यह क्या बोल गए NSA अजीत डोभाल, बात तो बड़ी है
यह भी क्यों नहीं पढ़ाते कि लुटेरों का मुकाबला करने के बजाय उस समय हमारा समाज और उसके कर्णधार किन किन कामों में लिप्त थे ? पता नहीं क्यों हम अपने नई पीढ़ी को यह बता कर गौरवान्वित होते रहते हैं कि इतिहास में हमने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया?

Ajit Doval : भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल भी वही सब दोहराने लगे जो सांप्रदायिक मानसिकता वाले नेता जमाने से कहते आ रहे हैं। दिल्ली के एक कार्यक्रम में भारत के NSA अजीत डोभाल भारत द्वारा कभी किसी देश पर हमला न करने और मध्य युग में मंदिरों को तोड़े जाने जैसी बातें दोहराकर युवाओं का आह्वान कर गए कि युवा अपने अंदर आग पैदा करें और इतिहास की दर्दनाक घटनाओं का प्रतिशोध लें । अब इसे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहें कि जो बातें इतने बड़े अधिकारी ने कहीं वही सब हमारे स्कूलों में बच्चों को भी पढ़ाई जा रही हैं । बेशक विदेशी हमलावरों ने भारतीय मंदिर तोड़े थे, इससे तो किसी को इनकार ही नहीं है मगर इस जानकारी के साथ साथ ही हम अपनी नई पीढ़ी को यह भी क्यों नहीं बताते कि क्यों उस दौर में देश का सारा खजाना नागरिकों के पास नहीं वरन मंदिरों में जमा था, जिसे लूटने हमलावार आए थे ? यह भी क्यों नहीं पढ़ाते कि लुटेरों का मुकाबला करने के बजाय उस समय हमारा समाज और उसके कर्णधार किन किन कामों में लिप्त थे ? पता नहीं क्यों हम अपने नई पीढ़ी को यह बता कर गौरवान्वित होते रहते हैं कि इतिहास में हमने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया? भारतीय इतिहास की बाबत हजारों बार बोले गए इसी झूठ को अब एक राजनीतिक एजेंडे के तहत जब NSA अजीत डोभाल जैसे लोग बदले की भावना के आह्वान के साथ युवाओं के समक्ष परोसते हैं तो वाकई दुख होता है।
जिम्मेदार तत्वों पर बात क्यों नहीं करते?
यकीनन हमारा इतिहास दु:ख, क्लेश, उत्पीडऩ और अमानवीय घटनाओं से भरा हुआ है मगर पता नहीं क्यों हम उसके लिए जिम्मेदार तत्वों पर बात न करके एक अजीब किस्म की नैतिकता का यह चोला ओढ़ लेते हैं कि भारत सदैव एक शांतिप्रिय सभ्यता रही है, जिसने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया। क्या ऐतिहासिक दृष्टि से यह अधूरा और भ्रामक सत्य नहीं है ? यदि भारत ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया तो चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर किस अफग़़ानिस्तान और आज के पाकिस्तान और बलूचिस्तान को अपने विशाल साम्राज्य में शामिल किया था ? क्यों सम्राट अशोक के समय में मौर्य साम्राज्य की सीमाएँ आज के अफग़़ानिस्तान तक फैली थीं ?
भारत ने भी किया था सीमा विस्तार
क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि दक्षिण भारत के शासकों ने भारत को एक समुद्री सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया था और चोल राजाओं ने 10वीं और 11वीं शताब्दी में समुद्र पार कर श्रीलंका, आज के मलेशिया, इंडोनेशिया,, थाईलैंड, म्यांमार और सिंगापुर क्षेत्र तक अपने सैन्य अभियान चलाए थे । क्या यह केवल व्यापारिक यात्राएँ थीं और उन्होंने वहाँ स्थानीय शासकों को पराजित कर कर-वसूली और प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया ? क्या यह भी किताबों में दर्ज नहीं है कि आठवीं सदी में कश्मीर के राजा ललितादित्य ने अपने देश की सीमाओं का विस्तार तिब्बत, मध्य एशिया और ईरान की सीमाओं तक कर लिया था ?आधुनिक काल के महाराजा रणजीत सिंह को क्यों हम भूल जाते हैं जिनके नेतृत्व में सिख साम्राज्य लाहौर, पेशावर, मुल्तान और अफग़़ानिस्तान तक फैला हुआ था । 18वीं शताब्दी में मराठों की सेनाएँ भी तो अटक और अफग़़ान सीमा तक अपना भगवा झंडा फहरा आई थीं। इन सभी तथ्यों का जिक्र करने का अर्थ यह साबित करना कतई नहीं है कि भारत भी एक आक्रामक या विस्तारवादी सभ्यता था बल्कि यह है कि अन्य सभ्यताओं की तरह उस दौर में भारत भी राजनीतिक शक्ति, सुरक्षा और प्रभाव के लिए सैन्य अभियानों का सहारा लेता रहा है । इसी लिए यह कहना कि "भारत ने कभी आक्रमण नहीं किया" मुझे इतिहास को आदर्शवाद की चादर में ढकने जैसा लगता है।
सच्चा राष्ट्रबोध मिथकों से नहीं आता
पता नहीं हम कब समझेंगे कि सच्चा राष्ट्रबोध मिथकों से नहीं, बल्कि ईमानदार इतिहासबोध से जन्म लेता है। भारत की महानता उसकी निष्क्रियता में नहीं, बल्कि उसकी क्षमता, संतुलन और समयानुसार शक्ति प्रयोग में निहित रही है। इतिहास को स्वीकार करना उसे कमज़ोर नहीं, बल्कि अधिक परिपक्व बनाता है। यूं भी हम भारत शब्द के प्रयोग के साथ जिस सीमाओं और उसके भीतर रहने वाले करोड़ों लोगों के बात करते हैं, वह तो संविधान लागू होने के बाद ही अस्तित्व में आया । अपने युवाओं को बदले की भावना से ओतप्रोत करते हुए हम यह स्पष्ट क्यों नहीं करते कि हमें बदला आखिर लेना किससे है ? जिन देशों के तत्कालीन राजाओं ने भारत पर हमले किए , क्या अब हम उनसे बदला ले भी सकते हैं ? क्या यह संभव भी है ? यदि नहीं तो फिर हमारा प्रतिशोध और नफरत किसके खिलाफ होगी ? काश आज ऐसे लोग की आवाज बुलंद हो जो लोगों को बताएं कि राष्ट्र केवल सीमाएं नहीं उसमें बसे लोग भी होते हैं । मगर दुर्भाग्य देखिए कि वही लोग चहुंओर दिखाई पड़ते हैं जो लोगों के आज के सुख दुख की बात ही नहीं करते और बार बार उन्हें इतिहास की भूल भुलैया में भटकाने की कोशिश करते हैं। Ajit Doval
Ajit Doval : भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल भी वही सब दोहराने लगे जो सांप्रदायिक मानसिकता वाले नेता जमाने से कहते आ रहे हैं। दिल्ली के एक कार्यक्रम में भारत के NSA अजीत डोभाल भारत द्वारा कभी किसी देश पर हमला न करने और मध्य युग में मंदिरों को तोड़े जाने जैसी बातें दोहराकर युवाओं का आह्वान कर गए कि युवा अपने अंदर आग पैदा करें और इतिहास की दर्दनाक घटनाओं का प्रतिशोध लें । अब इसे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहें कि जो बातें इतने बड़े अधिकारी ने कहीं वही सब हमारे स्कूलों में बच्चों को भी पढ़ाई जा रही हैं । बेशक विदेशी हमलावरों ने भारतीय मंदिर तोड़े थे, इससे तो किसी को इनकार ही नहीं है मगर इस जानकारी के साथ साथ ही हम अपनी नई पीढ़ी को यह भी क्यों नहीं बताते कि क्यों उस दौर में देश का सारा खजाना नागरिकों के पास नहीं वरन मंदिरों में जमा था, जिसे लूटने हमलावार आए थे ? यह भी क्यों नहीं पढ़ाते कि लुटेरों का मुकाबला करने के बजाय उस समय हमारा समाज और उसके कर्णधार किन किन कामों में लिप्त थे ? पता नहीं क्यों हम अपने नई पीढ़ी को यह बता कर गौरवान्वित होते रहते हैं कि इतिहास में हमने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया? भारतीय इतिहास की बाबत हजारों बार बोले गए इसी झूठ को अब एक राजनीतिक एजेंडे के तहत जब NSA अजीत डोभाल जैसे लोग बदले की भावना के आह्वान के साथ युवाओं के समक्ष परोसते हैं तो वाकई दुख होता है।
जिम्मेदार तत्वों पर बात क्यों नहीं करते?
यकीनन हमारा इतिहास दु:ख, क्लेश, उत्पीडऩ और अमानवीय घटनाओं से भरा हुआ है मगर पता नहीं क्यों हम उसके लिए जिम्मेदार तत्वों पर बात न करके एक अजीब किस्म की नैतिकता का यह चोला ओढ़ लेते हैं कि भारत सदैव एक शांतिप्रिय सभ्यता रही है, जिसने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया। क्या ऐतिहासिक दृष्टि से यह अधूरा और भ्रामक सत्य नहीं है ? यदि भारत ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया तो चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर किस अफग़़ानिस्तान और आज के पाकिस्तान और बलूचिस्तान को अपने विशाल साम्राज्य में शामिल किया था ? क्यों सम्राट अशोक के समय में मौर्य साम्राज्य की सीमाएँ आज के अफग़़ानिस्तान तक फैली थीं ?
भारत ने भी किया था सीमा विस्तार
क्या इससे भी इनकार किया जा सकता है कि दक्षिण भारत के शासकों ने भारत को एक समुद्री सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया था और चोल राजाओं ने 10वीं और 11वीं शताब्दी में समुद्र पार कर श्रीलंका, आज के मलेशिया, इंडोनेशिया,, थाईलैंड, म्यांमार और सिंगापुर क्षेत्र तक अपने सैन्य अभियान चलाए थे । क्या यह केवल व्यापारिक यात्राएँ थीं और उन्होंने वहाँ स्थानीय शासकों को पराजित कर कर-वसूली और प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया ? क्या यह भी किताबों में दर्ज नहीं है कि आठवीं सदी में कश्मीर के राजा ललितादित्य ने अपने देश की सीमाओं का विस्तार तिब्बत, मध्य एशिया और ईरान की सीमाओं तक कर लिया था ?आधुनिक काल के महाराजा रणजीत सिंह को क्यों हम भूल जाते हैं जिनके नेतृत्व में सिख साम्राज्य लाहौर, पेशावर, मुल्तान और अफग़़ानिस्तान तक फैला हुआ था । 18वीं शताब्दी में मराठों की सेनाएँ भी तो अटक और अफग़़ान सीमा तक अपना भगवा झंडा फहरा आई थीं। इन सभी तथ्यों का जिक्र करने का अर्थ यह साबित करना कतई नहीं है कि भारत भी एक आक्रामक या विस्तारवादी सभ्यता था बल्कि यह है कि अन्य सभ्यताओं की तरह उस दौर में भारत भी राजनीतिक शक्ति, सुरक्षा और प्रभाव के लिए सैन्य अभियानों का सहारा लेता रहा है । इसी लिए यह कहना कि "भारत ने कभी आक्रमण नहीं किया" मुझे इतिहास को आदर्शवाद की चादर में ढकने जैसा लगता है।
सच्चा राष्ट्रबोध मिथकों से नहीं आता
पता नहीं हम कब समझेंगे कि सच्चा राष्ट्रबोध मिथकों से नहीं, बल्कि ईमानदार इतिहासबोध से जन्म लेता है। भारत की महानता उसकी निष्क्रियता में नहीं, बल्कि उसकी क्षमता, संतुलन और समयानुसार शक्ति प्रयोग में निहित रही है। इतिहास को स्वीकार करना उसे कमज़ोर नहीं, बल्कि अधिक परिपक्व बनाता है। यूं भी हम भारत शब्द के प्रयोग के साथ जिस सीमाओं और उसके भीतर रहने वाले करोड़ों लोगों के बात करते हैं, वह तो संविधान लागू होने के बाद ही अस्तित्व में आया । अपने युवाओं को बदले की भावना से ओतप्रोत करते हुए हम यह स्पष्ट क्यों नहीं करते कि हमें बदला आखिर लेना किससे है ? जिन देशों के तत्कालीन राजाओं ने भारत पर हमले किए , क्या अब हम उनसे बदला ले भी सकते हैं ? क्या यह संभव भी है ? यदि नहीं तो फिर हमारा प्रतिशोध और नफरत किसके खिलाफ होगी ? काश आज ऐसे लोग की आवाज बुलंद हो जो लोगों को बताएं कि राष्ट्र केवल सीमाएं नहीं उसमें बसे लोग भी होते हैं । मगर दुर्भाग्य देखिए कि वही लोग चहुंओर दिखाई पड़ते हैं जो लोगों के आज के सुख दुख की बात ही नहीं करते और बार बार उन्हें इतिहास की भूल भुलैया में भटकाने की कोशिश करते हैं। Ajit Doval











