डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती पर पढ़िए वीरेश तिवारी का विशेष आलेख। रामेश्वरम से राष्ट्रपति भवन और अंतिम व्याख्यान तक की यात्रा से जानिए शिक्षा, विज्ञान, सादगी और राष्ट्रनिर्माण के संदेश।

कुछ लोग जीवन में ऊँचे पदों तक पहुँचते हैं, कुछ इतिहास में अपना नाम दर्ज कराते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने जीवन को ही एक ऐसी पुस्तक बना देते हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ बार-बार पढ़ती हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इसी तीसरी श्रेणी के व्यक्तित्व थे। उन्होंने वैज्ञानिक के रूप में भारत की सामरिक क्षमता को मजबूत करने में योगदान दिया, राष्ट्रपति के रूप में सर्वोच्च संवैधानिक पद को आम नागरिकों के निकट पहुँचाया और शिक्षक के रूप में देश के बच्चों तथा युवाओं में बड़े सपने देखने का साहस पैदा किया। डॉ. कलाम की महानता केवल इस बात में नहीं थी कि वे भारत के राष्ट्रपति बने। उनकी असली विशेषता यह थी कि राष्ट्रपति भवन पहुँचने के बाद भी उनके भीतर का शिक्षक जीवित रहा और राष्ट्रपति पद से विदा होने के बाद भी उन्होंने स्वयं को विद्यार्थियों, युवाओं और ज्ञान की दुनिया से अलग नहीं किया।
उनकी जीवन यात्रा हमें एक महत्त्वपूर्ण सवाल के सामने खड़ा करती है—क्या किसी व्यक्ति की पहचान उसके पद से बनती है या उस योगदान से, जिसे वह अपने पद से आगे बढ़कर समाज को देता है? 15 अक्टूबर को उनकी जयंती पर इस प्रश्न पर विचार करना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि आज भारत को केवल सफल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि अपनी सफलता को समाज के हित में लगाने वाले नागरिकों की भी जरूरत है।
डॉ. अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता जैनुलाब्दीन नाव से जुड़े काम करते थे और उनकी माता आशियम्मा परिवार की देखभाल करती थीं। आर्थिक परिस्थितियाँ सीमित थीं, लेकिन सीखने की इच्छा और जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प मजबूत था। बचपन में कलाम ने अखबार वितरण जैसे कामों के माध्यम से परिवार की सहायता की। उनके जीवन का यह आरंभिक संघर्ष बताता है कि संसाधनों की कमी किसी प्रतिभा की अंतिम सीमा नहीं होती। उचित अवसर, शिक्षा, अनुशासन और निरंतर मेहनत किसी साधारण शुरुआत को असाधारण उपलब्धि में बदल सकते हैं। रामेश्वरम का सामाजिक वातावरण भी उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण रहा। उनके जीवन से जुड़े संस्मरणों में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के लोगों के बीच संवाद और आपसी सम्मान के प्रसंग मिलते हैं। यही अनुभव आगे चलकर उनके व्यापक मानवीय दृष्टिकोण का हिस्सा बने। आज जब समाज अनेक प्रकार के विभाजनों और पूर्वाग्रहों से जूझ रहा है, तब कलाम का जीवन याद दिलाता है कि किसी बच्चे की प्रतिभा को उसकी आर्थिक स्थिति, धर्म, जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर नहीं आँकना चाहिए। अवसरों के दरवाजे खुले हों, तो प्रतिभा पूरे राष्ट्र की शक्ति बन सकती है।

कलाम ने सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से भौतिक विज्ञान की पढ़ाई की और बाद में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में वैमानिकी अभियांत्रिकी का अध्ययन किया। विमान, उड़ान और अंतरिक्ष तकनीक के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें विज्ञान और अनुसंधान की दुनिया में आगे बढ़ाया। उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में काम करते हुए देश के वैज्ञानिक कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। भारतीय उपग्रह प्रक्षेपण यान SLV-3 के विकास में परियोजना निदेशक के रूप में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। जुलाई 1980 में इसी प्रक्षेपण यान से रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस सफलता को किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और अनेक संस्थानों का सामूहिक परिश्रम था। कलाम की विशेषता यह थी कि वे अलग-अलग विशेषज्ञताओं को एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य से जोड़ने में सक्षम थे। यहीं से उनके जीवन की एक बड़ी सीख सामने आती है—बड़ी उपलब्धियाँ अकेले प्रतिभाशाली होने से नहीं मिलतीं। वे तब हासिल होती हैं, जब व्यक्तिगत क्षमता को टीमवर्क, अनुशासन और साझा उद्देश्य के साथ जोड़ा जाता है।
डॉ. कलाम की यात्रा का एक उल्लेखनीय प्रसंग वर्ष 1979 के SLV-3 प्रक्षेपण से जुड़ा है, जब पहला प्रयास अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। उस समय इसरो के तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश धवन ने सार्वजनिक रूप से जिम्मेदारी संभाली। अगले वर्ष प्रक्षेपण सफल हुआ, तो उन्होंने सफलता का श्रेय अपनी टीम और कलाम जैसे वैज्ञानिकों को दिया। यह प्रसंग नेतृत्व के उस सिद्धांत को सामने रखता है, जिसकी आज भी सार्वजनिक जीवन में उतनी ही आवश्यकता है—असफलता आने पर जिम्मेदारी स्वीकार करना और सफलता मिलने पर सहयोगियों को श्रेय देना। नेतृत्व का अर्थ केवल उपलब्धियों के समय मंच पर उपस्थित रहना नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ कठिन परिस्थितियों में टीम के साथ खड़े रहना, गलतियों से सीखना और दूसरों के योगदान का सम्मान करना है। राजनीति, प्रशासन, उद्योग और सामाजिक संगठनों में काम करने वाले लोगों के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण संदेश है। पद व्यक्ति को अधिकार देता है, लेकिन उसका आचरण ही तय करता है कि वह वास्तव में नेतृत्व करने योग्य है या नहीं।

अंतरिक्ष कार्यक्रम में योगदान के बाद कलाम ने स्वदेशी निर्देशित मिसाइलों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के प्रमुख वैज्ञानिक चेहरों में शामिल थे। अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइल प्रणालियों के विकास से जुड़े उनके योगदान के कारण उन्हें ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से पहचान मिली। वर्ष 1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के दौरान भी उन्होंने वैज्ञानिक और समन्वयकारी भूमिका निभाई। उनके कार्य ने भारत की सामरिक क्षमता और रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक के महत्त्व को रेखांकित किया। लेकिन कलाम के व्यक्तित्व को केवल मिसाइलों और रक्षा तकनीक तक सीमित कर देना उनके व्यापक योगदान को छोटा करना होगा। वे विज्ञान को राष्ट्रीय विकास, शिक्षा और समाज की आवश्यकताओं से जोड़कर देखते थे। उनका मानना था कि भारत को महत्त्वपूर्ण तकनीकों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क्षमताओं का विकास करना चाहिए। आज आत्मनिर्भरता की चर्चा करते समय उनके जीवन से यह सीख ली जा सकती है कि तकनीकी आत्मनिर्भरता केवल नारे से नहीं आती। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार, संस्थागत सहयोग और दीर्घकालीन निवेश आवश्यक हैं।
25 जुलाई 2002 को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 तक रहा। एक वैज्ञानिक का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँचना भारतीय लोकतंत्र और सार्वजनिक जीवन में ज्ञान की भूमिका का उल्लेखनीय उदाहरण बना। कलाम को ‘जनता के राष्ट्रपति’ के रूप में पहचान मिली। इसके पीछे उनका सरल व्यक्तित्व, विद्यार्थियों से संवाद और युवाओं के प्रति विशेष लगाव था। वे बच्चों से मिलते, उनके प्रश्न सुनते और उन्हें विज्ञान, शिक्षा तथा राष्ट्रनिर्माण के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करते थे। वे केवल बड़े सपने देखने की बात नहीं करते थे, बल्कि उन सपनों को ज्ञान, मेहनत, अनुशासन और कौशल से जोड़ने पर जोर देते थे। यही कारण था कि विद्यार्थियों के बीच उनकी लोकप्रियता किसी औपचारिक पद या प्रोटोकॉल की मोहताज नहीं रही। राष्ट्रपति भवन भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा का प्रतीक है। लेकिन किसी पद की प्रतिष्ठा को आम नागरिकों के लिए सार्थक बनाना उस पद पर आसीन व्यक्ति के व्यवहार और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। कलाम ने युवाओं से संवाद को अपने सार्वजनिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाकर यह दिखाया कि ज्ञान और संवेदनशीलता सत्ता की गरिमा को और बढ़ा सकते हैं।
25 जुलाई 2007 को राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूरा होने के बाद कलाम सार्वजनिक जीवन से दूर नहीं हुए। उन्होंने शिक्षा, शोध, लेखन और विद्यार्थियों से संवाद को अपनी प्राथमिकता बनाए रखा। विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में व्याख्यान देकर वे युवाओं को विज्ञान, तकनीक और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। यहीं उनके जीवन का वह पक्ष सामने आता है, जिस पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए। सामान्यतः लोग किसी बड़े पद को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मान लेते हैं। पद समाप्त होने पर उनकी पहचान और सक्रियता भी सीमित हो जाती है। कलाम ने इसके विपरीत रास्ता चुना। उन्होंने अपनी पहचान को कुर्सी से नहीं, काम से जोड़े रखा। राष्ट्रपति भवन से बाहर आने के बाद भी वे शिक्षक थे, लेखक थे, वैज्ञानिक सोच रखने वाले मार्गदर्शक थे और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत थे। उनकी जीवन यात्रा पूछती है कि क्या हमारी पहचान केवल उस पद से तय होनी चाहिए, जिस पर हम बैठे हैं, या उस उपयोगिता से भी, जिसे हम पद छोड़ने के बाद समाज को देते हैं? स्थायी सम्मान वही अर्जित करता है, जो अपने अनुभव और ज्ञान को दूसरों के लिए उपयोगी बनाता है। पद अस्थायी हो सकता है, लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदारी जीवनभर बनी रह सकती है।

कलाम की सार्वजनिक छवि का एक महत्त्वपूर्ण पहलू उनकी सादगी और काम के प्रति समर्पण था। उनके सहयोगियों और परिचितों के संस्मरणों में अध्ययन, अनुशासन, समय के उपयोग और साधारण जीवनशैली से जुड़े प्रसंग मिलते हैं। उनकी पहचान बाहरी दिखावे से अधिक उनके ज्ञान, विचार और कार्य से बनी। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि सार्वजनिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सादगी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आज जब सफलता को अक्सर महँगी गाड़ियों, बड़े घरों, महँगे कपड़ों और सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली चमक से मापा जाता है, तब कलाम की जीवनशैली हमें सफलता की दूसरी परिभाषा पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। किसी व्यक्ति का वास्तविक मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि उसके पास कितनी संपत्ति है, बल्कि इस बात से भी तय होना चाहिए कि उसके ज्ञान, आचरण और काम से कितने लोगों को लाभ पहुँचा। यह किसी एक प्रकार की जीवनशैली अपनाने का आग्रह नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं को समझने की सीख है। कलाम ने अपनी सार्वजनिक पहचान को व्यक्तिगत वैभव के प्रदर्शन के बजाय ज्ञान, सेवा और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ा।
कलाम का जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ, लेकिन उनके जीवन से जुड़े संस्मरण विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान और संवाद के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यक्तित्व में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय संवेदना और सामाजिक सद्भाव साथ-साथ दिखाई देते हैं। आज के भारत के संदर्भ में यह पक्ष विशेष महत्त्व रखता है। विविधता किसी देश की केवल जनसंख्या संबंधी विशेषता नहीं होती; वह उसके सामाजिक व्यवहार की भी परीक्षा होती है। अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और परंपराओं के लोग एक-दूसरे के प्रति सम्मान रखते हुए साथ काम कर सकें, तो विविधता राष्ट्रीय शक्ति बनती है। कलाम का जीवन हमें महान व्यक्तियों को संकीर्ण खाँचों में बाँटकर देखने के बजाय उनके व्यापक योगदान को समझने की प्रेरणा देता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा, मानवीय मूल्यों और आपसी सम्मान को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय समाज की साझा ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए।
डॉ. कलाम एक वैज्ञानिक और राष्ट्रपति होने के साथ-साथ प्रभावशाली लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा Wings of Fire ने अनेक पाठकों को उनकी जीवन यात्रा से परिचित कराया। India 2020, Ignited Minds और My Journey जैसी पुस्तकों में उनके अनुभव, विचार और भारत के भविष्य से जुड़े सपने सामने आते हैं। उनके लिए विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं था। विज्ञान और तकनीक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भरता और युवाओं की भागीदारी उनके विचारों के महत्त्वपूर्ण हिस्से थे। लेकिन उनके विचारों को केवल प्रेरणादायक वाक्यों और नारों तक सीमित कर देना उनके साथ न्याय नहीं होगा। यदि कोई विद्यार्थी उनकी पुस्तक पढ़ता है, तो उसे बड़े सपने देखने के साथ अध्ययन और कौशल विकास की जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए। कोई कारोबारी उनकी यात्रा से प्रेरणा ले, तो उसे नवाचार, टीमवर्क और दीर्घकालीन दृष्टि पर भी ध्यान देना चाहिए। कोई जनप्रतिनिधि उनके जीवन से सीख ले, तो उसे शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और सार्वजनिक संस्थाओं की गुणवत्ता को अपने काम का हिस्सा बनाना चाहिए। महान व्यक्तियों की स्मृति तभी उपयोगी होती है, जब वह हमारे व्यवहार में कोई सकारात्मक बदलाव लाती है।
27 जुलाई 2015 को डॉ. कलाम शिलांग स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM Shillong) में विद्यार्थियों को व्याख्यान देने पहुँचे थे। उनके व्याख्यान का विषय था—Creating a Livable Planet Earth, अर्थात ऐसी पृथ्वी का निर्माण, जहाँ जीवन बेहतर ढंग से फल-फूल सके। व्याख्यान के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी और वे गिर पड़े। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसी दिन उनका निधन हो गया। वे 83 वर्ष के थे। उनके अंतिम क्षणों से जुड़ा एक भावनात्मक कथन अक्सर सुनने को मिलता है कि वे पढ़ाते हुए अंतिम साँस लेना चाहते थे। हालाँकि इस कथन के ठीक इन्हीं शब्दों में कहे जाने की पुष्टि के लिए विश्वसनीय प्रमाण आवश्यक हैं। इसलिए इसे उनके प्रमाणित कथन के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनकी जीवन यात्रा के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा। प्रमाणित घटना अपने आप में अत्यंत अर्थपूर्ण है। राष्ट्रपति पद छोड़ने के वर्षों बाद भी वे विद्यार्थियों के बीच थे, व्याख्यान दे रहे थे और ज्ञान बाँटने के काम में सक्रिय थे। उनकी मृत्यु को किसी चमत्कार या पूर्वनिर्धारित इच्छा के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। उनका जीवन स्वयं यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उन्होंने अपने अंतिम वर्षों में भी शिक्षा और युवाओं के साथ संवाद को प्राथमिकता दी। किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्य केवल उसकी आयु से नहीं मापा जाता। यह भी देखा जाना चाहिए कि उसने अपने समय, प्रतिभा और अनुभव का कितना हिस्सा दूसरों के हित में लगाया।
भारत के सामने आज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सामाजिक विश्वास और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। किसी महान व्यक्ति की जीवनी पढ़ लेने भर से इन चुनौतियों का समाधान नहीं हो सकता, लेकिन उसका जीवन सही दिशा चुनने में मदद अवश्य कर सकता है
विद्यार्थियों के लिए संदेश: आर्थिक सीमाएँ भविष्य का अंतिम फैसला नहीं होतीं। अध्ययन, कौशल और निरंतर मेहनत से नए रास्ते बनाए जा सकते हैं।
शिक्षकों के लिए संदेश: शिक्षा केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। इसका उद्देश्य जिज्ञासा, तर्क, चरित्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना भी है।
वैज्ञानिकों और उद्यमियों के लिए संदेश: नवाचार, सहयोग और दीर्घकालीन दृष्टि के बिना कोई देश तकनीकी रूप से मजबूत नहीं बन सकता।
राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व के लिए संदेश: जिम्मेदारी स्वीकार करना, टीम को सम्मान देना और जनता के साथ संवाद बनाए रखना पद की गरिमा को बढ़ाता है।
आम नागरिकों के लिए संदेश: राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारों, संस्थानों या बड़े नेताओं की जिम्मेदारी नहीं है। अपने काम में ईमानदारी, बच्चों की शिक्षा में सहयोग, सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान और समाज में आपसी विश्वास बनाए रखना भी राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा है।
कलाम की विरासत हमें केवल सपने देखने के लिए नहीं, बल्कि उन सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी पुस्तकें पढ़ी जा सकती हैं, उनके वैज्ञानिक योगदान का अध्ययन किया जा सकता है और उनके जीवन से निकले मूल्यों पर विचार किया जा सकता है। उनकी यात्रा किसी एक पद, पुरस्कार या उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है, जिसने ज्ञान के माध्यम से अपनी सीमाओं का विस्तार किया और अपने अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास किया। राष्ट्रपति भवन में बिताए पाँच वर्षों ने उन्हें देश का प्रथम नागरिक बनाया, लेकिन विद्यार्थियों के बीच बिताए वर्षों ने उन्हें करोड़ों लोगों के मन में स्थायी स्थान दिलाया। विज्ञान ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी, लेखन ने उनके विचारों को दूर तक पहुँचाया और शिक्षा के प्रति समर्पण ने उनके जीवन को व्यापक सामाजिक अर्थ दिया। भारत को आज भी ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है, जो बड़े सपने देखें, लेकिन केवल अपने लिए नहीं; जो सफलता चाहें, लेकिन जिम्मेदारी से समझौता करके नहीं; जो पद प्राप्त करें, लेकिन पद को ही अपनी संपूर्ण पहचान न बना लें। डॉ. कलाम की विरासत का सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि हम उनकी तस्वीरों पर मालाएँ चढ़ाने के साथ-साथ उनके जीवन से निकली सीख को अपने व्यवहार में भी उतारें। क्योंकि किसी महान व्यक्ति को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका केवल उसकी जयंती मनाना नहीं, बल्कि उसके विचारों से अगली पीढ़ी का भविष्य बेहतर बनाना है।
वीरेश तिवारी
लेखक एवं स्तंभकार
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा प्राधिकरण
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