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भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस त्योहार को सबसे ज्यादा बकरीद और बकरा ईद के नाम से जाना जाता है। उर्दू भाषा में इसे ईद उल ज़ुहा भी कहा जाता है। हालांकि जैसे-जैसे आप दूसरे देशों की तरफ बढ़ते हैं इसके नाम भी बदलते जाते हैं। तुर्की में बकरीद को ‘कुर्बान बयरामी’ कहा जाता है।

दुनियाभर में मुस्लिम समुदाय ईद-उल-अज़हा (बकरीद) मनाने की तैयारी में जुटा हुआ है। भारत में इस त्योहार को आमतौर पर बकरीद या बकरा ईद कहा जाता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अलग-अलग देशों में इसी त्योहार को कई अलग नामों से जाना जाता है। कहीं इसे कुर्बानी का त्योहार कहा जाता है तो कहीं स्थानीय भाषा और संस्कृति के हिसाब से इसका नाम बदल जाता है। यही वजह है कि एक ही त्योहार दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग पहचान के साथ मनाया जाता है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार ईद-उल-अज़हा जुल हिज्जा महीने में मनाई जाती है जो इस्लामी साल का 12वां महीना होता है। भारत में इस साल बकरीद 28 मई को मनाई जाएगी। इस मौके पर लोग नमाज अदा करते हैं और कुर्बानी की परंपरा निभाते हैं।
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस त्योहार को सबसे ज्यादा बकरीद और बकरा ईद के नाम से जाना जाता है। उर्दू भाषा में इसे ईद उल ज़ुहा भी कहा जाता है। हालांकि जैसे-जैसे आप दूसरे देशों की तरफ बढ़ते हैं इसके नाम भी बदलते जाते हैं। तुर्की में बकरीद को ‘कुर्बान बयरामी’ कहा जाता है। यहां इसका मतलब कुर्बानी का त्योहार माना जाता है। वहीं बोस्निया, अल्बानिया और बुल्गारिया जैसे देशों में इसे ‘कुर्बान बजरम’ नाम से जाना जाता है।
अफ्रीका के कई देशों में भी बकरीद को अलग नामों से बुलाया जाता है। मोरक्को, अल्जीरिया, मिस्र और लीबिया में इसे ‘ईद अल-कबीर’ कहा जाता है। वहीं नाइजीरिया और पश्चिमी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह त्योहार ‘बब्बर सल्लाह’ के नाम से मशहूर है। सेनेगल और आसपास के इलाकों में लोग इसे ‘तबास्की’ या ‘तोबास्की’ कहते हैं। सोमालिया में बकरीद को ‘सीदवयनी’ नाम से जाना जाता है। हर देश में नाम अलग जरूर है लेकिन त्योहार की भावना और परंपरा एक जैसी ही रहती है।
दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में बकरीद को ‘इदुल अज़हा’ और ‘लेबारान हाजी’ कहा जाता है। वहीं ईरान में लोग इसे ‘ईद-ए-कुर्बान’ कहते हैं। अफगानिस्तान में यह त्योहार ‘लोय अख्तर’ नाम से जाना जाता है। कजाकिस्तान में इसे ‘कुर्बान ऐत’ कहा जाता है। वहीं कुर्दिश क्षेत्रों में लोग इसे ‘जेना कुर्बाने’ नाम से पहचानते हैं।
यूरोपीय देशों में भी बकरीद के नाम अलग हैं। जर्मनी में इसे ‘ओपफरफेस्ट’ कहा जाता है जबकि नीदरलैंड में यह ‘ओफ़रफेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे ‘फेस्टिवल ऑफ सैक्रिफाइस’ कहा जाता है। नाम भले ही बदल जाते हैं लेकिन त्योहार की भावना हर जगह एक जैसी रहती है। यही वजह है कि यह त्योहार दुनिया भर में अलग-अलग संस्कृति और भाषाओं के बीच भी लोगों को जोड़ता है।
ईद-उल-अज़हा को हज़रत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। मुस्लिम समुदाय में मान्यता है कि अल्लाह ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी थी। हज़रत इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। मान्यता के अनुसार, जैसे ही वह अपने बेटे की कुर्बानी देने वाले थे अल्लाह ने उनकी जगह एक दुंबा भेज दिया। उसी घटना की याद में मुस्लिम समुदाय बकरीद मनाता है और कुर्बानी की परंपरा निभाता है।
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