यह क्या बोल गए NSA अजीत डोभाल, बात तो बड़ी है

यह भी क्यों नहीं पढ़ाते कि लुटेरों का मुकाबला करने के बजाय उस समय हमारा समाज और उसके कर्णधार किन किन कामों में लिप्त थे ? पता नहीं क्यों हम अपने नई पीढ़ी को यह बता कर गौरवान्वित होते रहते हैं कि इतिहास में हमने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया?

NSA अजीत डोभाल
NSA अजीत डोभाल
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar12 Jan 2026 03:15 PM
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Ajit Doval : भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल भी वही सब दोहराने लगे जो सांप्रदायिक मानसिकता वाले नेता जमाने से कहते आ रहे हैं। दिल्ली के एक कार्यक्रम में भारत के NSA अजीत डोभाल भारत द्वारा कभी किसी देश पर हमला न करने और मध्य युग में मंदिरों को तोड़े जाने जैसी बातें दोहराकर युवाओं का आह्वान कर गए कि युवा अपने अंदर आग पैदा करें और इतिहास की दर्दनाक घटनाओं का प्रतिशोध लें । अब इसे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहें कि जो बातें इतने बड़े अधिकारी ने कहीं वही सब हमारे स्कूलों में बच्चों को भी पढ़ाई जा रही हैं । बेशक विदेशी हमलावरों ने भारतीय मंदिर तोड़े थे, इससे तो किसी को इनकार ही नहीं है मगर इस जानकारी के साथ साथ ही हम अपनी नई पीढ़ी को यह भी क्यों नहीं बताते कि क्यों उस दौर में देश का सारा खजाना नागरिकों के पास नहीं वरन मंदिरों में जमा था, जिसे लूटने हमलावार आए थे ? यह भी क्यों नहीं पढ़ाते कि लुटेरों का मुकाबला करने के बजाय उस समय हमारा समाज और उसके कर्णधार किन किन कामों में लिप्त थे ? पता नहीं क्यों हम अपने नई पीढ़ी को यह बता कर गौरवान्वित होते रहते हैं कि इतिहास में हमने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया? भारतीय इतिहास की बाबत हजारों बार बोले गए इसी झूठ को अब एक राजनीतिक एजेंडे के तहत जब NSA अजीत डोभाल जैसे लोग बदले की भावना के आह्वान के साथ युवाओं के समक्ष परोसते हैं तो वाकई दुख होता है।

जिम्मेदार तत्वों पर बात क्यों नहीं करते?

यकीनन हमारा इतिहास दु:ख, क्लेश, उत्पीडऩ और अमानवीय घटनाओं से भरा हुआ है मगर पता नहीं क्यों हम उसके लिए जिम्मेदार तत्वों पर बात न करके एक अजीब किस्म की नैतिकता का यह चोला ओढ़ लेते हैं कि भारत सदैव एक शांतिप्रिय सभ्यता रही है, जिसने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया। क्या ऐतिहासिक दृष्टि से यह अधूरा और भ्रामक सत्य नहीं है ? यदि भारत ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया तो चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर किस अफग़़ानिस्तान और आज के पाकिस्तान और बलूचिस्तान को अपने विशाल साम्राज्य में शामिल किया था ? क्यों सम्राट अशोक के समय में मौर्य साम्राज्य की सीमाएँ आज के अफग़़ानिस्तान तक फैली थीं ?

भारत ने भी किया था सीमा विस्तार

क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि दक्षिण भारत के शासकों ने भारत को एक समुद्री सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया था और चोल राजाओं ने 10वीं और 11वीं शताब्दी में समुद्र पार कर श्रीलंका, आज के मलेशिया, इंडोनेशिया,, थाईलैंड, म्यांमार और सिंगापुर क्षेत्र तक अपने सैन्य अभियान चलाए थे । क्या यह केवल व्यापारिक यात्राएँ थीं और उन्होंने वहाँ स्थानीय शासकों को पराजित कर कर-वसूली और प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया ? क्या यह भी किताबों में दर्ज नहीं है कि आठवीं सदी में कश्मीर के राजा ललितादित्य ने अपने देश की सीमाओं का विस्तार तिब्बत, मध्य एशिया और ईरान की सीमाओं तक कर लिया था ?आधुनिक काल के महाराजा रणजीत सिंह को क्यों हम भूल जाते हैं जिनके नेतृत्व में सिख साम्राज्य लाहौर, पेशावर, मुल्तान और अफग़़ानिस्तान तक फैला हुआ था । 18वीं शताब्दी में मराठों की सेनाएँ भी तो अटक और अफग़़ान सीमा तक अपना भगवा झंडा फहरा आई थीं। इन सभी तथ्यों का जिक्र करने का अर्थ यह साबित करना कतई नहीं है कि भारत भी एक आक्रामक या विस्तारवादी सभ्यता था बल्कि यह है कि अन्य सभ्यताओं की तरह उस दौर में भारत भी राजनीतिक शक्ति, सुरक्षा और प्रभाव के लिए सैन्य अभियानों का सहारा लेता रहा है । इसी लिए यह कहना कि "भारत ने कभी आक्रमण नहीं किया"  मुझे इतिहास को आदर्शवाद की चादर में ढकने जैसा लगता है। 

सच्चा राष्ट्रबोध मिथकों से नहीं आता

पता नहीं हम कब समझेंगे कि सच्चा राष्ट्रबोध मिथकों से नहीं, बल्कि ईमानदार इतिहासबोध से जन्म लेता है। भारत की महानता उसकी निष्क्रियता में नहीं, बल्कि उसकी क्षमता, संतुलन और समयानुसार शक्ति प्रयोग में निहित रही है। इतिहास को स्वीकार करना उसे कमज़ोर नहीं, बल्कि अधिक परिपक्व बनाता है। यूं भी हम भारत शब्द के प्रयोग के साथ जिस सीमाओं और उसके भीतर रहने वाले करोड़ों लोगों के बात करते हैं, वह तो संविधान लागू होने के बाद ही अस्तित्व में आया । अपने युवाओं को बदले की भावना से ओतप्रोत करते हुए हम यह स्पष्ट क्यों नहीं करते कि हमें बदला आखिर लेना किससे है ? जिन देशों के तत्कालीन राजाओं ने भारत पर हमले किए , क्या अब हम उनसे बदला ले भी सकते हैं ? क्या यह संभव भी है ? यदि नहीं तो फिर हमारा प्रतिशोध और नफरत किसके खिलाफ होगी ? काश आज ऐसे लोग की आवाज बुलंद हो जो लोगों को बताएं कि राष्ट्र केवल सीमाएं नहीं उसमें बसे लोग भी होते हैं । मगर दुर्भाग्य देखिए कि वही लोग चहुंओर दिखाई पड़ते हैं जो लोगों के आज के सुख दुख की बात ही नहीं करते और बार बार उन्हें इतिहास की भूल भुलैया में भटकाने की कोशिश करते हैं। Ajit Doval


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अलविदा-2025 के साथ बढ़ा है भारत का दबदबा

वर्ष-2025 ने भारत को वह सब कुछ देने का काम किया है जिसके लिए भारत पूरी तरह से हकदार था। भारत ने वर्ष-2025 के साल से बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है। अलविदा-2025 कहने के साथ ही भारत की वर्ष-2025 की उपलब्धियों पर गौर करना जरूरी है।

अलविदा-2025
अलविदा-2025: उपलब्धियों के साल ने बढ़ाया भारत का दबदबा
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar31 Dec 2025 05:09 PM
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Goodbye-2025 : अलविदा-2025 या यह कहें कि बाय-बाय वर्ष-2025 इन दोनों का सीधा अर्थ है कि वर्ष-2025 अब इतिहास बन गया है। वर्ष-2025 के इतिहास बनने के साथ ही भारत ने भी नया इतिहास लिख दिया है। वर्ष-2025 ने भारत को वह सब कुछ देने का काम किया है जिसके लिए भारत पूरी तरह से हकदार था। भारत ने वर्ष-2025 के साल से बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है। अलविदा-2025 कहने के साथ ही भारत की वर्ष-2025 की उपलब्धियों पर गौर करना जरूरी है।

वर्ष-2025 में ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ ने गाड़ दिया भारत का झंडा

वर्ष-2025 में भारत की उपलब्धियों पर एक बहुत मोटी किताब लिखी जा सकती है। वर्ष-2025 में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि की बात करें तो हर कोई यही कहेगा कि वर्ष-2025 में भारत के द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ ने भारत का झंडा पूरी दुनिया में गाड़ दिया है। ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ वर्ष-2025 में भारत के हिस्से में आई वह उपलब्धि है जिसके द्वारा भारत ने अपनी स्थापित सैन्य ताकत को पूरी दुनिया के सामने पूरी बहादुरी के साथ पेश करने का काम किया है।

‘ऑपरेशन सिन्दूर’ ने बढ़ाया भारत का मान-सम्मान तथा अभिमान

आपको याद दिला दें कि ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ को अलविदा-2025 वर्ष की सबसे बड़ी घटना के रूप में याद रखा जाएगा। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों द्वारा 26 निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या की घटना के बाद दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेलते आ रहे भारत ने अपने धैर्य की अंतिम सीमा रेखा खींच दी। पहलगाम के आतंकी गुनहगारों के साथ पाकिस्तान को सख्त संदेश देने के लिए भारत ने छह-सात मई, 2025 की रात ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ की सैन्य कार्रवाई की शुरूआत कर पाक अधिकृत कश्मीर ही नहीं, पाकिस्तान के भीतर आतंक के नौ बड़े ठिकानों को ध्वस्त करने के साथ करीब 100 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। इस कार्रवाई के जरिए भारत ने पाकिस्तान के इस भ्रम को हमेशा के लिए खत्म कर दिया कि वह उसकी सरजमीं पर पनपे आतंकी ठिकानों पर सीधे सैन्य हमला नहीं करेगा। भारत ने ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के जरिए साबित कर दिया कि पाकिस्तान में स्थित सभी आतंकी ठिकानों तक वह पहुंच सकता है। यह एक ऐसी सामरिक कार्रवाई थी, जिसने भारत के सुरक्षा सोच को धैर्य’ से’ प्रतिकार की दिशा में निर्णायक मोड़ दिया। ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ महज एक जवाबी कार्रवाई नहीं बल्कि भारत की यह घोषणा है कि वह सीमाधार आतंकवाद को अपनी संप्रभुता पर हमला तथा युद्ध मानेगा। भारत अब शांति को केवल आदर्श नहीं समझता, बल्कि उसे सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक शक्ति और साहस भी रखता है। भविष्य में जब रणनीतिक-सामरिक इतिहासकार इस कालखंड पर गौर करेंगे तो बेशक ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ को नए भारत की उभरती रणनीतिक चेतना का निर्णायक मोड़ मानेंगे। इस ऑपरेशन के बाद कूटनीतिक मोर्च पर भी भारत ने एक नई शुरुआत की और तीन दर्जन से ज्यादा देशों में सांसदों का प्रतिनिधिमंडल भेजकर उन्हें अपने सोच के साथ जोड़ लिया।

भारत की वैश्विक पहचान में आया बड़ा निखार

अलविदा 2025 कहते हुए याद आ रहा है कि वर्ष-2025 में भारत की वैश्विक पहचान में बहुत बड़ा निखार आया है। आर्थिक क्षेत्र हो अथवा खेल का मैदान भारत ने हर जगह दुनिया के सामने नई मिसाल पेश करने का काम किया है। वर्ष- 2025 में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने आईसीसी महिला विश्व कप 2025 में शानदार प्रदर्शन किया और श्रीलंका के खिलाफ बड़ी जीत दर्ज की, जिससे भारतीय खेल के स्तर में मजबूती दिखाई।सामाजिक-आर्थिक बदलाव के क्षेत्र में देखे तो 1 जुलाई 2025 से लागू हुए कई नए वित्तीय नियमों और पॉलिसियों के कारण आम आदमी के लिए बचत और नियम-व्यवस्था में बदलाव आया, जिसे कई लोगों के लिए उपयोगी माना गया।राष्ट्रीय और सुरक्षा क्षेत्र में तैयारी तीव्र गति से बढी है। ऑपरेशन अभ्य्यास नामक 7 मई 2025 को आयोजित देशव्यापी नागरिक सुरक्षा अभ्यास से देश की आपदा प्रबंधन और सुरक्षा तत्परता को और मजबूत किया गया। वैश्विक मंच पर भारत ने प्रभावित करते हुए भारत ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संतुलित और जिम्मेदार भूमिका निभाई है। विकासशील देशों की आवाज़ को वैश्विक मंच पर मजबूती से उठाने में भारत अग्रणी रहा। विश्व शांति, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर भारत की भूमिका को व्यापक सराहना मिली है। वर्ष-2025 में भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है। डिजिटल भुगतान प्रणाली, विशेषकर यूपीआई ने देश को डिजिटल लेन-देन में वैश्विक पहचान दिलाई है।स्टार्ट-अप संस्कृति, स्वदेशी उत्पादन और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे अभियानों से रोजगार और निवेश को बढ़ावा मिला है।विज्ञान और अंतरिक्ष में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने कम लागत और उच्च तकनीकी क्षमता के साथ कई सफल मिशनों को अंजाम दिया। इससे भारत विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी देशों की श्रेणी में शामिल हुआ है। शिक्षा और युवा शक्ति के रूप में भारत में वैश्विक शक्ति हासिल कर ली।नई शिक्षा नीति के माध्यम से कौशल-आधारित और रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर ज़ोर दिया गया है। तकनीकी शिक्षा, स्टार्ट-अप और नवाचार के क्षेत्र में युवा वर्ग की भागीदारी बढ़ी है, जो देश के भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है।वही अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाडय़िों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। महिला खिलाडय़िों की बढ़ती सफलता और जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने वाली योजनाओं ने खेल जगत में भारत की स्थिति को मजबूत किया है।सन् 2025 में भारतीय खिलाडय़िों ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। महिला और युवा खिलाडय़िों की सफलता ने देश को गौरवान्वित किया। खेलो इंडिया जैसे अभियानों से जमीनी प्रतिभाओं को नया मंच मिला।सामाजिक और पर्यावरणीय पहल के तहत स्वच्छता, स्वास्थ्य, आवास और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ी योजनाओं ने आम नागरिक के जीवन स्तर में सुधार किया है। पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भविष्य के लिए आशा जगाती है।कुल मिलाकर, भारत की उपलब्धियाँ यह दर्शाती हैं कि देश चुनौतियों के बीच भी विकास, आत्मनिर्भरता और नवाचार के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। मजबूत नीतियाँ, युवा शक्ति और तकनीकी प्रगति भारत को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित कर रही हैं। सन् 2025 में भारत विश्व की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बना रहा। औद्योगिक निवेश में वृद्धि, स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा और स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों से आर्थिक गतिविधियों में तेज़ी आई। डिजिटल भुगतान प्रणाली और वित्तीय समावेशन ने आम नागरिक की अर्थव्यवस्था में भागीदारी को मजबूत किया।डिजिटल लेन-देन, ई-गवर्नेस और तकनीकी नवाचारों के क्षेत्र में भारत ने नई उपलब्धियाँ हासिल कीं। यूपीआई और डिजिटल सेवाओं के विस्तार से भारत विश्व के अग्रणी डिजिटल देशों में शामिल हुआ। सरकारी सेवाओं के ऑनलाइन होने से पारदर्शिता और सुशासन को बल मिला।स्वास्थ्य, आवास, स्वच्छता और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं ने करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रभावित किया। नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उठाए गए कदमों ने सतत विकास की नींव को मजबूत किया।कुल मिलाकर सन् 2025 भारत के लिए उपलब्धियों का वर्ष रहा। चुनौतियों के बावजूद देश ने विकास, आत्मनिर्भरता और नवाचार के रास्ते पर निरंतर प्रगति की। भारत की ये उपलब्धियाँ आने वाले वर्षों के लिए एक मजबूत आधार तैयार करती हैंवर्ष 2047 में विकसित भारत की नींव हुई मजबूत

वर्ष-2025 ने वर्ष-2047 के विकसित भारत के सपने की नींव को मजबूत किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब वर्ष-2047 में विकसित भारत के एजेंडे को रखा था तो प्रश्न था कि क्या हम इस लक्ष्य को पूरा कर सकेंगे? परंतु वर्ष 2025 में वैश्विक चुनौतियों के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने लगभग पौने सात प्रतिशत की तेजी दिखाई है तो, यह हमारे मनोबल और सही दिशा को बताती है। परंतु, आगे शर्त यह है कि हमें सुधारों के मोर्चे पर बढ़ते रहना होगा। उद्यमिता, रोजगार, कौशल विकास और औद्योगीकरण की गति तेज करनी होगी। दुनियाभर से निवेश लाने की कोशिशों को सफल बनाने के लिए नीतियों में जरूरत के मुताबिक बदलाव करते रहने होंगे। वर्ष 2025 के अंत में अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान के साथ भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना है तो यह वैश्विक स्तर पर देश की भूमिका में वृद्धि की झलक है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय आर्थिकी की बातें चाहे जितनी होती रही हों लेकिन उसके दो मील के पत्थर है। पहला वर्ष 1991 में प्रारंभआर्थिक उदारीकरण और दूसरा वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नीत गठबंधन सरकार की बदलाव की गति। पहला दौर मनमाफिक परिणाम न दे सका तो इसकी वजह अस्थिर सरकारें और भ्रष्टाचार रहा। जबकि मोदी सरकार ने सुधारों पर ध्यान फोकस किया। कोरोना जैसी महामारी के दौरान मेक इन इंडिया की घोषणा की। डिजिटल नयाचार, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम जारी कीं। बेहतर मानसून के दौर और उन्नत होती कृषि ने भी सरकार का पूरा साथ दिया। यही वजह है कि आर्थिकी की तेज गति 8.2 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर रही भारत की, वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में। वहीं मई में खुदरा महंगाई दर गिर कर 2.8 प्रतिशत पर आ गई थी ! वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि पर रहे। सरकार ने बुनियादी ढांचे में खर्च बढ़ाकर रोजगार बढ़ाए हैं। सरकार की पीएलआइ जैसी स्कीम ही हैं कि नवंबर में एपल कंपनी ने दुनियाभर में बेचे पांच मोबाइल फोन में से एक भारत से सप्लाई किया। भारतीय आटोमोबाइल क्षेत्र भी बेहतर कर रहा है। वर्ष 2025 में भारत सरकार ने गरीबी से सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों के जीवन स्तर को भी ऊपर उठाया है। इसके बावजूद देश के सामने लगातार चुनौतियां आ रही हैं। पड़ोस की चुनौतियां हैं तो अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर सर्वाधिक 50 प्रतिशत टैरिफ भी थोपा। इससे निर्यात घटा है, लेकिन हमारे उद्योग नए रास्ते खोजकर भविष्य के लिए सुदृढ़ हो रहे हैं। भारतीय स्टार्टअप अंतरिक्ष और रक्षा के क्षेत्र में जिस तरह आगे बढ़ रहे हैं, वह यह दर्शाने को पर्याप्त हैं किं आगामी पांच वर्षों में यह आर्थिकी में बड़ा योगदान देंगे।। Goodbye-2025




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ओशो की मौत साधारण नहीं बल्कि हत्या है

ओशो को लेकर सबसे बड़ी भ्रान्ति यह है कि ओशो एक sex गुरु थे। बात यहीं पर समाप्त नहीं होती। ओशो की मौत को लेकर भी एक बड़ा रहस्य मौजूद है। ओशो को जानने वाले दवा करते है कि मौत कोई साधारण मौत नहीं थी , बल्कि धीमा जहर देकर ओशो की हत्या की गई थी।

चर्चित धर्मगुरु ओशो
चर्चित धर्मगुरु ओशो
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar29 Dec 2025 04:54 PM
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Osho : ओशो 20 वीं शताब्दी के सबसे चर्चित धर्मगुरु रहे है। ओशो की मौत को 35 वर्ष से अधिक का समय बीत चूका है। कोई व्यक्ति अपनी मौत के 35 वर्ष बाद भी उतनी ही चर्चा में बना रहे जितनी चर्चा में वह जीवित रहते हुए हुई थी,तो इसे उस व्यक्ति का आकर्षण ही कहा जा सकता है। ओशो के भक्तों,ओशो के अनुयायी हो अथवा ओशो के विरोधी हो ओशो के आकर्षण से कोई बच नहीं पाया है। ओशो को लेकर सबसे बड़ी भ्रान्ति यह है कि ओशो एक sex गुरु थे। बात यहीं पर समाप्त नहीं होती। ओशो की मौत को लेकर भी एक बड़ा रहस्य मौजूद है। ओशो को जानने वाले दवा करते है कि मौत कोई साधारण मौत नहीं थी , बल्कि धीमा जहर देकर ओशो की हत्या की गई थी। यहाँ हम आपको ओशो के जीवन के महत्वपूर्ण पक्ष से परिचित कराने का प्रयास कर रहे है।  

ओशो चेतना की क्रांति अथवा विवादों की धुरी

ओशो भारतीय दर्शन और आधुनिक चेतना-विमर्श का ऐसा नाम हैं, जो 35 साल बाद भी उतनी ही तीखी बहस का केंद्र है जितना अपने दौर में थे। उनके समर्थक उन्हें जड़ता तोड़ने वाला निर्भीक विचारक मानते रहे, जबकि आलोचक उनकी जीवनशैली और प्रयोगों को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे। ओशो अक्सर कहते थे कि इंसान धरती पर बस मेहमान है। ओशो के अनुसार मनुष्य पृथ्वी पर ठहरने नहीं, गुजरने के लिए आता है। लेकिन उनकी अपनी यात्रा भी उसी कथन की तरह जितनी बेपरवाह दिखती है, उतनी ही परतदार, बहसों से भरी और कई रहस्यों से घिरी रही। 11 दिसंबर 1939 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा गांव में जैन परिवार में जन्मे ओशो का देहांत 19 जनवरी 1990 को पुणे में हुआ. मगर कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। 

चंद्रमोहन जैन से ओशो तक का सफर 

आचार्य रजनीश जिन्हें दुनिया आज ओशो के नाम से पहचानती है उनके बचपन का नाम चंद्रमोहन जैन था। कहा जाता है कि शुरुआती वर्षों में उनका कुछ समय नानी के घर भी बीता और वहीं से उनके स्वभाव में वह अलग तरह की अकेली आजादी झलकने लगी, जो आगे चलकर उनकी सोच की पहचान भी बनी। समय के साथ साथ आचार्य रजनीश के नाम भी बदले और पहचान भी। 1960 के दशक में वे आचार्य रजनीश कहलाए, फिर उनके अनुयायियों ने उन्हें भगवान रजनीश के रूप में देखना शुरू कर दिया। लेकिन 1989 के आसपास दुनिया ने उन्हें सबसे अधिक ओशो नाम से जाना। ओशो शब्द को लेकर कई व्याख्याएं मिलती हैं कहीं इसे समुद्र में विलीन हो जाने जैसे अर्थ से जोड़ा जाता है, तो कहीं इसे भीतर की गहराई और विस्तार का प्रतीक माना जाता है। यही वजह रही कि उनके आश्रम, ध्यान केंद्र और संस्थान भी धीरे-धीरे इसी एक नाम ओशो के साथ पहचाने जाने लगे।

लेक्चरर से आध्यात्मिक मंच तक का सफर 

ओशो ने अपनी पेशेवर यात्रा की शुरुआत दर्शन (फिलॉसफी) के लेक्चरर के रूप में की, लेकिन जल्द ही क्लासरूम की दीवारें उनके लिए छोटी पड़ गईं। उनके प्रवचन तेज, बेबाक और सीधे चोट करने वाले थे। यही कारण था कि ओशो जितनी तेजी से लोगों के बीच चर्चित हुए, उतनी ही तेजी से विवादों के घेरे में भी आ गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक 1970 के आसपास वे मुंबई पहुंचे और वहीं से नव-संन्यास की अवधारणा के जरिए अपने शिष्यों का एक नया संसार खड़ा किया जो परंपरा से टकराता भी था और उसे चुनौती भी देता था। फिर 1974 में पुणे के कोरेगांव पार्क में उनका ध्यान-आधारित केंद्र/आश्रम स्थापित हुआ, जिसने देखते ही देखते भारत ही नहीं, विदेशों तक से आने वाले साधकों और जिज्ञासुओं को अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया।

लग्जरी लाइफस्टाइल पर भी हुई थी बहस

ओशो की जीवनशैली को लेकर चर्चा हमेशा तेज रही। उनके पहनावे, घड़ियों और लग्जरी पसंद को लेकर समर्थक इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता बताते थे , जबकि आलोचक इसे अध्यात्म के विरुद्ध मानते थे। कई रिपोर्ट्स में यह दावे भी सामने आते रहे कि शिष्यों से मिले उपहारों में रोल्स रॉयस जैसी कारें शामिल थीं हालांकि उनकी संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े बताए जाते हैं। मगर इतना तय है कि यह प्रसंग ओशो की छवि से लंबे समय तक चिपक गया और विरोधियों के लिए उन्हें घेरने का बड़ा हथियार बनता रहा। इन्ही विवादों और टकरावों के बीच ओशो 1980 के आसपास अमेरिका पहुंचे। ओरेगॉन में उनके अनुयायियों ने विशाल इलाके में एक अनोखा कम्यून बसाया, जिसे रजनीशपुरम के नाम से जाना गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक वहां रहने से लेकर सुरक्षा, परिवहन, रेस्टोरेंट और सार्वजनिक सुविधाओं तक एक छोटे शहर जैसी पूरी व्यवस्था खड़ी कर दी गई थी। यही वह दौर था जब ओशो के प्रयोग और बयान बार-बार सुर्खियों में आए और उनके पक्ष-विपक्ष की बहस पहले से भी ज्यादा तेज हो गई।

कैसे हुआ रजनीशपुरम का पतन?

ओरेगॉन का यह कम्यून आगे चलकर अमेरिकी प्रशासन की कड़ी निगरानी में आ गया। रजनीशपुरम से जुड़े एक बहुचर्चित बायोटेरर/फूड फ़ूड पॉइजनिंग  प्रकरण में ओशो की सेक्रेटरी आनंद शीला को सजा मिलने के बाद माहौल और सख्त हो गया। इसके बाद इमिग्रेशन समेत अन्य आरोपों के तहत ओशो की गिरफ्तारी और पूछताछ की खबरें भी सामने आती रहीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ समय जेल में रहने के बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि ओशो को अमेरिका छोड़ना पड़ा और इसी के साथ रजनीशपुरम की अलग दुनिया भी धीरे-धीरे बिखरने लगी। इसी दौर में कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया गया कि दुनिया के करीब 21 देशों ने ओशो के प्रवेश पर पाबंदी जैसी सख्ती की थी, हालांकि इन दावों के आंकड़ों और समय-सीमा को लेकर समय-समय पर बहस भी होती रही है।

रहस्यमयी क्यों कहलाती है आखिरी यात्रा?

1985 के आसपास ओशो भारत लौट आए और लौटते ही उनकी यात्रा एक बार फिर सुर्खियों सवालों और अटकलों के बीच आ खड़ी हुई। कुछ रिपोर्ट्स में नेपाल जाने-आने की चर्चाएं भी आती हैं, लेकिन कुल मिलाकर भारत वापसी के करीब पाँच साल बाद, 58 वर्ष की उम्र में पुणे में उनका निधन हो गया। यहीं से ओशो की कहानी का सबसे संवेदनशील और विवादित अध्याय शुरू होता है। एक तरफ ऐसे दावे उभरे कि अमेरिका में उन्हें थेलियम जैसे स्लो-पॉइजन दिए जाने की आशंका थी और खुद ओशो ने भी अपने भीतर जहर जैसे लक्षण महसूस होने की बात कही थी। दूसरी ओर, कुछ लोगों ने संस्था, संपत्ति और अंदरूनी खींचतान को भी शक की वजह बताया। सच क्या था यह आज भी साफ नहीं, लेकिन इतना तय है कि ओशो के जाने के बाद भी उनकी मृत्यु पर उठे सवाल उनकी चर्चा को और गहरा कर गए।

‘Who Killed Osho’ और वसीयत विवाद

वरिष्ठ पत्रकार अभय वैद्य की किताब “Who Killed Osho” का जिक्र आते ही ओशो की मृत्यु से जुड़ी बहस फिर तेज़ हो जाती है। इस किताब में मौत के हालात, इलाज की प्रक्रिया, पोस्टमॉर्टम न होने, अंतिम संस्कार जल्दी कर दिए जाने और वसीयत जैसे पहलुओं पर सवाल उठाए गए हैं । कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक ओशो की वसीयत को लेकर विवाद आगे चलकर बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुंचा, जहां दस्तावेज़ की प्रामाणिकता पर अलग-अलग सवाल खड़े होते रहे। परिवार की तरफ से भी इसे पूरी तरह स्वाभाविक मृत्यु मानने पर संदेह जताए जाने की चर्चाएं सामने आती रही हैं।

ओशो आज भी क्यों चर्चा में हैं?

आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में ओशो के वीडियो-प्रवचन एक बार फिर बड़े पैमाने पर सुने और साझा किए जा रहे हैं। कोई उन्हें जिंदगी की दिशा बदल देने वाली बातें बताता है, तो कोई उनके विचारों को खतरनाक हद तक उलझाने वाला करार देता है। शायद यही ओशो की कहानी का सबसे बड़ा सच भी है जैसे उनके विचार किसी एक निष्कर्ष में नहीं बंधते, वैसे ही उनकी जिंदगी और उनकी मौत भी आज तक किसी फैसले पर नहीं, बल्कि एक लगातार चलती बहस के रूप में मौजूद है। Osho

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