टॉक्सिक रिव्यू में जानिए यश की फिल्म की कहानी, एक्शन, कियारा आडवाणी का किरदार और 3 घंटे 15 मिनट लंबी फिल्म की खूबियां और कमियां।

यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक अ फेयरीटेल फॉर ग्रोन अप्स’ आखिरकार रिलीज हो चुकी है। ‘केजीएफ’ और ‘केजीएफ 2’ के बाद यश को एक बार फिर बड़े पर्दे पर एक बेहद दमदार और हिंसक किरदार में देखने का मौका मिला है। फिल्म का निर्देशन गीतू मोहनदास ने किया है। फिल्म में यश के साथ नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत, अक्षय ओबेरॉय, सुदेव नायर और डैरेल डी सिल्वा जैसे कलाकार नजर आते हैं।
करीब 3 घंटे 15 मिनट लंबी यह फिल्म पीरियड गैंगस्टर कहानी के साथ बदले, रिश्तों, अपराध और हिंसा की दुनिया को सामने रखती है। फिल्म का बजट 500 करोड़ रुपये से ज्यादा बताया गया है। ऐसे में ‘टॉक्सिक’ से दर्शकों की उम्मीदें पहले से ही काफी ज्यादा थीं। सवाल यही था कि क्या यश की स्टार पावर, बड़े एक्शन और शानदार लोकेशन इस कहानी को उतना असरदार बना पाते हैं, जितनी उम्मीद की गई थी।
‘टॉक्सिक’ की कहानी 1947 के गोवा से शुरू होती है और करीब 20 साल आगे तक जाती है। फिल्म की दुनिया अपराध, गैंगस्टर और भ्रष्ट ताकतों के इर्द गिर्द घूमती है। यश का किरदार राया इस दुनिया का एक खतरनाक चेहरा है। वह बेहद आक्रामक है और हिंसा उसके व्यक्तित्व का बड़ा हिस्सा दिखाई देती है।
फिल्म में राया के किरदार को एक ऐसे गैंगस्टर के तौर पर दिखाया गया है, जो अपनी परिस्थितियों की वजह से अपराध की दुनिया में पहुंचा है। फिल्म यह समझाने की कोशिश करती है कि वह जन्म से बुरा इंसान नहीं है। उसके पीछे परिवार, रिश्तों और उसके अतीत की कई परतें हैं। लेकिन इन भावनात्मक पहलुओं के मुकाबले फिल्म में एक्शन और हिंसा का हिस्सा काफी ज्यादा हावी हो जाता है।
फिल्म में यश का डबल रोल भी देखने को मिलता है। कहानी में परिवार और रिश्तों के साथ गैंगस्टर दुनिया का संघर्ष जुड़ा हुआ है। फिल्म का एक बड़ा हिस्सा राया के अपराध की दुनिया में आगे बढ़ने और उसके आसपास मौजूद लोगों से जुड़े घटनाक्रम पर आधारित है।
फिल्म का सबसे दिलचस्प डायलॉग है, “तुम्हें लगता है मैं बुरा आदमी हूं?” इसके जवाब में नादिया कहती है, “नहीं, मुझे लगता है तुम टॉक्सिक हो।” यही संवाद फिल्म के मुख्य किरदार को समझने की एक अहम कुंजी बन जाता है।
राया ऐसा किरदार है, जिसके लिए हिंसा जैसे जिंदगी का सामान्य हिस्सा है। फिल्म में गोलियां चलती हैं, हाथ-पैर टूटते हैं और लगातार मारकाट दिखाई जाती है। खून-खराबे के कई लंबे दृश्य फिल्म का हिस्सा हैं। एक्शन की मात्रा इतनी ज्यादा है कि कुछ समय बाद इन दृश्यों का असर कम होता हुआ महसूस होने लगता है।
फिल्म खुद को बड़ों के लिए फेयरीटेल कहती है, लेकिन इसकी दुनिया किसी खूबसूरत परी कथा से बिल्कुल अलग नजर आती है। यहां अपराध, हिंसा, शराब, नाइट क्लब और गैंगस्टर दुनिया का अंधेरा पक्ष ज्यादा दिखाई देता है। यही वजह है कि फिल्म के फेयरीटेल वाले विचार और उसकी हिंसक दुनिया के बीच बड़ा अंतर महसूस होता है।
‘टॉक्सिक’ में यश की मौजूदगी फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। राया के किरदार में उनका स्वैग साफ दिखाई देता है। उनके चलने, बोलने और एक्शन करने का अंदाज किरदार को एक अलग पहचान देता है। एक्शन दृश्यों में यश का आत्मविश्वास फिल्म को कई जगह मजबूत बनाता है।
हालांकि समस्या यह है कि कहानी के कमजोर हिस्सों पर भी फिल्म लगातार यश के स्टारडम और एक्शन पर निर्भर करती दिखाई देती है। एक सीन खत्म होते ही दूसरा एक्शन सीन शुरू हो जाता है। ऐसे में किरदार के भावनात्मक पक्ष को उतनी जगह नहीं मिल पाती, जितनी एक 3 घंटे 15 मिनट लंबी फिल्म में मिलनी चाहिए थी।
कियारा आडवाणी फिल्म में नादिया का किरदार निभाती हैं। वह एक सर्कस ट्रैपेज आर्टिस्ट हैं और उनका किरदार राया की जिंदगी में एक अलग तरह की नरमी लेकर आता है। फिल्म की शुरुआत में कियारा की एंट्री प्रभावशाली है और उनका शुरुआती सीन तुरंत ध्यान खींचता है।
राया के बेहद सख्त और हिंसक व्यक्तित्व के बीच नादिया का किरदार कहानी को थोड़ी भावनात्मक जगह देता है। कियारा का किरदार फिल्म के उन हिस्सों में से है, जहां कहानी कुछ समय के लिए हिंसा से बाहर निकलकर रिश्तों और भावनाओं की तरफ जाती है। नादिया के साथ मौजूद बच्चा टिकट भी कहानी में एक अलग भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है।
नयनतारा फिल्म में राया की बड़ी बहन गंगा का किरदार निभाती हैं। राया और गंगा के रिश्ते को उसकी जिंदगी की अहम कड़ी के तौर पर दिखाया गया है। हालांकि फिल्म आगे बढ़ने के साथ यह रिश्ता पीछे छूटता हुआ महसूस होता है और राया की प्रेम कहानी ज्यादा प्रमुख हो जाती है।
हुमा कुरैशी एक दूसरे गैंगस्टर की प्रेमिका के किरदार में हैं। तारा सुतारिया उसी गैंगस्टर की बेटी का किरदार निभाती हैं और राया के लिए उनके मन में भावनाएं हैं। रुक्मिणी वसंत का किरदार भी राया की कहानी से जुड़ा हुआ है। फिल्म में महिलाओं के कई किरदार हैं, लेकिन उनकी पहचान का बड़ा हिस्सा पुरुष किरदारों से जुड़े रिश्तों के जरिए सामने आता है।
फिल्म की दुनिया में अपराध और सत्ता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गैंगस्टर और भ्रष्ट ताकतों के बीच गठजोड़ कहानी का अहम हिस्सा है। गोवा और मकाऊ जैसी लोकेशन फिल्म को बड़े स्तर का विजुअल देती हैं। पुराने हॉलीवुड गैंगस्टर सिनेमा की झलक भी फिल्म की प्रस्तुति में दिखाई देती है।
चुस्त सूट, फेडोरा, सिगरेट होल्डर, नाइट क्लब और धुएं से भरी दुनिया फिल्म को एक खास पीरियड लुक देते हैं। फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट कई जगह शानदार है और इसके सेट और लोकेशन बड़े पर्दे का अनुभव देने की कोशिश करते हैं।
‘टॉक्सिक’ में एक्शन की कोई कमी नहीं है। गोलियों से लेकर चाकू और कुल्हाड़ी तक हिंसा के कई रूप फिल्म में दिखाई देते हैं। लेकिन लगातार एक्शन के कारण कहानी का भावनात्मक हिस्सा दब जाता है।
फिल्म का फर्स्ट हाफ कई जगह लंबा और खिंचा हुआ महसूस होता है। कहानी लगातार किसी बड़े खुलासे या धमाके की तरफ बढ़ती है, लेकिन इंटरवल तक वह असर पैदा नहीं हो पाता जिसकी उम्मीद बनती है। दर्शक लंबे समय तक उस बड़े मोड़ का इंतजार करते रहते हैं, लेकिन उसका प्रभाव उतना मजबूत नहीं लगता।
फिल्म की एक अहम कमजोरी राया और उसकी बहन गंगा का रिश्ता है। शुरुआत में इस रिश्ते को राया की जिंदगी की रीढ़ जैसा महत्व दिया जाता है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, राया की प्रेम कहानी इस रिश्ते पर ज्यादा हावी होती जाती है।
यहां फिल्म के पास एक मजबूत भावनात्मक कहानी बनाने का मौका था। भाई-बहन के रिश्ते को और गहराई दी जा सकती थी, लेकिन लगातार बदलते एक्शन सेट पीस और गैंगस्टर घटनाओं के बीच यह रिश्ता उतना असरदार नहीं बन पाता।
फिल्म में भाई-बहन के रिश्ते के अलावा पिता और बेटे से जुड़ा एंगल भी सामने आता है। कहानी के आखिर में ये हिस्से ज्यादा स्पष्ट तरीके से जुड़ते हैं। यही वह समय है जब ‘टॉक्सिक’ कुछ देर के लिए अपनी हिंसक गैंगस्टर दुनिया से बाहर निकलकर एक भावनात्मक फिल्म जैसी महसूस होती है।
दिक्कत यह है कि यह असर फिल्म के काफी आखिरी हिस्से में आता है। अगर यही भावनात्मक गहराई कहानी में पहले दिखाई देती, तो शायद दर्शकों का फिल्म से जुड़ाव ज्यादा मजबूत हो सकता था।
‘टॉक्सिक’ उन दर्शकों को यश का स्वैग, बड़े स्तर का एक्शन और गैंगस्टर दुनिया पसंद आ सकती है, जो ऐसी फिल्मों के शौकीन हैं। फिल्म में बड़े सेट, पीरियड लुक, एक्शन और यश की दमदार स्क्रीन प्रेजेंस है। कियारा आडवाणी भी अपने किरदार में अलग प्रभाव छोड़ती हैं।
लेकिन अगर आप फिल्म से एक मजबूत कहानी, गहरे रिश्ते और भावनात्मक जुड़ाव की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो निराशा हो सकती है। 3 घंटे 15 मिनट की लंबाई के बावजूद कहानी कई जगह कमजोर और खिंची हुई लगती है। लगातार हिंसा और एक्शन के बीच फिल्म का भावनात्मक आधार पीछे छूट जाता है।
आखिर में ‘टॉक्सिक’ एक ऐसी फिल्म बनकर रह जाती है जिसमें शोर बहुत है, खून-खराबा बहुत है, एक्शन बहुत है और यश का स्वैग भी भरपूर है, लेकिन इन सबके पीछे कहानी उतनी मजबूत नहीं लगती। फिल्म का सबसे बड़ा सवाल शायद वही बन जाता है जो उसके भावनात्मक विचार से निकलता है कि आखिर एक फेयरीटेल इतनी खोखली कैसे हो सकती है।
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