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बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और लोक गायन में गहरी रुचि थी। यही रुचि आगे चलकर उनकी पहचान बन गई। अपनी मेहनत, अनोखी प्रस्तुति और दमदार आवाज के दम पर उन्होंने पंडवानी गायन को गांवों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।

छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में तड़के अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि एम्स प्रशासन ने की है। इस खबर के सामने आते ही कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। देशभर के कलाकार, साहित्यकार और उनके चाहने वाले उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, तीजन बाई पिछले कई सप्ताह से रायपुर AIIMS में भर्ती थीं। उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी और डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही थी। शनिवार देर रात उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और तड़के करीब 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में शोक का माहौल बन गया। लोक कला से जुड़े लोगों का कहना है कि तीजन बाई के जाने से भारतीय लोक संस्कृति ने अपनी सबसे बुलंद आवाजों में से एक को खो दिया है।
डॉ. तीजन बाई का जन्म वर्ष 1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। साधारण परिवार में जन्म लेने वाली तीजन बाई ने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया लेकिन उन्होंने कभी अपने सपनों को नहीं छोड़ा। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और लोक गायन में गहरी रुचि थी। यही रुचि आगे चलकर उनकी पहचान बन गई। अपनी मेहनत, अनोखी प्रस्तुति और दमदार आवाज के दम पर उन्होंने पंडवानी गायन को गांवों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। आज उन्हें भारत की सबसे महान लोक कलाकारों में गिना जाता है।
पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक पारंपरिक लोक गायन शैली है जिसमें महाभारत की कहानियों को गीत, संवाद और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इस कला में कलाकार केवल गाना ही नहीं गाता बल्कि अपने हाव-भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव और अभिनय से पूरी कहानी को जीवंत बना देता है। जो कलाकार इस शैली में महाभारत की कथाओं का मंच पर गायन और अभिनय करता है उसे पंडवानी गायिका या पंडवानी गायक कहा जाता है। तीजन बाई इस कला की सबसे प्रसिद्ध कलाकार थीं। उनकी प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली होती थी कि दर्शक खुद को महाभारत के दृश्य का हिस्सा महसूस करने लगते थे।
जब तीजन बाई ने पंडवानी गायन की शुरुआत की तब इस कला की एक खास शैली पर लगभग पूरी तरह पुरुष कलाकारों का वर्चस्व था। उस समय महिलाओं का इस तरह मंच पर आकर प्रस्तुति देना आसान नहीं माना जाता था। समाज के विरोध और कई तरह की मुश्किलों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और यह साबित किया कि प्रतिभा किसी भी परंपरा या सोच से बड़ी होती है। हाथ में तंबूरा लेकर उनकी जोशीली प्रस्तुति और दमदार अभिनय ने लाखों लोगों को अपना प्रशंसक बना लिया।
करीब पांच दशकों के लंबे सफर में तीजन बाई ने भारत के साथ-साथ एशिया, यूरोप और दुनिया के कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति दी। उन्होंने हर मंच पर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को सम्मान दिलाया। उनकी वजह से दुनिया के कई लोगों ने पहली बार पंडवानी जैसी अनोखी भारतीय लोक कला को जाना और समझा। उन्होंने सिर्फ एक कलाकार के रूप में नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की प्रतिनिधि बनकर देश का नाम रोशन किया।
लोक कला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें कई बड़े सम्मान दिए। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और बाद में पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। ये सम्मान केवल उनकी कला के लिए नहीं थे बल्कि भारतीय लोक संस्कृति को नई पहचान दिलाने में उनके योगदान की भी पहचान थे।
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