाट उतार दिया। बाद के सालों में हिजबुल मुजाहिदीन का कमजोर होता नेटवर्क यही बताता है कि मेजर मोहित जैसे गुप्त ऑपरेशनों ने आतंक के इस ताने–बाने को भीतर से कितनी मजबूती से हिला दिया था।
सीक्रेट ऑपरेशन के बाद भी मेजर मोहित को लगातार संवेदनशील मोर्चों पर तैनात किया जाता रहा। साल 2009 में उन्हें उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में आतंकियों के खिलाफ एक बेहद महत्वपूर्ण ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई। घने जंगलों और मुश्किल भूगोल वाले इस इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान वे दुश्मन के निशाने पर आ गए। उन्हें गोली लगी, लेकिन उन्होंने हथियार नहीं डाले। घायल होने के बावजूद वे मोर्चे पर डटे रहे और एक–एक कर चार आतंकियों को मार गिराया। इसी ऑपरेशन के दौरान उन्होंने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी अतुलनीय वीरता, अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के लिए मेजर मोहित शर्मा को वर्ष 2009 में मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया जो शांति काल में दिया जाने वाला भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान है।
भारतीय सिनेमा में जब भी वर्दी पहनने वाले असली हीरो की कहानियां पर्दे पर उतरी हैं, दर्शकों ने उन्हें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि दिल को छू जाने वाला अनुभव माना है। अब वही एहसास एक बार फिर जागने की तैयारी में है, क्योंकि चर्चा है कि फिल्म ‘धुरंधर’ में मेजर मोहित शर्मा की ज़िंदगी से प्रेरित कहानी दिखाई जा सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी ख़बर हैं कि इस फिल्म में रणवीर सिंह मेजर मोहित का किरदार निभा सकते हैं। अगर ये कास्टिंग हकीकत में बदलती है, तो ‘धुरंधर’ महज़ एक और थ्रिलर या एक्शन फिल्म नहीं रहेगी, बल्कि नई पीढ़ी के लिए जुनून, अनुशासन, त्याग और सच्ची देशभक्ति का चलता–फिरता पाठ बन सकती है – एक ऐसी कहानी, जो थिएटर से निकलने के बाद भी लंबे समय तक दिमाग और दिल दोनों में गूंजती रहेगी।