Day Special : 'मानवाधिकार दिवस' पर अपने अधिकारों को जानने का संकल्प लें!
भारत
चेतना मंच
10 Dec 2021 04:28 PM
विनय संकोची
दुनिया में सभी को समान रूप से जीने का अधिकार है, परंतु बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी ही नहीं है।...और ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो अपने से कमजोरों को उनके अधिकारों का प्रयोग करने से रोकते हैं, अधिकारों से वंचित रखते हैं। समानता के दावों के बीच समानता और भेदभाव लाडलों की तरह पलते हैं। आज भी 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली कहावत यहां वहां खूब चरितार्थ होते देखी जा सकती है।
आज 'अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस' है, जिसे पूरी दुनिया मनाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ इस दिवस विशेष इन 1950 से मनाता चला आ रहा है। भारत में मानवाधिकार के लिए महात्मा फुले और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जैसे महानुभावों के जोरदार आवाज उठाई थी, लेकिन 28 सितंबर 1993 से भारत में मानवाधिकार कानून अमल में लाया जा सका। 12 अक्टूबर 1993 को राष्ट्रीय मानव आयोग का गठन किया गया।
यूं तो मानवाधिकार सबके लिए है, लेकिन गांव तो गांव शहरों तक में लोग अपने इस विशेष अधिकार के प्रति सचेत नहीं हैं, इसीलिए मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाएं आम हैं। 'मानव अधिकार दिवस-2021' की थीम है- 'असमानताओं को कम करना, मानवाधिकारों को आगे बढ़ाना'। इस तरह की थीम, इस तरह के नारे अच्छे तो बहुत लगते हैं, लेकिन धरातल पर इनका उदघोष दम तोड़ता नजर आता है।
इस दुनिया में सभी लोग अधिकारों के मामले में बराबर हैं। देश के नागरिकों के बीच नस्ल, रंग, लिंग, भाषा, धर्म या अन्य विचार, संपत्ति, राजनीतिक आदि बातों के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, इसलिए मानवाधिकार का निर्माण किया गया। कोई विरला ही देश होगा जहां पर असमानता न हो, भेदभाव ना हो धर्म के नाम पर विवाद ना हो कमजोरों पर अत्याचार न हो, महिलाओं का शोषण न हो, गरीब-अमीर के बीच कभी ना पाटी जा सकने वाली खाई ना हो, लेकिन इन सबके बाद भी मानवाधिकार कानून आवश्यक तो है ही। इसकी उपस्थिति में सबको नहीं, तो अनेक पीड़ितों को लाभ तो निश्चित रूप से मिल ही रहा है।
सच बात तो यह है कि मानव अधिकार जैसे महत्वपूर्ण और जरूरी कानूनों को सख्ती से लागू करने के प्रति सरकारें ज्यादातर उदासीन दिखाई पड़ती हैं। इस दिन कुछ संगोष्ठियों और कुछ कार्यक्रम हो जाएंगे, उनमें आने वाले अतिथि मानवाधिकार पर अपने-अपने विचार व्यक्त करेंगे और बात खत्म। फिर चर्चा अगले साल होगी, किसी नई थीम के साथ।
भारत के संविधान में न केवल मानव अधिकारों की गारंटी दी गई है, अपितु इसका उल्लंघन करने पर सजा का प्रावधान भी किया गया है। मानवीय जीवन और अधिकारों की रक्षा किसी भी देश के मानवाधिकार कानूनों के लिए गौरवान्वित करने वाली बात है। वर्तमान में देश में मानवाधिकारों की स्थिति जटिल है, मानवाधिकारों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन का हनन राजनीतिक कारणों के अलावा धार्मिक मुद्दों पर भी किया जा रहा है। प्रत्येक जाति को सहिष्णुता की भावना के साथ प्रेम और स्नेह के मार्ग पर चलने का पाठ पढ़ाने के नाम पर कट्टरता का प्रचार-प्रसार करते हुए हिंसा को प्रश्रय दिया जा रहा है। आम लोगों में शिक्षा का अभाव है, उनके मानवाधिकारों का हनन किया जा रहा है और अशिक्षा के चलते वे उसका विरोध तक नहीं कर पा रहे हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश आदि जैसे राज्यों में साक्षरता का स्तर सामान्य से कम होने के कारण मानवाधिकारों का हनन आम बात है।
सामाजिक विषयों में सबसे गंभीर विषय मानवाधिकार का ही है। आज पूरी दुनिया में ताकत और पैसे के बल पर होने वाली हिंसा इस बात का प्रमाण है कि मानवता खतरे में तो है। मानव समाज में मौजूद समस्याओं का निराकरण करना ही मानवाधिकार की संकल्पना का लक्ष्य है,जो कि अभी पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं है। मानवाधिकार और उसकी रक्षा प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। परस्पर सद्भाव और प्रेम से ही सबको मानवाधिकार का पर्याप्त लाभ मिल सकता है, कट्टरता से किसी को कोई फायदा होने वाला नहीं है, नुकसान जरूर हो सकता है।