साल में दो बार कब आएगा माह-ए-रमज़ान? हर मुसलमान को होना चाहिए मालूम

रमज़ान मुस्लिम समुदाय के लिए आत्मसंयम और इबादत का महीना माना जाता है। आमतौर पर रमज़ान हर साल एक बार आता है लेकिन एक साल ऐसा भी होगा जब रमज़ान का पाक महीना दो बार आएगा। चलिए जानते हैं वो कौन सा साल होगा जब रमज़ान दो बार आएगा।

Ramadan 2030
रमजान दो बार कब आएगा
locationभारत
userअसमीना
calendar23 Feb 2026 03:14 PM
bookmark

रमज़ान मुस्लिम समुदाय के लिए आत्मसंयम, इबादत और दया का महीना माना जाता है। इस दौरान सूर्योदय से सूर्यास्त तक रोजा रखा जाता है और लोग अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। आम तौर पर रमज़ान हर साल एक बार आता है लेकिन कुछ खास सालों में ऐसा संयोग बनता है कि रमज़ान का पाक महीना एक ही साल में दो बार आता है।

रमज़ान क्यों हर साल पहले आता है?

इस्लामी कैलेंडर चंद्र कैलेंडर पर आधारित होता है। इसमें महीनों की अवधि 29 या 30 दिन होती है जिससे इस्लामिक साल कुल 354 दिनों का होता है। वहीं ग्रेगोरियन कैलेंडर, जिसका इस्तेमाल सामान्यत: होता है, सौर कैलेंडर पर आधारित है और इसमें 365 दिन होते हैं। इस अंतर के कारण रमज़ान हर साल लगभग 10-12 दिन पहले शुरू होता है। यही वजह है कि कुछ सालों में रमज़ान साल में दो बार पड़ सकता है।

साल 2030 में दो बार आएगा रमज़ान

साल 2030 में पहला रमज़ान 05 जनवरी से शुरू होगा। इसके बाद चंद्र कैलेंडर के हिसाब से दूसरा रमज़ान 26 दिसंबर 2030 से शुरू होगा। इस तरह 2030 में रमज़ान का पाक महीना दो बार मनाया जाएगा। यह घटना बहुत ही खास है और इसे इस्लामी कैलेंडर की विशेषता माना जाता है।

पहले भी दो बार आ चुका है रमज़ान

इस साल से पहले 1997 में भी रमज़ान दो बार आया था। उस साल पहला रमज़ान 10 जनवरी से शुरू हुआ और दूसरा 31 दिसंबर से। इससे पहले साल 1965 में भी ऐसा हुआ था। ये घटनाएं इस्लामी कैलेंडर की लचीली और चंद्र आधारित प्रकृति की वजह से संभव हुई हैं।रमज़ान केवल रोज़ा रखने का महीना नहीं है। यह महीने लोगों को अपने अंदर संयम, दया और आध्यात्मिक शुद्धि का अनुभव कराता है। मुस्लिम समुदाय इस समय पैगंबर मुहम्मद पर अवतरित कुरान की पहली आयतों को याद करता है। दो बार रमज़ान आने से भी लोगों के लिए यह महीना और भी खास बन जाता है।

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी इस्लामिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। चेतना मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।

अगली खबर पढ़ें

Holashtak में क्या करें और क्या बिल्कुल न करें? यहां है सारी जानकारी

Holashtak: होलाष्टक 24 फरवरी से शुरू हो रहा है और 03 मार्च तक रहेगा। यह आठ दिनों की अशुभ अवधि मानी जाती है जब मांगलिक कार्यों का शुभ फल नहीं मिलता। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण जैसे कार्य वर्जित हैं।

Holashtak
होलाष्टक 2026
locationभारत
userअसमीना
calendar23 Feb 2026 11:50 AM
bookmark

सनातन धर्म में होलाष्टक का अपना खास महत्व है। यह वह अवधि है जिसे अशुभ माना जाता है लेकिन इसके बावजूद धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इसे गंभीरता से देखा जाता है। होलाष्टक के आठ दिन उस समय को दर्शाते हैं जब असुर राज हिरण्यकश्यप अपने पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद को कष्ट पहुंचा रहे थे। इस अवधि में मांगलिक कार्यों का शुभ फल नहीं मिलता इसलिए धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार इन दिनों सावधानी बरतनी चाहिए।

होलाष्टक की तिथि और अवधि

इस साल होलाष्टक की शुरुआत 24 फरवरी से हो रही है। यह अवधि फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर होलिका दहन के दिन 03 मार्च, 2026 तक चलेगी। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय बुरी शक्तियां और ग्रह उग्र अवस्था में रहते हैं जिससे शुभ कार्यों का परिणाम प्रभावित हो सकता है।

होलाष्टक में क्या करें?

होलाष्टक के आठ दिनों में विशेष रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए। इस दौरान किए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण कार्य हैं-

दान-दक्षिणा: जरूरतमंदों को दान दें और द्रव्य या वस्तुएं दान करें।

पूजा-पाठ: भगवान विष्णु और शिव जी की नियमित पूजा करें।

मंत्र जप और पाठ: ऋण मोचन स्त्रोत, विष्णु सहस्त्रनाम, हनुमान चालीसा और श्रीसूक्त का नियमित पाठ करें।

पितरों की पूजा: पितरों का तर्पण और स्मरण करें।

ग्रह शांति: यज्ञ या विशेष पूजा करवाकर ग्रहों की शांति का उपाय करें।

धार्मिक यात्रा: यदि संभव हो तो मथुरा और वृंदावन की परिक्रमा करें।

इन कार्यों से मानसिक शांति मिलती है और इस अशुभ अवधि का आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त होता है।

होलाष्टक में क्या न करें?

होलाष्टक के दिनों में कुछ कार्यों से पूरी तरह बचना चाहिए ताकि नकारात्मक प्रभाव से बचा जा सके। इनमें प्रमुख हैं-

शादी-विवाह: इस अवधि में विवाह या अन्य मांगलिक संस्कार न करें।

भवन और संपत्ति खरीदना: भूमि, भवन या वाहन आदि की खरीदारी न करें।

नवविवाहित महिलाओं का ससुराल रहना: होलाष्टक में नवविवाहित महिलाएं ससुराल में न रहें।

संस्कार और धार्मिक अनुष्ठान: सनातन धर्म में बताए गए 16 मुख्य संस्कारों में से किसी भी संस्कार को इस समय न करें।

इन प्रतिबंधों का पालन करने से अशुभ प्रभाव से बचा जा सकता है और होलाष्टक का समय सुरक्षित और शांति पूर्ण बीतता है।

होलाष्टक का आध्यात्मिक महत्व

होलाष्टक केवल अशुभता का प्रतीक नहीं है। इसे ध्यान, पूजा और धर्म कर्म की ओर ध्यान केंद्रित करने का अवसर माना जाता है। इस समय की गंभीरता को समझकर धार्मिक कृत्य करने से मानसिक शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। चेतना मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।

अगली खबर पढ़ें

रोजेदार खजूर से ही क्यों खोलते हैं रोजा? क्या आप जानते हैं इसकी हकीकत?

Ramadan Mubarak: रमजान के पाक महीने में मुसलमान रोजा रखते हैं और इफ्तार में खजूर से रोजा खोलते हैं। खजूर खाने के पीछे पैगंबर मोहम्मद (PBUH) की सुन्नत और स्वास्थ्य संबंधी फायदे हैं। यह शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है और रोजेदारों को दिनभर की थकान से बचाता है।

Dates
खजूर से ही क्यों खोला जाता है रोजा?
locationभारत
userअसमीना
calendar20 Feb 2026 05:03 PM
bookmark

रमजान इस्लामिक कैलेंडर का सबसे पाक महीना है और मुस्लिम समुदाय के लिए यह समय इबादत, दान-पुण्य और आत्म-संयम का होता है। इस दौरान सुबह से लेकर शाम तक रोजेदार भूखे-प्यासे रहते हैं और रोजा रखते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रोजा खोलते समय मुसलमान सबसे पहले खजूर क्यों खाते हैं? आइए जानते हैं इस परंपरा और इसके पीछे की वजह।

पैगंबर-ए-इस्लाम की सुन्नत

इस्लाम में खजूर से रोजा खोलना सुन्नत माना जाता है। सुन्नत वे कार्य हैं जिन्हें पैगंबर हज़रत मोहम्मद (PBUH) ने किया और लोगों को पालन करने की सलाह दी। कहा जाता है कि पैगंबर हमेशा खजूर खाकर रोजा खोलते थे। यही कारण है कि आज भी दुनिया भर के मुसलमान इस परंपरा का पालन करते हैं।

एक मुबारक फल है खजूर

खजूर को सिर्फ स्वादिष्ट नहीं बल्कि मुबारक (आशीर्वाद) फल भी माना जाता है। इसे खाने से बरकत आती है और यह इबादत का हिस्सा बन जाता है। यदि किसी कारणवश खजूर उपलब्ध न हो तो पानी पीकर भी रोजा खोलना सही माना जाता है।

शरीर को तुरंत एनर्जी देता है खजूर

रोजा रखने के दौरान शरीर का शुगर लेवल कम हो जाता है। खजूर में ग्लूकोज, सुक्रोज और फ्रुक्टोज जैसी नेचुरल शुगर होती है जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देती है। इसके अलावा खजूर में फाइबर भी होता है जो पाचन के लिए अच्छा है। इसीलिए खजूर इफ्तार में रोजेदारों को तुरंत थकान से राहत देता है। रमजान केवल भूख और प्यास सहने का महीना नहीं है। यह हमें दान-पुण्य, अनुशासन और दया सिखाता है। खजूर से रोजा खोलना इस बात का प्रतीक भी है कि इबादत के साथ शरीर और आत्मा दोनों को संतुलित रखा जाए।

रोजा खोलने की परंपरा

रोजेदार जब खजूर से रोजा खोलते हैं तो न केवल पैगंबर की सुन्नत का पालन होता है बल्कि यह शरीर को भी तुरंत ताकत देता है। यह परंपरा दिखाती है कि धर्म और स्वास्थ्य एक साथ संतुलित रह सकते हैं।