Chauri Chaura Kand: चौरी-चौरा कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐतिहासिक और निर्णायक घटना थी। यह घटना 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में घटी थी। असहयोग आंदोलन के दौरान हुई इस घटना ने ब्रिटिश हुकूमत को गहरा झटका दिया था।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ चौरी-चौरा कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन घटनाओं में से एक है जिसने पूरे देश की राजनीति, आंदोलन और सोच की दिशा बदल दी। यह सिर्फ एक हिंसक घटना नहीं थी बल्कि दशकों से दबे जनआक्रोश का विस्फोट थी। 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में जो हुआ उसने ब्रिटिश शासन को झकझोर कर रख दिया और महात्मा गांधी को अपना सबसे बड़ा आंदोलन असहयोग आंदोलन वापस लेने पर मजबूर कर दिया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ चौरी-चौरा कांड की 105वीं बरसी पर आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक घटना की पूरी, सटीक और भ्रम-रहित कहानी।
चौरी-चौरा कांड 4 फरवरी 1922 को घटित एक ऐतिहासिक घटना थी जिसमें ब्रिटिश पुलिस की फायरिंग से आक्रोशित होकर प्रदर्शनकारियों ने चौरी-चौरा थाना जला दिया। इस अग्निकांड में 22 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मारे गए। यह घटना असहयोग आंदोलन के दौरान हुई और इसके बाद गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया।
वर्ष 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य अंग्रेजी शासन का शांतिपूर्ण विरोध, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी को अपनाना और सरकारी संस्थानों से दूरी था। यह आंदोलन पूरे देश में तेजी से फैल रहा था। उत्तर प्रदेश का गोरखपुर जिला और चौरी-चौरा इलाका भी इस आंदोलन का मजबूत केंद्र बन चुका था।
जनवरी 1922 में चौरी-चौरा क्षेत्र में महंगाई, शराब की बिक्री और पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ विरोध तेज हो गया था। 2 फरवरी 1922 को भगवान अहीर नामक सेवानिवृत्त सैनिक के नेतृत्व में एक प्रदर्शन हुआ जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसी दमन के विरोध में 4 फरवरी को एक बड़े जुलूस और सभा का आयोजन किया गया।
4 फरवरी की सुबह लगभग 2,000 से 2,500 प्रदर्शनकारी चौरी-चौरा बाजार में इकट्ठा हुए। जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था लेकिन जब यह जुलूस पुलिस थाने के सामने पहुंचा तो हालात अचानक बदल गए। पुलिस ने भीड़ को डराने के लिए पहले हवा में गोलियां चलाईं। जब भीड़ नहीं हटी तो सीधे प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग शुरू कर दी गई। इस गोलीबारी में तीन लोग शहीद हो गए और कई घायल हुए। अपने साथियों को मरते देखकर भीड़ का आक्रोश फूट पड़ा। गुस्साई भीड़ ने पुलिसकर्मियों को खदेड़ दिया। जान बचाने के लिए पुलिसकर्मी थाने के भीतर घुस गए और दरवाजा बंद कर लिया। भीड़ ने पूरे थाने को चारों तरफ से घेर लिया और उसमें आग लगा दी। इस आग में 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में यह संख्या 23 भी बताई जाती है।
जब महात्मा गांधी को चौरी-चौरा की हिंसा की जानकारी मिली तो वे बेहद व्यथित हुए। उनका मानना था कि देश अभी पूरी तरह अहिंसा के मार्ग के लिए तैयार नहीं है। गांधी जी को डर था कि हिंसा बढ़ने पर अंग्रेज सरकार आंदोलन को कुचल देगी। 12 फरवरी 1922 को बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई जहां गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को तुरंत वापस लेने की घोषणा कर दी। इस फैसले से जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और चितरंजन दास जैसे कई नेता असहमत थे लेकिन गांधी जी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।
चौरी-चौरा कांड के बाद अंग्रेज सरकार ने भयानक दमन शुरू किया। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। 9 जनवरी 1923 को गोरखपुर की सत्र अदालत ने फैसला सुनाया। 225 अभियुक्तों में से 172 लोगों को मौत की सजा। यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे क्रूर फैसलों में से एक माना जाता है।
इस सामूहिक मृत्युदंड के खिलाफ पंडित मदन मोहन मालवीय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जोरदार पैरवी की।
उनकी कानूनी दलीलों के कारण हाईकोर्ट ने फैसला बदला और 172 में से 153 लोगों की फांसी की सजा कम कर दी गई। अंततः सिर्फ 19 लोगों को फांसी दी गई जबकि बाकी को आजीवन कारावास या लंबी सजा मिली।
2 जुलाई से 11 जुलाई 1923 के बीच जिन 19 क्रांतिकारियों को फांसी दी गई उनके नाम हैं अब्दुल्ला, भगवान अहीर, बिक्रम अहीर, दुधई, काली चरण, लाल मोहम्मद, लौटी, मादेव, मेघू अली, नजर अली, रघुवीर, रामलगन, रामरूप, रुद्रली, सहदेव, संपत, श्याम सुंदर, सीताराम और विक्रमी।
चौरी-चौरा कांड ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को गहराई से प्रभावित किया। इस घटना के बाद कई युवाओं का अहिंसा से मोहभंग हुआ। क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा मिली। अंग्रेजों को भारतीय जनशक्ति की ताकत का एहसास हुआ। भारत सरकार ने 2021–22 में चौरी-चौरा कांड की शताब्दी भी मनाई।