अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव दुनिया के सामने सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। युद्ध, मिसाइलों, ड्रोन, परमाणु हथियारों और आधुनिक तकनीक की बढ़ती ताकत के बीच सबसे बड़ी कीमत आखिर कौन चुका रहा है ?

Editorial : दुनिया आज विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सभ्यता के जिस शिखर पर खड़ी दिखाई देती है, उसी समय उसके सामने युद्ध, हिंसा और विनाश का ऐसा अंधकार भी खड़ा है, जो पूरी मानव सभ्यता के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल तीन देशों के बीच शक्ति-संघर्ष या राजनीतिक वर्चस्व का प्रश्न नहीं रह गया है। इसके प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संबंधों और सबसे बढ़कर मानवीय संवेदना तक पहुंच रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मानवता बार-बार उसी रास्ते पर क्यों लौटती है, जिसका अंतिम पड़ाव विनाश ही रहा है? Editorial
युद्ध का सबसे भयावह पक्ष यह है कि उसके फैसले कुछ शक्तिशाली लोग लेते हैं, लेकिन उसकी कीमत सामान्य मनुष्य चुकाता है। सत्ता के गलियारों में लिए गए निर्णय किसी दूर गांव में रहने वाले किसान, किसी शहर में काम करने वाले मजदूर, किसी मां की गोद में पल रहे बच्चे और सीमा पर तैनात सैनिक के परिवार तक पहुंचते हैं। युद्ध में मारा जाने वाला प्रत्येक सैनिक केवल एक संख्या नहीं होता। वह किसी मां का बेटा, किसी पत्नी का जीवनसाथी, किसी बच्चे का पिता और किसी परिवार का भविष्य होता है। बम जब किसी इमारत को गिराता है तो केवल ईंट-पत्थर नहीं गिरते। उनके साथ स्मृतियां, रिश्ते, सपने और जीवन की छोटी-छोटी उम्मीदें भी मलबे में दब जाती हैं। युद्ध के नक्शे पर बनने वाली रेखाओं के पीछे असंख्य परिवारों की जिंदगी होती है। इसलिए किसी भी युद्ध को केवल सैन्य शक्ति, रणनीतिक जीत या राजनीतिक सफलता के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। Editorial
महात्मा गांधी ने अहिंसा को मानवता का सबसे बड़ा अस्त्र माना था। उनके विचारों का मूल संदेश यही था कि हिंसा का उत्तर हिंसा से देने पर हिंसा समाप्त नहीं होती, बल्कि उसका विस्तार होता है। गांधी से जुड़ा प्रसिद्ध कथन - “आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी”आज के परमाणु और मिसाइल युग में और भी अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। यदि प्रत्येक राष्ट्र अपने अपमान का बदला उससे बड़ी सैन्य शक्ति के प्रदर्शन से लेने लगे तो यह प्रतिस्पर्धा कहां जाकर रुकेगी? एक मिसाइल के जवाब में दूसरी मिसाइल, एक हमले के जवाब में उससे बड़ा हमला और फिर उसके जवाब में व्यापक प्रतिशोध। इस सिलसिले का अंतिम परिणाम क्या होगा? शायद कोई विजेता नहीं होगा। केवल कब्रिस्तान बढ़ेंगे, शहर उजड़ेंगे और मनुष्य की संवेदना घायल होगी। Editorial
गौतम बुद्ध ने मानव जीवन में करुणा, मैत्री और शांति को सर्वोच्च स्थान दिया। उनका संदेश था कि घृणा से घृणा समाप्त नहीं होती, बल्कि प्रेम और करुणा ही उसके अंत का रास्ता बन सकते हैं। यह संदेश केवल आध्यात्मिक जीवन के लिए नहीं है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी इसकी उतनी ही आवश्यकता है। राष्ट्रों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है। सुरक्षा, सीमाएं, संसाधन, राजनीतिक हित और राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे प्रश्न जटिल हो सकते हैं। लेकिन जटिलता का अर्थ यह नहीं कि समाधान केवल युद्ध ही है। जब संवाद के दरवाजे बंद होते हैं, तब हथियार बोलने लगते हैं और जब हथियार बोलते हैं, तब सबसे पहले मनुष्य की आवाज दबती है। Editorial
आज का युद्ध बीसवीं सदी के युद्धों से कहीं अधिक खतरनाक हो चुका है। अब युद्ध केवल बंदूक, टैंक और मिसाइल तक सीमित नहीं है। ड्रोन, साइबर हमले, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालित हथियार, उपग्रह तकनीक और परमाणु शक्ति ने युद्ध की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है। जिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, अंतरिक्ष अनुसंधान और मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है, वही तकनीक यदि विनाशकारी सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने लगे तो उसके परिणाम भयावह हो सकते हैं। विज्ञान स्वयं दोषी नहीं है। प्रश्न उसके इस्तेमाल का है। वैज्ञानिक उपलब्धियां मानव जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए हैं या उसे समाप्त करने के लिए यह फैसला अंततः मनुष्य को ही करना है। Editorial
अल्बर्ट आइंस्टीन से जुड़ी प्रसिद्ध चेतावनी कि उन्हें नहीं मालूम तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्व युद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा, मानवता को परमाणु युद्ध के संभावित परिणामों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। यदि परमाणु शक्ति का इस्तेमाल व्यापक युद्ध में हुआ तो विजेता और पराजित का अंतर भी शायद अर्थहीन हो जाएगा। युद्ध समाप्त होने के बाद भी विकिरण, प्रदूषण, बीमारी, विस्थापन और पीढ़ियों तक चलने वाली पीड़ा मनुष्य का पीछा कर सकती है। इसलिए परमाणु शक्ति का वास्तविक विवेकपूर्ण उपयोग युद्ध जीतना नहीं, बल्कि युद्ध को रोकना होना चाहिए। Editorial
मार्टिन लूथर किंग जूनियर का संदेश था कि अंधकार अंधकार को समाप्त नहीं कर सकता, केवल प्रकाश ही उसे दूर कर सकता है। यही बात राष्ट्रों के संबंधों पर भी लागू होती है। हिंसा से हिंसा को समाप्त करने की कोशिश वैसी ही है जैसे आग बुझाने के लिए आग का इस्तेमाल करना। युद्ध किसी पक्ष को कुछ समय के लिए सामरिक बढ़त दे सकता है, लेकिन स्थायी शांति नहीं दे सकता। स्थायी शांति के लिए संवाद, विश्वास, समझौता और पारस्परिक सम्मान आवश्यक हैं। इतिहास गवाह है कि कई कठिन और लंबे संघर्ष अंततः बातचीत की मेज पर ही समाप्त हुए हैं। इसलिए युद्ध से पहले बातचीत के हर दरवाजे को खुला रखना मानवता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए। Editorial
युद्ध का प्रभाव केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहता। ऊर्जा और तेल की आपूर्ति प्रभावित होने पर दुनिया के अनेक देशों में महंगाई बढ़ सकती है। परिवहन, उद्योग, खाद्यान्न, रोजगार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकते हैं। जिन देशों का प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में कोई पक्ष नहीं होता, उनके नागरिक भी अप्रत्यक्ष रूप से इसकी कीमत चुकाते हैं। गरीब और विकासशील देशों पर इसका बोझ और अधिक पड़ता है।
इस प्रकार कुछ देशों के बीच शुरू हुआ संघर्ष करोड़ों लोगों के जीवन की आर्थिक कठिनाइयों में बदल सकता है। युद्ध इसलिए केवल राजनीतिक संकट नहीं है। यह आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकट भी है। Editorial
युद्ध का सबसे दर्दनाक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। विद्यालयों की जगह शरणस्थल बन जाते हैं। खेल के मैदानों की जगह मलबा दिखाई देता है और किताबों की जगह भय उनकी स्मृतियों में बस जाता है। कल्पना कीजिए, एक बच्चा आसमान में उड़ते विमान को देखकर पक्षी समझने के बजाय बम गिरने की आशंका महसूस करे। तब हमें अपनी सभ्यता की उपलब्धियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। आखिर कैसी प्रगति है जिसमें मनुष्य चांद और मंगल तक पहुंचने की क्षमता हासिल कर चुका है, लेकिन पृथ्वी पर एक-दूसरे के साथ शांति से रहने की कला अभी भी नहीं सीख पाया? Editorial
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व की बड़ी शक्तियां अपनी सैन्य क्षमता के प्रदर्शन से अधिक अपनी कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन करें। युद्ध की तैयारी से अधिक शांति की तैयारी होनी चाहिए। हथियारों पर होने वाले विशाल खर्च का कुछ हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, गरीबी उन्मूलन और मानव विकास पर लगाया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अधिक प्रभावी और विश्वसनीय बनाया जाना चाहिए, ताकि संकट के समय संवाद के रास्ते खुले रहें। किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी राष्ट्र की सुरक्षा पूरी मानवता की असुरक्षा की कीमत पर नहीं हो सकती। Editorial
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव हो या दुनिया के किसी भी हिस्से में संघर्ष मानवता का मूल प्रश्न एक ही है: क्या हम विवादों को बातचीत से सुलझाने की क्षमता खोते जा रहे हैं? यदि ऐसा है तो यह केवल कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की पराजय होगी। सत्ता बदल सकती है। सीमाएं बदल सकती हैं। सरकारें बदल सकती हैं। लेकिन एक बार खोया हुआ जीवन वापस नहीं आता। ध्वस्त शहर फिर बनाए जा सकते हैं, लेकिन मृतकों को वापस नहीं लाया जा सकता। टूटे हुए पुल फिर बनाए जा सकते हैं, लेकिन बचपन की खोई हुई मुस्कान वापस नहीं लौटती। Editorial
आज मानवता को तय करना होगा कि उसे विज्ञान का इस्तेमाल जीवन बचाने के लिए करना है या जीवन समाप्त करने के लिए। उसे अपनी शक्ति का परिचय मिसाइलों से देना है या संवाद की क्षमता से।
उसे आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की कहानियां देनी हैं या शांति की विरासत। गांधी की अहिंसा, बुद्ध की करुणा, मार्टिन लूथर किंग का प्रकाश और आइंस्टीन की चेतावनी हमें एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं मानवता को बचाने का रास्ता बारूद से नहीं, विवेक से होकर जाता है। आज आवश्यकता किसी एक देश की जीत की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की जीत की है। यदि दुनिया के राष्ट्र समय रहते यह समझ लें कि युद्ध में अंततः किसी की वास्तविक विजय नहीं होती, तो शायद बारूद की गंध के बीच फिर से संवाद की खुशबू लौट सकती है। क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विनाश करने की क्षमता नहीं, बल्कि विनाश को रोक देने की क्षमता है। यही क्षमता सभ्यता की असली पहचान है और यही मानवता को सर्वनाश की ओर बढ़ते कदमों से वापस जीवन, शांति और सह-अस्तित्व की ओर ला सकती है। Editorial
संजीव ठाकुर, रायपुर, छत्तीसगढ़
फिर से मासूम नन्हे हो जाएं,
जैसे पहली बार ओस को
हथेली पर रखा हमने,
वह मुस्कुरा उठी।
फिर उतने ही छोटे हो जाएं,
आकाश हमें अनंत लगे,
उसकी नीली चुप्पी में
सपनों की पतंग लहरा दें।
जहां कोई छल न हो,
बस मिट्टी में उगती
सोंधी-सी सच्चाई हो,
आंखें पानी-सी निर्मल हों,
हृदय शिवालय की घंटी-सा
शिव-शिव बोल उठे।
फिर से वैसे ही हो जाएं,
पहली बार “राम” नाम सुना
किसी लोरी की तरह नहीं,
शीतल-कोमल हवा की तरह
भीतर गूंजा।
ईश्वर किताबों में नहीं,
पेड़ों की छांव में निहारता,
जहां मां की उंगलियों में
पूजा-अर्चना का
सात्विक मायने छिपा हो।
फिर से मासूम नन्हे हो जाएं,
जीतने की जल्दी न हो,
गिरकर भी
खिलखिलाने का हौसला हो।
जहां किसी के आंसू देखकर
मन की निर्झरणी बहने लगे।
इतने छोटे हो जाएं
कि दुनिया की सारी ईर्ष्या
होठों तक पहुंच ही न पाए।
हम अपनी जेब में
शीतल छांव के बादल
रखकर सबको भीतर
समेट लें।
फिर से मासूम नन्हे हो जाएं,
एक शुभ प्रार्थना बन जाएं
और हम
प्रार्थना के सबसे भोले शब्द।
— संजीव ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक एवं स्तंभकार
रायपुर, छत्तीसगढ़
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