एशियन गेम्स 2026 में भारत के चौथे स्थान और 85 पदकों के प्रदर्शन पर गंभीर मंथन। जानिए प्रतिभा खोज, खेल व्यवस्था, पारदर्शिता और वैज्ञानिक प्रशिक्षण की चुनौतियां।

दृष्टिकोण | रमन पाल सिंह, सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक, राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित | ग्रेटर नोएडा
एशियन गेम्स 2026 का समापन हो चुका है। भारत ने कुल 85 पदक हासिल किए और पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा। देश के सभी पदक विजेता खिलाड़ियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया है। लेकिन इन उपलब्धियों के साथ कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जिन पर देश को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। वर्ष 2023 में हुए एशियन गेम्स में भी भारत पदक तालिका में चौथे स्थान पर ही था, लेकिन उस समय भारत ने कुल 107 पदक जीते थे। इस बार पदकों की संख्या घटकर 85 रह गई। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि इसे खेलों की उन्नति कहा जाए या अवनति?
भारत आज दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में है। हम वर्ष 2036 के ओलंपिक की मेजबानी की दावेदारी कर रहे हैं और यह भी कहा जा रहा है कि भारत ओलंपिक में कम से कम पांचवें स्थान पर रहने का लक्ष्य रखता है। लक्ष्य बड़े होने चाहिए और सपने भी बड़े होने चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी तैयारी भी उन लक्ष्यों के अनुरूप है? दुनिया के अनेक देश अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में शीर्ष स्थान हासिल करने के लिए अपने संसाधनों, प्रतिभाओं और खेल व्यवस्था को पूरी ताकत के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। दूसरी ओर, भारत जैसा विशाल देश एशियन गेम्स में अपना चौथा स्थान बनाए रखने के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है।
140 करोड़ की आबादी में प्रतिभाओं की कमी कैसे हो सकती है? भारत की विशाल आबादी को देखते हुए प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं हो सकती। आवश्यकता है उन्हें तलाशने और तराशने की। भारत सरकार और सभी राज्य सरकारों को खेलों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए गांव-गांव और कस्बे-कस्बे तक प्रतिभा खोज अभियान चलाना चाहिए। देश के दूरदराज क्षेत्रों में ऐसे हजारों बच्चे हो सकते हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनने की क्षमता है, लेकिन उन्हें न उचित प्रशिक्षण मिल रहा है, न संसाधन और न ही सही मंच। यह विचार करने का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों है कि हरियाणा के खिलाड़ी देश के लिए बड़ी संख्या में पदक जीतते हैं, जबकि अनेक राज्यों की उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय खेलों में बेहद सीमित दिखाई देती है?
निश्चित रूप से हैं। जरूरत केवल उन्हें खोजने और उचित अवसर देने की है। खेलों को खेल माफिया से मुक्त करना होगा। खेलों की उन्नति के लिए एक और महत्वपूर्ण विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा—खेलों की व्यवस्था में पारदर्शिता और खिलाड़ियों की वास्तविक भागीदारी। सभी खेलों को कथित खेल माफिया और अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त कराकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों की योग्यता तथा अनुभव को महत्व मिले। खेलों की कमान उन लोगों के हाथों में होनी चाहिए, जो खेल को समझते हैं और खिलाड़ी की जरूरत को महसूस करते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन खेल की वास्तविक दिशा तय करने में खिलाड़ियों और अनुभवी प्रशिक्षकों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए।
देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम और खेल सुविधाएं विकसित की गई हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन सुविधाओं का उपयोग कितना हो रहा है? कई जगह अत्याधुनिक खेल परिसर पर्याप्त उपयोग के अभाव में खाली पड़े रहते हैं। कहीं रखरखाव की समस्या है तो कहीं विभिन्न मॉडल और व्यवस्थाओं के बीच खेल गतिविधियां प्राथमिकता से पीछे चली जाती हैं। दूसरी ओर भारत के गांवों में अभावों के बीच पले-बढ़े बच्चे अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर देश के लिए पदक जीत रहे हैं। यह विरोधाभास हमें सोचने के लिए मजबूर करता है। अगर सीमित संसाधनों वाला ग्रामीण खिलाड़ी देश को अंतरराष्ट्रीय पदक दिला सकता है, तो आधुनिक सुविधाओं, बेहतर प्रशिक्षण और वैज्ञानिक खेल व्यवस्था के साथ हम कितनी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं—इसकी कल्पना की जा सकती है।
अब समय आ गया है कि भारत में खेल नीति केवल प्रतियोगिताओं और सुविधाओं तक सीमित न रहे। प्रतिभा की पहचान से लेकर अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक खिलाड़ी के पूरे सफर की जिम्मेदारी तय हो। प्रतिभा की खोज → वैज्ञानिक प्रशिक्षण → पोषण → मानसिक मजबूती → आधुनिक उपकरण → अंतरराष्ट्रीय exposure → उच्चस्तरीय प्रतियोगिताएं → पदक। इस पूरी प्रक्रिया को एक मजबूत और पारदर्शी व्यवस्था के रूप में विकसित करना होगा। खिलाड़ी को केवल पदक जीतने के समय याद करने की बजाय उसकी तैयारी के वर्षों में उसके साथ खड़ा होना होगा।
क्रिकेट भारत का लोकप्रिय खेल है और क्रिकेट खिलाड़ियों की उपलब्धियों पर देश को गर्व है। लेकिन भारत के खेल भविष्य को केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं किया जा सकता। एथलेटिक्स, कुश्ती, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, तीरंदाजी, भारोत्तोलन, तैराकी, जिम्नास्टिक, बैडमिंटन, टेबल टेनिस और अन्य खेलों में भारत के पास अपार संभावनाएं हैं। यदि इन खेलों पर भी उसी गंभीरता, संसाधन और जनभागीदारी के साथ ध्यान दिया जाए, तो भारत की पदक संख्या कई गुना बढ़ सकती है।
एशियन गेम्स में जो खिलाड़ी इस बार पदक हासिल नहीं कर सके, उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों का अध्ययन करते हुए अपनी कमियों को पहचानना चाहिए और पहले से अधिक मेहनत करनी चाहिए। खेल में हार अंतिम परिणाम नहीं होती। असली सफलता उस खिलाड़ी की है जो हार के बाद फिर उठता है और अगले अवसर के लिए पहले से अधिक मजबूत होकर मैदान में उतरता है। मेरा सपना है कि आने वाले समय में अधिक से अधिक भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पदक जीतें और ओलंपिक के पदक पोडियम पर खड़े होकर राष्ट्रगान को गुंजायमान करें।
भारत को खेलों में विश्व शक्ति बनाना है तो लक्ष्य केवल पांचवां स्थान हासिल करना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए कि भारत दुनिया के शीर्ष खेल राष्ट्रों में स्थायी रूप से अपनी जगह बनाए। इसके लिए सरकारों को खेलों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। प्रतिभाओं की खोज गांवों से करनी होगी, खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण देना होगा, खेल संस्थाओं में पारदर्शिता लानी होगी और खिलाड़ियों को निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान देना होगा। भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है। कमी है तो उस प्रतिभा को सही समय पर पहचानने, सही दिशा देने और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने वाली मजबूत व्यवस्था की।
एशियन गेम्स 2026 के परिणाम हमें निराश होने के बजाय आत्ममंथन का अवसर देते हैं। हमें तय करना होगा कि हम केवल चौथे स्थान पर संतोष करना चाहते हैं या आने वाले वर्षों में दुनिया के शीर्ष खेल राष्ट्रों में शामिल होना चाहते हैं। भारत के खेल और खिलाड़ियों की उन्नति हो, देश का तिरंगा अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों पर लगातार ऊंचा उठे और हमारे खिलाड़ी ओलंपिक पोडियम पर खड़े होकर राष्ट्रगान की धुन से पूरी दुनिया को गौरवान्वित करें—यही मेरी हार्दिक इच्छा और शुभकामना है।
जय हिंद!
रमन पाल सिंह
सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी)
राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित
ग्रेटर नोएडा
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