टेनी की पत्रकार से बदसलूकी को समझना है, तो इन 5 बातों पर गौर फरमाइए
Ajay Mishra Teni
भारत
चेतना मंच
16 Dec 2021 05:29 AM
क्यों नहीं सुधरते टेनी जैसे नेता
विधानसभाओं में लात-जूते चलने से लेकर पोर्न फिल्म देखने और शराब पीकर संसद में आने से लेकर स्पीकर पर पर्चे फेंकने तक की घटनाओं के हम गवाह हैं। राजनीति में अपराधियों और आपराधिक मानसिकता वालों का आना कोई नई बात नहीं है।
आपराधिक आरोपों, मुकदमों में फंसने और जेल जाने के बावजूद, नेता चुनाव लड़ते हैं और जीतते भी हैं। राजनीति में किसी नेता का कद इस बात से तय नहीं होता कि वह कितना शालीन है। नेता के करियर की सफलता चुनाव जीतने की उसकी क्षमता पर निर्भर करती है।
अजय मिश्रा टेनी (Ajay Mishra Teni) जैसे नेता इस बात से भली-भांती परिचित हैं कि मीडिया (Media) या सोशल मीडिया (Social Media) में उनकी कितनी ही किरकिरी क्यों न हो जाए, इससे चुनाव जीतने की उनकी संभावना पर कोई असर नहीं होने वाला।
यही है भारतीय लोकतंत्र की ताकत
परिवारवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद जैसी संकीर्णताओं में उलझे राजनीतिक दलों के सामने योग्य उम्मीदवारों को तलाशने की मेहनत से बचने के शॉर्टकट का नतीजा टेनी जैसे नेता हैं। किसी घटना विशेष के बाद हम अपनी राजनीतिक कुंठाओं के चलते इस सच्चाई को स्वीकार करने के बजाय, पार्टी विशेष को निशाना बनाकर खुश हो जाते हैं।
इसका यह मतलब नहीं है कि भारतीय राजनीति में केवल बुराइयां हैं और पिछले 70 साल में इसमें कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है। तमाम बुराइयों के बावजूद अगर हम चीन (China), पाकिस्तान (Pakistan) या अफगानिस्तान (Afghanistan) नहीं बने हैं तो, इसका श्रेय भारत की राजनीतिक व्यवस्था, राजनीतिक दलों (Political Party), नेताओं और मतदाताओं को जाता है।
वोटर के चुनाव का तरीका थोड़ा अलग है
लेकिन, इसी राजनीतिक व्यवस्था का दूसरा पहलू अजय मिश्रा टेनी (Ajay Mishra Teni) जैसे नेता हैं जो केवल सत्ता की लालच और पावर की हनक दिखाने जैसे गलत मनसूबों के साथ राजनीति में आते हैं और बहुत जल्द अपनी सच्चाई दिखा देते हैं।
टेनी जैसे नेताओं का आगे बढ़ना और मंत्री पद पर पहुंचना हमारे राजनीतिक व्यवस्था का दोष है। लेकिन, इसे एक पार्टी तक सीमित मान लेना हमारी राजनीति समझ का बौनापन है।
अच्छी बात यह है कि आम मतदाता हर घटना को पार्टी लाइन के हिसाब से नहीं देखता। अगर ऐसा होता, तो सरकारें बदलने का चलन हमारी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा नहीं होती। मीडिया (Media) या सोशल मीडिया (Social Media) का काम सरकारों को ऐसे ही खतरों का संकेत देना है। जो भी सरकार या दल इन संकेतों को समझने में चूक जाती हैं, वह अंतत: मतदाताओं (Voter) के कोप का भाजन बनती है।
हर बार ऐसे ही बदलती है सत्ता
देश और अलग-अलग राज्यों में ऐसे कई राजनीतिक दल हैं जिन्होंने दशकों तक राज किया लेकिन, आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन दलों ने सत्ता की हनक में जनता की ताकत को नज़रअंदाज किया और नतीजा सबके सामने है। लोकतंत्र (Democracy) की यही ताकत भारत को पाकिस्तान, चीन या अफगानिस्तान बनने से बचाए हुए है।
आजादी के बाद जब राजनीतिक सत्ता एक परिवार के इर्द-गिर्द सिमट रही थी तब जेपी और लोहिया जैसे नेता पैदा हुए। इन नेताओं ने ऐसे छत्रपों को पैदा किया जिन्होंने राज्यों में उस पार्टी की नींव में मट्ठा डालना शुरू किया और दो दशक से भी कम समय में उस पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर भी अपना जनाधार खो दिया।
ये क्षेत्रीय दल (Regional Parties) भी जल्द ही सत्ता के मद में उसी बुराई का शिकार हो गए जिसके विरोध के चलते जनता ने उन्हें सिर-आखों पर बिठाया था। अगले दो दशक तक देश ने घोर राजनीति उथल-पुथल और अस्थिरता देखी।
सिर पर बिठाने वाली जनता है तो डर किसका!
जनता का असंतोष और गुस्सा कभी निर्भया (Nirbhaya Case) तो कभी अन्ना हजारे (Anna Hazare) के बहाने आंदोलन का रूप लेता रहा और जैसे ही बेहतर विकल्प दिखा जनता ने झट से उसे सिरमौर बना दिया। सत्ता भ्रष्ट करती है, अधिकतम सत्ता अधिकतम भ्रष्ट करती है।
सत्ता में बैठे किस भी दल पर यह बात समान रूप से लागू होती है। यही वजह है कि लोकतंत्र में सत्ता स्थाई लेकिन, सरकार अस्थायी (पांच साल के लिए) होती है। जो सरकार जितनी जल्दी भ्रष्ट होती है उसका कार्यकाल भी उतनी ही जल्दी खत्म होता है।
भ्रष्ट होने का मतलब केवल भ्रष्टाचार नहीं होता। आचरण और व्यवहार भी भ्रष्ट हो सकता है। अजय मिश्रा टेनी (Ajay Mishra Teni) ने एक निरीह पत्रकार के साथ जो किया है वह राजनीतिक आचरण के भ्रष्ट होने का सबूत है। अगर समय रहते इसे सुधारा नहीं गया तो, चुनाव का समय तो नजदीक है ही।
- संजीव श्रीवास्तव