जन्मदिन विशेष: भारतीय संस्कृति का दुश्मन मैकॉले भारत में आज भी 'जिंदा' है!
भारत
चेतना मंच
25 Oct 2021 04:58 AM
विनय संकोची
अंग्रेजी को भारत की सरकारी भाषा तथा शिक्षा का माध्यम और यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान को भारतीय शिक्षा का लक्ष्य बनाने में जिस अंग्रेज का हाथ था, उसका नाम है लॉर्ड थॉमस बेबिंग्टन मैकॉले। उसी मैकॉले का आज जन्मदिन है, जिसने भारत में नौकर उत्पन्न करने का कारखाना लगाया, जिसे आज स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी कहा जाता है। इन कारखानों से हर साल लाखों नौकर निकल रहे हैं, जो रोजगार के अभाव में बेरोजगारों की फौज में शामिल होते चले जा रहे हैं।
एक अंग्रेज व्यापारी का बेटा मैकॉले जो पैसा कमाने के उद्देश्य से भारत आया था, उसने ही भारत की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की सिफारिश करते हुए कहा था - फारसी या संस्कृत की जगह अंग्रेजी भाषा को अधिकारिक भाषा बनाया जाना चाहिए।' मैकाले ने पश्चिमी संस्कृति को भारत की संस्कृति से बेहतर बताया था और उसने दावा किया था कि अंग्रेजी शिक्षा में कुशल युवा सरकार और जनता के बीच पुल का काम करेंगे।
1834 ईसवी से 1838 ईसवी तक भारत की सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर तथा लॉ कमीशन के प्रधान रहे मैकॉले ने ही 'द इंडियन पीनल कोड' की पांडुलिपि तैयार की थी, जिसे हम आज तक उपयोग में ला रहे हैं। मैकॉले ने अंग्रेजी के माध्यम से पश्चिमी ढंग की उदार शिक्षा पद्धति प्रारंभ की। मैकॉले द्वारा 1934 में जो शिक्षा पद्धति अपनाई गई वह एक खास योजना का हिस्सा थी, इसके बारे में स्वयं मैकॉले ने कहा था - 'जो शिक्षा पद्धति में लागू कर रहा हूं उसके पाठ्यक्रम के अनुसार यहां के शिक्षित युवक देखने में हिंदुस्तानी लगेंगे लेकिन उनका मस्तिष्क अंग्रेजियत से भरा होगा तब वे अंग्रेजों की कठपुतली की तरह नाचेंगे।'
मैकॉले ने जो उस समय कहा था आज भी सच साबित हो रहा है। हमारी लगभग एक पूरी पीढ़ी अंग्रेजों की नहीं बल्कि अंग्रेजियत की गुलाम तो जरूर है। हमारी शिक्षा पद्धति और शासन तंत्र में अंग्रेजी की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। 1947 के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा तो दिया गया लेकिन हिंदी राष्ट्रभाषा के आसन पर आज तक विराजमान नहीं है। अंग्रेजी स्टाइल में रहने वाले हिंदी को बहुत सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते हैं और ऐसा मैकॉले इफेक्ट के कारण ही है। इसमें संदेह नहीं है कि मैकॉले की शिक्षा पद्धति ने भारत की उन्नत संस्कृति और संस्कारों को बिगाड़ा जरूर है।
1835 के बाद मैकॉले ने अपना ज्यादातर समय भारतीय दंड संहिता को बनाने में व्यतीत किया। मैकॉले की ही बनाई आईपीसी भारत में 1860 में, सीआरपीसी 1872 में और 1905 में सीपीसी को लागू किया गया। इन तमाम कानूनों को बनाने वाले मैकॉले ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह कानून उपनिवेश देशों के लिए ही हैं, लेकिन अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिलने के बाद भी हम उन्हीं की थोपी हुई शिक्षा पद्धति और उनके बनाए कानूनों को लेकर चल रहे हैं।
इन कानूनों में बदलाव की सुगबुगाहट तो होती है लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आता है। कानूनों में बदलाव जरूरी है ताकि नागरिकों को ज्यादा अधिकार देकर अनेक प्रक्रियागत जटिलताओं से मुक्ति दिलाई जा सके। तमाम ऐसे कानून है जो नागरिकों के हितों पर खरे नहीं उतरते हैं। लेकिन डेढ़ सौ साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी किसी भी सरकार और कानूनविदों को इनमें बदलाव की जरूरत ही महसूस नहीं हो रही है।
मैकॉले को कोसने से क्या होगा कुछ भी नहीं, उसने तो अपनी भाषा, अपनी शिक्षा पद्धति, अपने कानून गुलाम भारत पर थोपे थे। गलती हमारी है जो हम उन्हें पीठ पर आजादी के बाद भी लादे घूम रहे हैं। बदलाव संभव है लेकिन इसके लिए जिस इच्छाशक्ति की जरूरत है उसके अभाव के चलते हम लकीर पीटते चले आ रहे हैं।