हर किसी को पढ़नी चाहिए श्रीमद्भगवद्गीता

गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ समझ लेना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना है। यह जीवन का व्यावहारिक दर्शन है, निर्णय का विज्ञान है और आत्मबोध की यात्रा का मानचित्र है। इसे पढ़ना किसी एक आस्था से जुड़ना नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया शुरू करना है।

श्रीमद्भगवद्गीताा
श्रीमद्भगवद्गीताा
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar27 Feb 2026 12:24 PM
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Srimad Bhagavad Geeta : मनुष्य का जीवन जितना बाहर की चुनौतियों से घिरा है, उतना ही भीतर के सवालों से भी। बाहरी संघर्षों की गूंज सुनाई देती है, लेकिन अंदर चलने वाली बहस सही-गलत की कसौटी, कर्तव्य और इच्छा की खींचतान अक्सर अनकही रह जाती है। इसी भीतर के कुरुक्षेत्र में खड़े होकर मनुष्य अक्सर पूछता है क्या सही है, क्या गलत? क्या करना चाहिए, क्या छोड़ देना चाहिए? ऐसे ही निर्णायक क्षण में प्रकट हुआ एक संवाद आज भी उतना ही प्रासंगिक है गीता का संवाद। गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ समझ लेना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना है। यह जीवन का व्यावहारिक दर्शन है, निर्णय का विज्ञान है और आत्मबोध की यात्रा का मानचित्र है। इसे पढ़ना किसी एक आस्था से जुड़ना नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया शुरू करना है।

1. क्योंकि गीता हमें “कर्तव्य” की स्पष्टता देती है

जीवन का सबसे बड़ा संकट भ्रम है। जब परिस्थितियाँ उलझी हों भावनाएँ विचलित हों और परिणाम अनिश्चित हों, तब मनुष्य निर्णय लेने से डरता है। गीता हमें बताती है कि कर्तव्य परिणाम से बड़ा है। कर्म करते समय मन की शुद्धता और नीयत की स्पष्टता ही असली कसौटी है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में, जहाँ सफलता को ही अंतिम सत्य मान लिया गया है, गीता सिखाती है कि सफलता और असफलता दोनों अस्थायी हैं। स्थायी है केवल कर्म की ईमानदारी। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को भय से मुक्त करता है।

2. क्योंकि गीता तनाव और असुरक्षा से उबारती है

आधुनिक जीवन में चिंता एक सामान्य अवस्था बन चुकी है। भविष्य की अनिश्चितता, करियर का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ ये सब मन को अशांत करते हैं। गीता का संदेश है कि जो हमारे नियंत्रण में है, वही हमारा क्षेत्र है; जो नहीं है, उसे स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता है। यह स्वीकार्यता पलायन नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि हर परिस्थिति अस्थायी है और आत्मा अजर-अमर है, तब उसके भीतर एक गहरी स्थिरता जन्म लेती है। यही स्थिरता उसे कठिन समय में भी संतुलित रखती है।

3. क्योंकि गीता आत्मज्ञान की राह दिखाती है

मनुष्य अक्सर स्वयं को केवल शरीर और नाम-परिचय तक सीमित कर लेता है। गीता इस सीमित पहचान को तोड़ती है। वह बताती है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप आत्मा है जो न जन्म लेती है, न मरती है। यह विचार केवल दार्शनिक नहीं, व्यावहारिक भी है। जब व्यक्ति स्वयं को व्यापक दृष्टि से देखता है, तब छोटी-छोटी बातों पर क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष स्वतः कम होने लगते हैं। आत्मबोध से आत्मविश्वास जन्म लेता है, और आत्मविश्वास से साहस।

4. क्योंकि गीता नेतृत्व और प्रबंधन की पाठशाला है

आज कॉर्पोरेट जगत में नेतृत्व पर असंख्य पुस्तकें लिखी जाती हैं, लेकिन गीता का नेतृत्व सिद्धांत सरल और गहरा है नेता वह है जो पहले स्वयं को जीत ले। जो अपने मन, इंद्रियों और अहंकार पर नियंत्रण रखता है, वही दूसरों का मार्गदर्शन कर सकता है। निर्णय लेने की क्षमता, संकट में धैर्य, टीम के प्रति समर्पण ये सभी गुण गीता के शिक्षण में निहित हैं। यही कारण है कि अनेक प्रबंधन विशेषज्ञ इसे जीवन-प्रबंधन का श्रेष्ठ ग्रंथ मानते हैं।

5. क्योंकि गीता नैतिकता का जीवंत आधार है

समय बदलता है, समाज बदलता है, लेकिन नैतिक प्रश्न हमेशा बने रहते हैं। क्या किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई भी साधन उचित है? क्या निजी लाभ के लिए सार्वजनिक कर्तव्य छोड़ा जा सकता है? गीता का उत्तर स्पष्ट है धर्म वही है जो व्यापक हित में हो। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता देना ही सच्चा धर्म है। यह दृष्टि व्यक्ति को जिम्मेदार नागरिक बनाती है।

6. क्योंकि गीता हमें भावनात्मक संतुलन सिखाती है

क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार ये चारों मनुष्य को निर्णयहीन बना देते हैं। गीता बताती है कि इंद्रियों का अतिरेक ही पतन का कारण बनता है। संयम और संतुलन ही उन्नति का मार्ग है।भावनाओं को दबाना नहीं, उन्हें समझना और नियंत्रित करना यही गीता का संदेश है। यह शिक्षा व्यक्ति को परिपक्व बनाती है।

7. क्योंकि गीता कर्म और भाग्य का संतुलन समझाती है

अक्सर लोग असफलता को भाग्य पर छोड़ देते हैं या सफलता का पूरा श्रेय स्वयं को दे देते हैं। गीता इन दोनों अतियों से बचाती है। वह कहती है कि कर्म हमारा अधिकार है, फल नहीं। यह विचार व्यक्ति को अहंकार से बचाता है और निराशा से भी। जब फल की चिंता कम होती है, तब कर्म की गुणवत्ता बढ़ती है।

8. क्योंकि गीता युवाओं के लिए मार्गदर्शक है

आज का युवा अवसरों से भरा है, पर दिशा को लेकर असमंजस में भी है। करियर चुनना, रिश्तों को निभाना, समाज में अपनी भूमिका तय करना ये सभी प्रश्न उसे उलझाते हैं। गीता सिखाती है कि अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करना ही श्रेष्ठ है। दूसरों की राह पर चलने से बेहतर है अपनी क्षमता को पहचानना। यह शिक्षा युवाओं को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाती है।

9. क्योंकि गीता आंतरिक शांति का स्रोत है

बाहरी उपलब्धियाँ चाहे जितनी भी हों, यदि मन अशांत है तो सुख अधूरा है। गीता ध्यान, भक्ति और ज्ञान तीनों मार्गों का संतुलन प्रस्तुत करती है। भक्ति मन को नम्र बनाती है, ज्ञान बुद्धि को प्रखर करता है और कर्म जीवन को सार्थक बनाता है। इन तीनों का समन्वय ही पूर्णता है।

10. क्योंकि गीता समय से परे है

हजारों वर्ष पहले कहा गया यह संवाद आज भी उतना ही अर्थपूर्ण है। तकनीक बदल गई, जीवन शैली बदल गई, लेकिन मनुष्य का मन और उसके प्रश्न आज भी वही हैं। गीता किसी एक युग की नहीं, हर युग की पुस्तक है। यह केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि अध्ययन का भी विषय है। Srimad Bhagavad Geeta

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धर्म क्या है? श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि से समझिए असली अर्थ

लेकिन क्या धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित है? क्या वह किसी पहचान का नाम है? यदि ऐसा होता, तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े अर्जुन की दुविधा का समाधान इतने गहरे और सार्वकालिक रूप में संभव न होता। गीता धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से निकालकर जीवन की धुरी बना देती है।

गीता के अनुसार धर्म
गीता के अनुसार धर्म
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar26 Feb 2026 01:38 PM
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What is Dharma according to the Gita? : धर्म - यह शब्द सुनते ही हमारे मन में पूजा-पाठ, आचार-विचार या किसी विशेष संप्रदाय की छवि उभर आती है। लेकिन क्या धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित है? क्या वह किसी पहचान का नाम है? यदि ऐसा होता, तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े अर्जुन की दुविधा का समाधान इतने गहरे और सार्वकालिक रूप में संभव न होता। गीता धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से निकालकर जीवन की धुरी बना देती है।

भूमिका ही तय करती है उत्तरदायित्व

गीता में धर्म का सबसे सशक्त अर्थ है स्वधर्म, अर्थात अपनी प्रकृति और भूमिका के अनुरूप कर्तव्य। जब अर्जुन मोहवश युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें याद दिलाते हैं कि उनके सामने खड़ा प्रश्न केवल रिश्तों का नहीं, न्याय और अन्याय का है। यहाँ धर्म किसी कर्मकांड का आग्रह नहीं करता, बल्कि यह पूछता है आपकी भूमिका क्या है और उस भूमिका में आपका उत्तरदायित्व क्या है? स्वधर्म का अर्थ है अपने सत्य से समझौता न करना। यह भी स्पष्ट किया गया है कि परधर्म, चाहे वह कितना ही आकर्षक क्यों न लगे, अंततः व्यक्ति को भ्रमित करता है। अपनी प्रकृति के विपरीत चलना ही अधर्म की शुरुआत है। इसलिए गीता का धर्म बाहरी प्रदर्शन से अधिक आंतरिक ईमानदारी पर बल देता है।

धर्म और निष्काम कर्म

गीता का धर्म कर्म से जुड़ा है, लेकिन वह कर्म के परिणाम से बंधा नहीं है। “कर्मण्येवाधिकारस्ते” यह सूत्र केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है। धर्म वह है जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूर्ण समर्पण से निभाए, किंतु फल की चिंता से मुक्त रहे। आज के प्रतिस्पर्धी युग में सफलता को ही धर्म समझ लिया गया है। लेकिन गीता कहती है सफलता या असफलता धर्म का मापदंड नहीं; निष्ठा और नैतिकता ही उसका आधार हैं। जब कर्म स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक हित से जुड़ता है, तभी वह धर्म बनता है।

धर्म बनाम मोह

अर्जुन की दुविधा केवल युद्ध की नहीं थी वह मोह और करुणा के बीच उलझे थे। गीता इस सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करती है। करुणा धर्म का अंग है, पर मोह धर्म को धुंधला कर देता है। यदि न्याय के स्थान पर संबंधों को प्राथमिकता दी जाए, तो वह धर्म नहीं रह जाता। इस दृष्टि से धर्म का अर्थ कठोरता नहीं, बल्कि संतुलन है। धर्म वह है जो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर व्यापक सत्य का साथ दे। यह संतुलन ही गीता की विशेषता है।

धर्म और आत्मबोध

गीता का एक गहरा आयाम आत्मा की अमरता से जुड़ा है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर या भूमिका तक सीमित समझता है, तब धर्म भी सीमित हो जाता है। किंतु जब वह स्वयं को व्यापक चेतना का अंश मानता है, तब उसका धर्म भी व्यापक हो जाता है। आत्मबोध व्यक्ति को भय से मुक्त करता है और भय से मुक्त होकर ही धर्म का पालन संभव है। धर्म, इस अर्थ में, बाहरी नियमों का पालन मात्र नहीं; यह भीतर की जागरूकता है। जब निर्णय आत्मकेंद्रित न होकर सत्यकेंद्रित होते हैं, तभी धर्म जीवित रहता है।

आधुनिक संदर्भ में धर्म

आज धर्म अक्सर पहचान की राजनीति और बहसों का विषय बन जाता है। गीता हमें याद दिलाती है कि धर्म विभाजन नहीं, समन्वय की शक्ति है। यह हमें सिखाती है कि अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठा यही धर्म है। कार्यालय में कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी, न्यायपूर्ण निर्णय लेने वाला प्रशासक, निष्पक्ष शिक्षक, संवेदनशील नागरिक ये सब गीता की दृष्टि में धर्म के पालनकर्ता हैं। धर्म कोई मंच नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। What is Dharma according to the Gita?


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भगवान श्रीकृष्ण से सीखें जीवन जीने की कला

उनके विचार किसी एकांत आश्रम तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज, रिश्तों, संघर्ष, राजनीति और मन के भीतर उठते द्वंद्व हर जगह अपनी उपयोगिता साबित करते हैं। यही वजह है कि कृष्ण की सीख आज भी उतनी ही ताजा है, जितनी महाभारत के काल में थी।

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन-दर्शन
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन-दर्शन
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar26 Feb 2026 01:16 PM
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Life Mantras of Lord Krishna : अगर जीवन को कला माना जाए, तो श्रीकृष्ण उसके सबसे सधे हुए कलाकार हैं। वे केवल उपदेश देने वाले संत नहीं वे ऐसे मार्गदर्शक हैं जो जीवन के बीचों-बीच खड़े होकर जीने की राह दिखाते हैं। उनके विचार किसी एकांत आश्रम तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज, रिश्तों, संघर्ष, राजनीति और मन के भीतर उठते द्वंद्व हर जगह अपनी उपयोगिता साबित करते हैं। यही वजह है कि कृष्ण की सीख आज भी उतनी ही ताजा है, जितनी महाभारत के काल में थी।

कठिन वक्त में स्पष्टता ही सबसे बड़ा हथियार

कुरुक्षेत्र में अर्जुन का ठिठकना किसी योद्धा की कमजोरी भर नहीं था वह हर संवेदनशील इंसान के भीतर चलने वाली लड़ाई थी। जब रिश्ते सामने हों, कर्तव्य दबाव बनाए और भावनाएँ मन को जकड़ लें, तब सबसे मजबूत व्यक्ति भी निर्णय के मोड़ पर डगमगा जाता है। उसी क्षण भगवान कृष्ण का स्वर केवल युद्ध के लिए नहीं उठा वह जीवन के लिए चेतावनी और दिशा था। श्रीकृष्ण बताते हैं कि कठिन हालात से नजरें फेर लेना समाधान नहीं, सिर्फ टालना है। जीवन-कला यही है कि हम परिस्थिति को साफ़ आँखों से देखें, अपने भीतर के डर को पहचानें, और फिर विवेक व साहस के साथ आगे बढ़ें। समस्या से भागने में पलभर का सुकून मिल सकता है, लेकिन स्थायी रास्ता हमेशा सामना करने से ही निकलता है।

कर्म ही धर्म है

हमारे दुख का बड़ा कारण मेहनत नहीं, उम्मीदों का बोझ है। हम हर काम के साथ एक फाइनल रिजल्ट बांध देते हैं वही तय करता है कि आज हम खुश रहेंगे या टूट जाएंगे। कृष्ण इस मानसिक कैद से बाहर निकालते हैं। गीता में वे कहते हैं कर्म तुम्हारा धर्म है, लेकिन फल तुम्हारे नियंत्रण में नहीं। यही बात जीवन को सरल बनाती है। जब इंसान पूरी ईमानदारी से अपना सर्वश्रेष्ठ दे देता है और बाकी को समय के सत्य पर छोड़ देता है, तो चिंता की पकड़ ढीली पड़ती है और भीतर शांति उतरने लगती है

संतुलन ही परिपक्वता है

कृष्ण का व्यक्तित्व दरअसल विरोधाभासों का सबसे सुंदर संतुलन है। एक तरफ़ वे बांसुरी की धुन में जीवन को हल्का करते हैं, दूसरी तरफ़ युद्धभूमि में रणनीति की सबसे सधी हुई चाल चलते हैं। वे प्रेम के रंग भी जानते हैं और नीति की रेखा भी; कभी वे मित्र बनकर कंधा देते हैं, तो कभी मार्गदर्शक बनकर दिशा तय कर देते हैं। यही बहुआयामी संतुलन उन्हें अद्वितीय बनाता है। कृष्ण बताते हैं कि संवेदनशील रहना कमजोरी नहीं, बशर्ते निर्णय विवेक से लिया जाए। प्रेम कीजिए, पर न्याय की कसौटी न छोड़िए नरमी रखिए पर सिद्धांतों पर समझौता मत कीजिए। 

प्रेम भी एक साधना है

कृष्ण के जीवन में प्रेम है, लेकिन वह बंधन नहीं बनता। उनका संबंध राधा से हो या गोपियों से, उसमें अधिकार से अधिक आत्मीयता है। यह सिखाता है कि प्रेम किसी को बाँधने का नाम नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार करने का साहस है। कृष्ण की जीवन-कला कहती है जहाँ विश्वास है, वहाँ नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होती ।

संकट में स्थिरता

कृष्ण का एक और महत्वपूर्ण गुण है संकट में भी संतुलित रहना। चाहे मथुरा का अत्याचार हो या महाभारत का महायुद्ध, वे घबराते नहीं। वे परिस्थिति को समझते हैं, समय की प्रतीक्षा करते हैं और फिर उचित कदम उठाते हैं। जीवन में घबराहट निर्णय को धुंधला कर देती है। कृष्ण सिखाते हैं कि पहले मन को शांत कीजिए, फिर निर्णय लीजिए। स्थिर बुद्धि ही सही दिशा दिखाती है।

जीवन को उत्सव बनाना

कृष्ण का जीवन केवल संघर्ष की कथा नहीं, आनंद का भी उत्सव है। वे हँसते हैं, खेलते हैं, संगीत रचते हैं। यह संदेश देता है कि आध्यात्म गंभीरता का बोझ नहीं, भीतर की प्रसन्नता है। जिम्मेदारियाँ निभाइए, पर मुस्कान मत खोइए। यही जीवन-कला की परिपूर्णता है। Life Mantras of Lord Krishna

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