सुबह पार्क में चलने वाला बुजुर्ग, ऑफिस के बाहर पांच मिनट स्ट्रेचिंग करता युवा, लंच ब्रेक में टहलती महिला, बच्चों के साथ पार्क में योग करता परिवार—ये सभी एक ही संदेश दे रहे हैं। स्वास्थ्य के लिए समय नहीं मिलता, स्वास्थ्य के लिए समय निकालना पड़ता है।

समय नौकरी के लिए नहीं है, परिवार के लिए कम है, अपने लिए तो जैसे बचता ही नहीं। स्वास्थ्य के लिए जिम जाना हो, योग की पूरी कक्षा करनी हो या किसी खेल के लिए समय निकालना हो तो सबसे पहले कैलेंडर सामने आ जाता है। फिर हम सोचते हैं कि कल से शुरू करेंगे। यही “कल” कई बार महीनों और वर्षों में बदल जाता है। लेकिन अब फिटनेस की दुनिया में एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। लोग यह समझने लगे हैं कि स्वस्थ रहने के लिए हमेशा महंगे जिम, बड़े उपकरण या घंटों के व्यायाम की जरूरत नहीं होती। चलना, हल्की स्ट्रेचिंग, योग के आसान अभ्यास और कुछ मिनट श्वास पर ध्यान देना भी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया जा सकता है।
शायद इसी सोच से “वर्किंग योगा” और चलते-फिरते फिटनेस जैसी अवधारणाएं लोकप्रिय हो रही हैं। सुबह पार्कों में ऐसे समूह दिखाई देते हैं जो कुछ देर योग करते हैं, फिर पैदल चलते हैं। कहीं लोग सामूहिक रूप से स्ट्रेचिंग करते हैं, कहीं ऑफिस में लंच ब्रेक के दौरान कर्मचारी कुछ मिनट शरीर को सक्रिय करते हैं। यह दृश्य केवल व्यायाम का नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली का संकेत है।

यह सोच बदलनी होगी। जिम निश्चित रूप से व्यायाम का अच्छा माध्यम है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए जिम जाना संभव नहीं। किसी के पास समय नहीं, किसी के पास सुविधा नहीं और किसी को जिम का माहौल ही पसंद नहीं आता। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति रोज कुछ समय तेज चाल से चलता है, बीच-बीच में शरीर को स्ट्रेच करता है और कुछ सरल योगाभ्यास करता है तो वह अपने शरीर को निष्क्रिय रहने से तो बचा ही सकता है।
घंटों कुर्सी पर बैठना, लगातार मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन देखना, गाड़ी से आना-जाना और फिर घर पहुंचकर सोफे पर बैठ जाना—हमारी आधुनिक जिंदगी का बड़ा हिस्सा इसी चक्र में फंस गया है। ऐसे में 20–30 मिनट का सक्रिय समय छोटा जरूर है, लेकिन शुरुआत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
हमारे पास फिटनेस का सबसे पुराना और शायद सबसे सरल तरीका पहले से मौजूद है—पैदल चलना। चलने के लिए किसी मशीन की जरूरत नहीं। किसी विशेष पोशाक की जरूरत नहीं। घर से बाहर निकलकर पार्क, सड़क के सुरक्षित हिस्से या उपलब्ध खुले स्थान पर अपनी क्षमता के अनुसार चलना शुरू किया जा सकता है। धीमी चाल से शुरुआत करके धीरे-धीरे गति बढ़ाई जा सकती है। जिन लोगों ने लंबे समय से व्यायाम नहीं किया है, उनके लिए अचानक कठिन एक्सरसाइज शुरू करने की बजाय नियमित चलना अधिक व्यावहारिक शुरुआत हो सकती है। और सबसे अच्छी बात यह है कि चलने के लिए हमें जीवन से अलग कोई बड़ा समय नहीं निकालना पड़ता। लिफ्ट की जगह सीढ़ियां, छोटी दूरी पर गाड़ी की जगह पैदल जाना, ऑफिस में थोड़ी देर चलना—ये छोटे बदलाव भी दिनभर की गतिविधि बढ़ा सकते हैं।
योग को भी हमने कई बार इतना कठिन बना दिया है कि सामान्य व्यक्ति उससे डरने लगता है। वास्तव में योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष शरीर की जागरूकता, श्वास और मन की एकाग्रता से जुड़ा है। हर व्यक्ति को कठिन आसन करने की जरूरत नहीं। अपनी क्षमता के अनुसार सरल आसन, हल्की स्ट्रेचिंग और श्वास पर ध्यान भी अभ्यास का हिस्सा हो सकते हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ मिनट शांत होकर अपनी सांस पर ध्यान देता है, शरीर की मुद्रा को महसूस करता है और तनाव के बीच खुद को थोड़ी देर रोकता है तो उसे अपने शरीर और मन के बीच संबंध को समझने का अवसर मिलता है।
अच्छी मुद्रा, शरीर में लचीलापन, संतुलन, चलने का तरीका, सांस लेने की जागरूकता और मानसिक शांति भी स्वास्थ्य का हिस्सा हैं।
कामकाजी लोगों के लिए यह विचार सबसे ज्यादा उपयोगी हो सकता है। आठ-दस घंटे ऑफिस में बैठने वाले कर्मचारी अगर लंच के पहले या बाद कुछ मिनट चल लें, गर्दन और कंधों की हल्की स्ट्रेचिंग कर लें, पैरों को सक्रिय कर लें और कुछ देर स्क्रीन से आंखें हटा लें तो यह रोजमर्रा की निष्क्रियता को तोड़ने का अच्छा तरीका हो सकता है। इसके लिए जरूरी नहीं कि पूरा ऑफिस योग कक्षा बन जाए। पांच मिनट चलना, पांच मिनट स्ट्रेचिंग और कुछ मिनट शांत श्वास—इतनी छोटी शुरुआत भी आदत बदल सकती है। बेशक, हर अभ्यास सही तकनीक और व्यक्ति की क्षमता के अनुसार होना चाहिए। दर्द होने पर उसे नजरअंदाज करके व्यायाम करते रहना समझदारी नहीं है।

कोविड के बाद लोगों ने सामूहिक गतिविधियों का महत्व भी नए सिरे से समझा है। पार्क में एक साथ योग करने वाले लोग केवल शरीर को सक्रिय नहीं करते, वे एक-दूसरे को प्रेरित भी करते हैं। अकेले व्यायाम शुरू करना आसान है, लेकिन उसे लगातार जारी रखना कठिन हो सकता है। समूह में एक-दूसरे को देखकर नियमितता बनी रहती है। सुबह पार्क में मिलने वाले लोगों के लिए योग और पैदल चलना धीरे-धीरे सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी बन जाता है। स्वास्थ्य और समाज—दोनों एक साथ मजबूत होते हैं।
इस सवाल का जवाब थोड़ा संतुलित होना चाहिए। 20–30 मिनट की गतिविधि को “पूरी फिटनेस का अंतिम समाधान” कहना सही नहीं होगा। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उम्र, जीवनशैली और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और मानसिक स्वास्थ्य—सभी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन जो व्यक्ति बिल्कुल सक्रिय नहीं है, उसके लिए 20–30 मिनट की नियमित शुरुआत बहुत मायने रख सकती है। स्वास्थ्य में सबसे बड़ा बदलाव अक्सर किसी एक दिन की कठिन कसरत से नहीं, छोटी-छोटी आदतों की निरंतरता से आता है।
आज 15 मिनट।
कल 20 मिनट।
फिर धीरे-धीरे 30 मिनट।
यही निरंतरता आगे चलकर जीवनशैली बन सकती है।पांच मिनट चलना, पांच मिनट स्ट्रेचिंग और कुछ मिनट शांत श्वास—इतनी छोटी शुरुआत भी आदत बदल सकती है। बेशक, हर अभ्यास सही तकनीक और व्यक्ति की क्षमता के अनुसार होना चाहिए। दर्द होने पर उसे नजरअंदाज करके व्यायाम करते रहना समझदारी नहीं है।

सुबह पार्क में चलने वाला बुजुर्ग, ऑफिस के बाहर पांच मिनट स्ट्रेचिंग करता युवा, लंच ब्रेक में टहलती महिला, बच्चों के साथ पार्क में योग करता परिवार—ये सभी एक ही संदेश दे रहे हैं। स्वास्थ्य के लिए समय नहीं मिलता, स्वास्थ्य के लिए समय निकालना पड़ता है। हमारी अगली पीढ़ी को भी यही सिखाना होगा कि फिटनेस केवल शरीर बनाने का साधन नहीं है। यह जीवन को लंबे समय तक सक्रिय, स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाए रखने का तरीका है। इसलिए अगली बार जब मन कहे कि “आज समय नहीं है”, तो शायद खुद से सिर्फ इतना पूछिए— क्या मेरे पास 20 मिनट भी नहीं हैं अपने शरीर के लिए? अगर हैं, तो शुरुआत आज ही की जा सकती है। क्योंकि फिटनेस का रास्ता हमेशा जिम के दरवाजे से होकर नहीं जाता। कभी-कभी वह हमारे घर के दरवाजे से निकलकर सीधे सड़क, पार्क और खुले आसमान तक जाता है।
चलते-चलते… शायद यही हमारी सेहत की सबसे सरल शुरुआत है।
— वीरेश तिवारी
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी, सेक्टर 96
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