विज्ञापन
Pakistan-TTP Conflict : TTP लंबे समय से पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है। हाल के वर्षों में सबसे खूंखार हमले इसी संगठन ने किए हैं।

Pakistan-TTP Conflict: पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में रात भर चली मुठभेड़ में कम से कम नौ पुलिसकर्मी और 15 आतंकवादी मारे गए। डिप्टी पुलिस कमिश्नर अब्दुल कुदूस अचकज़ई ने रॉयटर्स को बताया कि ज़ियारत ज़िले में हुए इस हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तानी तालिबान (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान या TTP) ने ली है।आखिर ये TTP क्या है और क्यों इस्लामाबाद के लिए चुनौती बना हुआ है?
2007 में हुआ गठन
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में अलग-अलग काम करने वाले कई कट्टरपंथी सुन्नी इस्लामी गुटों को एक छत्र संगठन के रूप में 2007 में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) बनाया गया था।
टीटीपी की विचारधारा
पाकिस्तानी तालिबान, अफगान तालिबान से अलग एक संगठन है। हालांकि, इसने अफगान तालिबान के प्रति अपनी निष्ठा जताई है, जो अगस्त 2021 से काबुल की सत्ता पर काबिज है।
TTP का लक्ष्य
TTP का मुख्य उद्देश्य इस्लामाबाद की सरकार को गिराकर पाकिस्तान में इस्लामिक शरिया कानून की अपनी व्याख्या के आधार पर शासन स्थापित करना है।
पाकिस्तान की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती
TTP लंबे समय से पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है। हाल के वर्षों में सबसे खूंखार हमले इसी संगठन ने किए हैं। इनमें चर्च और स्कूलों पर हमले तथा 2012 में मलाला यूसुफजई पर गोलीबारी शामिल है। मलाला पर हमला इसलिए किया गया था क्योंकि वह महिलाओं की शिक्षा के अधिकार के लिए अभियान चला रही थीं। वह इस हमले में बाल-बाल बची थीं।हाल के दिनों में इस्लामाबाद और काबुल के बीच तनावपूर्ण संबंधों की मुख्य वजह भी टीटीपी ही है। इस्लामाबाद का आरोप है कि टीटीपी के नेता और लड़ाके अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकानों पर रह रहे हैं, जिसे काबुल नकारता है।
TTP का गढ़
TTP खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सबसे ज्यादा सक्रिय है। इसके अलावा बलूचिस्तान में भी इसकी मजबूत पैठ है। इसकी घुसपैठ दक्षिण पंजाब और शहरी सिंध में भी बताई जा रही है, लेकिन मुख्य गतिविधियां खैबर पख्तूनख्वा में ही केंद्रित हैं। टीटीपी अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा के ट्राइबल बेल्ट पर बहुत अधिक निर्भर है। यहीं से वह अपने लड़ाकों की भर्ती करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में अफगानिस्तान में लगभग 3,000 से 4,000 टीटीपी आतंकवादी मौजूद थे। अपने मकसद के लिए TTP पश्तून-केंद्रित नैरेटिव का भी इस्तेमाल करता है और अक्सर हज़ारा जैसे गैर-पश्तून समुदायों को निशाना बनाता है।
2014 में बेहद कमजोर हो गया था TTP
2014 के बाद पाकिस्तानी सेना ने ट्राइबल इलाकों में कई सैन्य अभियानों के जरिए TTP को काफी हद तक कमजोर कर दिया था। उसके ज्यादातर बड़े नेताओं को मार गिराया गया था और अधिकांश लड़ाके अफगानिस्तान भाग गए थे। लेकिन 2021 में सब कुछ बदल गया। अमेरिका और नाटो देशों के अचानक अफगानिस्तान से निकल जाने के बाद अगस्त 2021 में अफगान तालिबान दूसरी बार सत्ता में आ गया।
बातचीत की कोशिश
पाकिस्तान ने टीटीपी के साथ शांति वार्ता की कोशिश भी की थी। अफगान तालिबान की मध्यस्थता में हुई बातचीत के नतीजे में कई महीनों तक सीजफायर रहा, लेकिन यह योजना सफल नहीं हो सकी। 2022 के अंत में टीटीपी ने फिर से हमले शुरू कर दिए, जो आज तक जारी हैं।
विज्ञापन