कोक स्टूडियो भारत के जरिए सामने आया यह गीत इन दिनों लोगों का ध्यान खींच रहा है लेकिन इसकी खासियत सिर्फ इसकी धुन नहीं है। इसके पीछे बनारस की लोक परंपरा और एक ऐसी प्रेम-विरह की कहानी जुड़ी है जिसे अलग-अलग स्रोतों में गौहर जान से जोड़ा जाता रहा है।

कभी-कभी कोई गीत सिर्फ कानों तक नहीं पहुंचता बल्कि सीधे किसी पुराने शहर की गलियों में ले जाता है। ‘कचौड़ी गली’ भी ऐसा ही गीत है। रेखा भारद्वाज और लोकगायक उत्पल उदित की आवाज में जब यह लोकधुन सुनाई देती है तो बनारस की गलियां, इंतजार और बिछड़ने का दर्द एक साथ महसूस होने लगता है। कोक स्टूडियो भारत के जरिए सामने आया यह गीत इन दिनों लोगों का ध्यान खींच रहा है लेकिन इसकी खासियत सिर्फ इसकी धुन नहीं है। इसके पीछे बनारस की लोक परंपरा और एक ऐसी प्रेम-विरह की कहानी जुड़ी है जिसे अलग-अलग स्रोतों में गौहर जान से जोड़ा जाता रहा है।
‘कचौड़ी गली’ नाम सुनते ही शायद आपके मन में बनारस की गरमा-गरम कचौड़ी और वहां की चहल-पहल का ख्याल आए लेकिन गीत की दुनिया इससे बिल्कुल अलग है। यहां खाने की खुशबू से ज्यादा जुदाई की कसक है। गीत की लोकधुन में एक ऐसे रिश्ते का दर्द सुनाई देता है जिसमें मिलने से ज्यादा इंतजार और बिछड़ने की कहानी है। इसी वजह से यह गाना सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे बनारस की किसी पुरानी गली में कोई अपने बिछड़े हुए साथी को याद कर रहा हो।
‘कचौड़ी गली’ की कहानी को बनारस की गौहर जान से जोड़ा जाता है। यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है कि यह वही गौहर जान नहीं हैं जिन्हें भारतीय ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के इतिहास की मशहूर कलाकार के तौर पर जाना जाता है। इस लोककथा में बनारस वाली गौहर जान का जिक्र मिलता है। लोककथा के अनुसार, गौहर जान दालमंडी इलाके में रहती थीं। कचौड़ी गली से गुजरते हुए उनकी नजर एक युवक पर पड़ी और वह उसके प्रति आकर्षित हो गईं। कुछ स्रोत इस युवक का नाम असलम बताते हैं जबकि दूसरी जगहों पर अलग नाम भी मिलते हैं।
कहानी में सबसे ज्यादा असर डालने वाली बात यही है कि यह मोहब्बत किसी बड़े इजहार से शुरू नहीं होती। न कोई लंबी मुलाकात, न कोई वादा और न ही साथ जीने का मौका। इसके बाद दूरी कहानी का हिस्सा बन जाती है। लोककथा के अलग-अलग संस्करणों में प्रेमी के मिर्जापुर जाने और फिर रंगून भेजे जाने का जिक्र मिलता है। इसी बिछड़ने की पीड़ा को गीत की पंक्तियों और धुन में महसूस किया जाता है। इस गीत को केवल एक अधूरी मोहब्बत की कहानी मानना भी पूरी तस्वीर नहीं देता। इसके साथ पलायन, युद्ध और अपनों से बिछड़ने का दर्द भी जोड़ा जाता है। लोकगीतों की खासियत ही यही रही है कि वे बड़े इतिहास को आम लोगों की जिंदगी के रास्ते सुनाते हैं। एक तरफ किसी व्यक्ति के दूर चले जाने का दुख है तो दूसरी तरफ उस दौर में घर से दूर भेजे गए लोगों और पीछे छूट गए परिवारों की पीड़ा भी दिखाई देती है।
समय बीतता गया लेकिन ‘कचौड़ी गली’ की लोकधुन गायब नहीं हुई। अलग-अलग कलाकारों ने इसे अपनी आवाज में गाया और बनारस की संगीत परंपरा में यह धुन बनी रही। रसूलन बाई, बड़ी मोतीबाई और सिद्धेश्वरी देवी जैसी गायिकाओं के जरिए भी इस तरह की लोकधुनें लोगों तक पहुंचीं। बाद में मालिनी अवस्थी और दूसरे कलाकारों ने भी इसकी परंपरा को आगे बढ़ाया।
‘कचौड़ी गली’ की कहानी में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम भी सामने आता है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने इस कजरी की धुन अपने कार्यक्रमों में बजाई थी और इसे बचपन से बनारस में सुना था। एक प्रस्तुति में उनके साथ इस गीत की धुन को लेकर डॉ. सोमा घोष का भी जिक्र मिलता है। आज ‘कचौड़ी गली’ को एक नया मंच मिला है। कोक स्टूडियो भारत ने रेखा भारद्वाज और उत्पल उदित की आवाज में इसे नए अंदाज में पेश किया है। इससे पुरानी लोकधुन को नई पीढ़ी सुन रही है और सोशल मीडिया पर भी इसके छोटे-छोटे हिस्से लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। रेखा भारद्वाज की आवाज गीत के दर्द को एक अलग रंग देती है जबकि उत्पल उदित की लोक गायकी इसकी मिट्टी से जुड़ी सादगी को बनाए रखती है।
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