हर किसी को पढ़नी चाहिए श्रीमद्भगवद्गीता
गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ समझ लेना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना है। यह जीवन का व्यावहारिक दर्शन है, निर्णय का विज्ञान है और आत्मबोध की यात्रा का मानचित्र है। इसे पढ़ना किसी एक आस्था से जुड़ना नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया शुरू करना है।

Srimad Bhagavad Geeta : मनुष्य का जीवन जितना बाहर की चुनौतियों से घिरा है, उतना ही भीतर के सवालों से भी। बाहरी संघर्षों की गूंज सुनाई देती है, लेकिन अंदर चलने वाली बहस सही-गलत की कसौटी, कर्तव्य और इच्छा की खींचतान अक्सर अनकही रह जाती है। इसी भीतर के कुरुक्षेत्र में खड़े होकर मनुष्य अक्सर पूछता है क्या सही है, क्या गलत? क्या करना चाहिए, क्या छोड़ देना चाहिए? ऐसे ही निर्णायक क्षण में प्रकट हुआ एक संवाद आज भी उतना ही प्रासंगिक है गीता का संवाद। गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ समझ लेना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना है। यह जीवन का व्यावहारिक दर्शन है, निर्णय का विज्ञान है और आत्मबोध की यात्रा का मानचित्र है। इसे पढ़ना किसी एक आस्था से जुड़ना नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया शुरू करना है।
1. क्योंकि गीता हमें “कर्तव्य” की स्पष्टता देती है
जीवन का सबसे बड़ा संकट भ्रम है। जब परिस्थितियाँ उलझी हों भावनाएँ विचलित हों और परिणाम अनिश्चित हों, तब मनुष्य निर्णय लेने से डरता है। गीता हमें बताती है कि कर्तव्य परिणाम से बड़ा है। कर्म करते समय मन की शुद्धता और नीयत की स्पष्टता ही असली कसौटी है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में, जहाँ सफलता को ही अंतिम सत्य मान लिया गया है, गीता सिखाती है कि सफलता और असफलता दोनों अस्थायी हैं। स्थायी है केवल कर्म की ईमानदारी। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को भय से मुक्त करता है।
2. क्योंकि गीता तनाव और असुरक्षा से उबारती है
आधुनिक जीवन में चिंता एक सामान्य अवस्था बन चुकी है। भविष्य की अनिश्चितता, करियर का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ ये सब मन को अशांत करते हैं। गीता का संदेश है कि जो हमारे नियंत्रण में है, वही हमारा क्षेत्र है; जो नहीं है, उसे स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता है। यह स्वीकार्यता पलायन नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि हर परिस्थिति अस्थायी है और आत्मा अजर-अमर है, तब उसके भीतर एक गहरी स्थिरता जन्म लेती है। यही स्थिरता उसे कठिन समय में भी संतुलित रखती है।
3. क्योंकि गीता आत्मज्ञान की राह दिखाती है
मनुष्य अक्सर स्वयं को केवल शरीर और नाम-परिचय तक सीमित कर लेता है। गीता इस सीमित पहचान को तोड़ती है। वह बताती है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप आत्मा है जो न जन्म लेती है, न मरती है। यह विचार केवल दार्शनिक नहीं, व्यावहारिक भी है। जब व्यक्ति स्वयं को व्यापक दृष्टि से देखता है, तब छोटी-छोटी बातों पर क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष स्वतः कम होने लगते हैं। आत्मबोध से आत्मविश्वास जन्म लेता है, और आत्मविश्वास से साहस।
4. क्योंकि गीता नेतृत्व और प्रबंधन की पाठशाला है
आज कॉर्पोरेट जगत में नेतृत्व पर असंख्य पुस्तकें लिखी जाती हैं, लेकिन गीता का नेतृत्व सिद्धांत सरल और गहरा है नेता वह है जो पहले स्वयं को जीत ले। जो अपने मन, इंद्रियों और अहंकार पर नियंत्रण रखता है, वही दूसरों का मार्गदर्शन कर सकता है। निर्णय लेने की क्षमता, संकट में धैर्य, टीम के प्रति समर्पण ये सभी गुण गीता के शिक्षण में निहित हैं। यही कारण है कि अनेक प्रबंधन विशेषज्ञ इसे जीवन-प्रबंधन का श्रेष्ठ ग्रंथ मानते हैं।
5. क्योंकि गीता नैतिकता का जीवंत आधार है
समय बदलता है, समाज बदलता है, लेकिन नैतिक प्रश्न हमेशा बने रहते हैं। क्या किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई भी साधन उचित है? क्या निजी लाभ के लिए सार्वजनिक कर्तव्य छोड़ा जा सकता है? गीता का उत्तर स्पष्ट है धर्म वही है जो व्यापक हित में हो। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता देना ही सच्चा धर्म है। यह दृष्टि व्यक्ति को जिम्मेदार नागरिक बनाती है।
6. क्योंकि गीता हमें भावनात्मक संतुलन सिखाती है
क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार ये चारों मनुष्य को निर्णयहीन बना देते हैं। गीता बताती है कि इंद्रियों का अतिरेक ही पतन का कारण बनता है। संयम और संतुलन ही उन्नति का मार्ग है।भावनाओं को दबाना नहीं, उन्हें समझना और नियंत्रित करना यही गीता का संदेश है। यह शिक्षा व्यक्ति को परिपक्व बनाती है।
7. क्योंकि गीता कर्म और भाग्य का संतुलन समझाती है
अक्सर लोग असफलता को भाग्य पर छोड़ देते हैं या सफलता का पूरा श्रेय स्वयं को दे देते हैं। गीता इन दोनों अतियों से बचाती है। वह कहती है कि कर्म हमारा अधिकार है, फल नहीं। यह विचार व्यक्ति को अहंकार से बचाता है और निराशा से भी। जब फल की चिंता कम होती है, तब कर्म की गुणवत्ता बढ़ती है।
8. क्योंकि गीता युवाओं के लिए मार्गदर्शक है
आज का युवा अवसरों से भरा है, पर दिशा को लेकर असमंजस में भी है। करियर चुनना, रिश्तों को निभाना, समाज में अपनी भूमिका तय करना ये सभी प्रश्न उसे उलझाते हैं। गीता सिखाती है कि अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करना ही श्रेष्ठ है। दूसरों की राह पर चलने से बेहतर है अपनी क्षमता को पहचानना। यह शिक्षा युवाओं को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाती है।
9. क्योंकि गीता आंतरिक शांति का स्रोत है
बाहरी उपलब्धियाँ चाहे जितनी भी हों, यदि मन अशांत है तो सुख अधूरा है। गीता ध्यान, भक्ति और ज्ञान तीनों मार्गों का संतुलन प्रस्तुत करती है। भक्ति मन को नम्र बनाती है, ज्ञान बुद्धि को प्रखर करता है और कर्म जीवन को सार्थक बनाता है। इन तीनों का समन्वय ही पूर्णता है।
10. क्योंकि गीता समय से परे है
हजारों वर्ष पहले कहा गया यह संवाद आज भी उतना ही अर्थपूर्ण है। तकनीक बदल गई, जीवन शैली बदल गई, लेकिन मनुष्य का मन और उसके प्रश्न आज भी वही हैं। गीता किसी एक युग की नहीं, हर युग की पुस्तक है। यह केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि अध्ययन का भी विषय है। Srimad Bhagavad Geeta
Srimad Bhagavad Geeta : मनुष्य का जीवन जितना बाहर की चुनौतियों से घिरा है, उतना ही भीतर के सवालों से भी। बाहरी संघर्षों की गूंज सुनाई देती है, लेकिन अंदर चलने वाली बहस सही-गलत की कसौटी, कर्तव्य और इच्छा की खींचतान अक्सर अनकही रह जाती है। इसी भीतर के कुरुक्षेत्र में खड़े होकर मनुष्य अक्सर पूछता है क्या सही है, क्या गलत? क्या करना चाहिए, क्या छोड़ देना चाहिए? ऐसे ही निर्णायक क्षण में प्रकट हुआ एक संवाद आज भी उतना ही प्रासंगिक है गीता का संवाद। गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ समझ लेना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना है। यह जीवन का व्यावहारिक दर्शन है, निर्णय का विज्ञान है और आत्मबोध की यात्रा का मानचित्र है। इसे पढ़ना किसी एक आस्था से जुड़ना नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की प्रक्रिया शुरू करना है।
1. क्योंकि गीता हमें “कर्तव्य” की स्पष्टता देती है
जीवन का सबसे बड़ा संकट भ्रम है। जब परिस्थितियाँ उलझी हों भावनाएँ विचलित हों और परिणाम अनिश्चित हों, तब मनुष्य निर्णय लेने से डरता है। गीता हमें बताती है कि कर्तव्य परिणाम से बड़ा है। कर्म करते समय मन की शुद्धता और नीयत की स्पष्टता ही असली कसौटी है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में, जहाँ सफलता को ही अंतिम सत्य मान लिया गया है, गीता सिखाती है कि सफलता और असफलता दोनों अस्थायी हैं। स्थायी है केवल कर्म की ईमानदारी। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को भय से मुक्त करता है।
2. क्योंकि गीता तनाव और असुरक्षा से उबारती है
आधुनिक जीवन में चिंता एक सामान्य अवस्था बन चुकी है। भविष्य की अनिश्चितता, करियर का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ ये सब मन को अशांत करते हैं। गीता का संदेश है कि जो हमारे नियंत्रण में है, वही हमारा क्षेत्र है; जो नहीं है, उसे स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता है। यह स्वीकार्यता पलायन नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि हर परिस्थिति अस्थायी है और आत्मा अजर-अमर है, तब उसके भीतर एक गहरी स्थिरता जन्म लेती है। यही स्थिरता उसे कठिन समय में भी संतुलित रखती है।
3. क्योंकि गीता आत्मज्ञान की राह दिखाती है
मनुष्य अक्सर स्वयं को केवल शरीर और नाम-परिचय तक सीमित कर लेता है। गीता इस सीमित पहचान को तोड़ती है। वह बताती है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप आत्मा है जो न जन्म लेती है, न मरती है। यह विचार केवल दार्शनिक नहीं, व्यावहारिक भी है। जब व्यक्ति स्वयं को व्यापक दृष्टि से देखता है, तब छोटी-छोटी बातों पर क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष स्वतः कम होने लगते हैं। आत्मबोध से आत्मविश्वास जन्म लेता है, और आत्मविश्वास से साहस।
4. क्योंकि गीता नेतृत्व और प्रबंधन की पाठशाला है
आज कॉर्पोरेट जगत में नेतृत्व पर असंख्य पुस्तकें लिखी जाती हैं, लेकिन गीता का नेतृत्व सिद्धांत सरल और गहरा है नेता वह है जो पहले स्वयं को जीत ले। जो अपने मन, इंद्रियों और अहंकार पर नियंत्रण रखता है, वही दूसरों का मार्गदर्शन कर सकता है। निर्णय लेने की क्षमता, संकट में धैर्य, टीम के प्रति समर्पण ये सभी गुण गीता के शिक्षण में निहित हैं। यही कारण है कि अनेक प्रबंधन विशेषज्ञ इसे जीवन-प्रबंधन का श्रेष्ठ ग्रंथ मानते हैं।
5. क्योंकि गीता नैतिकता का जीवंत आधार है
समय बदलता है, समाज बदलता है, लेकिन नैतिक प्रश्न हमेशा बने रहते हैं। क्या किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई भी साधन उचित है? क्या निजी लाभ के लिए सार्वजनिक कर्तव्य छोड़ा जा सकता है? गीता का उत्तर स्पष्ट है धर्म वही है जो व्यापक हित में हो। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता देना ही सच्चा धर्म है। यह दृष्टि व्यक्ति को जिम्मेदार नागरिक बनाती है।
6. क्योंकि गीता हमें भावनात्मक संतुलन सिखाती है
क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार ये चारों मनुष्य को निर्णयहीन बना देते हैं। गीता बताती है कि इंद्रियों का अतिरेक ही पतन का कारण बनता है। संयम और संतुलन ही उन्नति का मार्ग है।भावनाओं को दबाना नहीं, उन्हें समझना और नियंत्रित करना यही गीता का संदेश है। यह शिक्षा व्यक्ति को परिपक्व बनाती है।
7. क्योंकि गीता कर्म और भाग्य का संतुलन समझाती है
अक्सर लोग असफलता को भाग्य पर छोड़ देते हैं या सफलता का पूरा श्रेय स्वयं को दे देते हैं। गीता इन दोनों अतियों से बचाती है। वह कहती है कि कर्म हमारा अधिकार है, फल नहीं। यह विचार व्यक्ति को अहंकार से बचाता है और निराशा से भी। जब फल की चिंता कम होती है, तब कर्म की गुणवत्ता बढ़ती है।
8. क्योंकि गीता युवाओं के लिए मार्गदर्शक है
आज का युवा अवसरों से भरा है, पर दिशा को लेकर असमंजस में भी है। करियर चुनना, रिश्तों को निभाना, समाज में अपनी भूमिका तय करना ये सभी प्रश्न उसे उलझाते हैं। गीता सिखाती है कि अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करना ही श्रेष्ठ है। दूसरों की राह पर चलने से बेहतर है अपनी क्षमता को पहचानना। यह शिक्षा युवाओं को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाती है।
9. क्योंकि गीता आंतरिक शांति का स्रोत है
बाहरी उपलब्धियाँ चाहे जितनी भी हों, यदि मन अशांत है तो सुख अधूरा है। गीता ध्यान, भक्ति और ज्ञान तीनों मार्गों का संतुलन प्रस्तुत करती है। भक्ति मन को नम्र बनाती है, ज्ञान बुद्धि को प्रखर करता है और कर्म जीवन को सार्थक बनाता है। इन तीनों का समन्वय ही पूर्णता है।
10. क्योंकि गीता समय से परे है
हजारों वर्ष पहले कहा गया यह संवाद आज भी उतना ही अर्थपूर्ण है। तकनीक बदल गई, जीवन शैली बदल गई, लेकिन मनुष्य का मन और उसके प्रश्न आज भी वही हैं। गीता किसी एक युग की नहीं, हर युग की पुस्तक है। यह केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि अध्ययन का भी विषय है। Srimad Bhagavad Geeta












