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Buddha Purnima : भारतीय हिन्दु कलेंडर के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा का पर्व बैसाख महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह पूर्णिमा भगवान महात्मा गौतमबुद्ध के जीवन से जुड़ी हुई है।

Buddha Purnima : बुद्ध पूर्णिमा का पर्व बहुत ही अनोखा दिन है। बुद्ध पूर्णिमा के त्यौहार का इतिहास अद्भुत संयोग के साथ जुड़ा हुआ है। पूरी दुनिया के इतिहास में बुद्ध पूर्णिमा ही एकमात्र ऐसा दिन है जो दिन एक महान व्यक्तित्व का जन्म दिन, पुण्यतिथि (निर्वाण दिवस) तथा ज्ञान दिवस भी है। दरअसल बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही महान आत्मा भगवान गौतमबुद्ध का जन्म, उनका निर्वाण (निधन) तथा उनको ज्ञान प्राप्त हुआ था। आप इस बात को इस प्रकार समझ सकते हैं कि भगवान गौतमबुद्ध बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही पैदा हुए थे। बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही उन्हें ज्ञान प्राप्त (आत्मसाक्षात्कार) हुआ था।
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बैसाख माह की पूर्णिमा को है अद्भुत संयोग का दिन
भारतीय हिन्दु कलेंडर के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा का पर्व बैसाख महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह पूर्णिमा भगवान महात्मा गौतमबुद्ध के जीवन से जुड़ी हुई है। इतिहासकार बताते हैं कि भगवान गौतमबुद्ध का जन्म बैसाख माह की पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। बैसाख माह की पूर्णिमा के दिन ही भगवान गौतमबुद्ध को बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बैसाख महीने की पूर्णिमा के दिन ही कुशीनगर में भगवान गौतमबुद्ध का महापरिनिर्वाण (निधन) भी हुआ था। ऐसा कोई दूसरा उदहारण इतिहास में नहीं मिलता जब किसी व्यक्ति का जन्म, निधन तथा ज्ञान की प्राप्ति एक ही निर्धारित तिथि पर हुई हो।
भगवान गौतमबुद्ध के विषय में बहुत कुछ है जानने लायक
भगवान गौतमबुद्ध का पूरा जीवन ज्ञान प्राप्ति तथा ज्ञान के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ है। भगवान गौतमबुद्ध के जीवन के विषय में बहुत कुछ जानने लायक है। उनके विषय में जितना भी पढ़ा जाए वह कम ही पड़ेगा। भगवान गौतमबुद्ध के जीवन से जुड़ी हुई अनेक घटनाओं में से एक बड़ी घटना उनका अपनी पत्नी तथा बच्चे से बिछडऩा भी रहा है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या जीवन में पुन: कभी भगवान गौतमबुद्ध की मुलाकात उनकी पत्नी राजकुमारी यशोधरा के साथ हुई थी?
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर यह जानना है जरूरी
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर भगवान गौतमबुद्ध के साथ उनकी पत्नी के रिश्तों को जानना जरूरी है। आपको बता दें कि भगवान गौतमबुद्ध बुद्ध बनने से पहले राजकुमार सिद्धार्थ थे। राजकुमार सिद्धार्थ का विवाह 16 वर्ष की उम्र में राजकुमारी यशोधरा के साथ हुआ था। पति- पत्नी दोनों राजमहल में पूरे वैभव तथा सुख के साथ रहते थे। इसी दौरान उन दोनों को एक बेटा भी पैदा हुआ। बेटे का नाम राहुल रखा गया था। राहुल के जन्म के तुरन्त बाद सच की खोज में सिद्धार्थ ने राजमहल छोडक़र तपस्या करने का रास्ता चुन लिया था।Buddha Purnima
पति के जाने के बाद टूट सी गई थी यशोधरा
सिद्धार्थ के अचानक चले जाने से यशोधरा पूरी तरह दुख और आश्चर्य में डूब गईं। लेकिन उन्होंने इस स्थिति में खुद को कमजोर नहीं होने दिया। जब उन्हें पता चला कि सिद्धार्थ साधु जीवन अपना चुके हैं, तो उन्होंने भी उनके मार्ग का अनुसरण करना शुरू किया। उन्होंने अपने आभूषण उतार दिए, साधारण पीले वस्त्र पहनने लगीं और भोजन भी सीमित कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे सिद्धार्थ ने त्याग किया था। महल के आराम और वैभव के बावजूद उनका जीवन धीरे-धीरे संयम और आत्मनियंत्रण की ओर बढ़ गया। सिद्धार्थ के गृहत्याग के लगभग छह साल बाद, जब वे ज्ञान प्राप्त कर बुद्ध बन चुके थे, वे कपिलवस्तु लौटे। लेकिन यशोधरा उनसे मिलने सीधे नहीं गईं। कहा जाता है कि उन्होंने सोचा यदि मेरे भीतर कोई गुण या पुण्य है, तो स्वयं बुद्ध मेरे पास आएंगे और हुआ भी ऐसा ही भगवान बुद्ध स्वयं उनके कक्ष में उनसे मिलने पहुंचे।
फिर हुआ बुद्ध और यशोधरा का मौन मिलन
जब बुद्ध उनके कक्ष में पहुंचे, तो यशोधरा ने किसी गुस्से, शिकायत या प्रश्न के बिना उन्हें सम्मान दिया। यह मुलाकात भावनाओं से भरी हुई थी लेकिन शब्दों से शांत। बुद्ध ने उनके धैर्य और त्याग की प्रशंसा की और यह स्वीकार किया कि उन्होंने अपने पूरे समय में उनके प्रति महान सहनशीलता और समर्पण दिखाया। समय के साथ, जब बौद्ध संघ में महिलाओं को भी प्रवेश की अनुमति मिली, तो यशोधरा ने भी भिक्षुणी जीवन अपनाया। उन्होंने संघ में शामिल होकर साधना का मार्ग चुना। वे बौद्ध परंपरा में उन महान भिक्षुणियों में गिनी जाती हैं जिन्होंने आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की और दूसरों के लिए प्रेरणा बनीं। इसी प्रकार बुद्ध पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध से हुई अनेक रोचक जानकारी आप चेतना मंच पर पढ़ सकते हैं। Buddha Purnima
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