दिवस विशेष : सब दया का संकल्प लें तो संसार स्वर्गोपम बन जाए!
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 11:42 PM
विनय संकोची
आज 'विश्व दयालुता दिवस' है, जिसकी शुरुआत 1997 में जापान से हुई थी। टोक्यो में पहली बार दया के लिए विश्व आंदोलन सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन का उद्देश्य लोगों को दया का महत्व समझाना और अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करना था। 1997 में शुरू हुए इस आंदोलन को सन 2000 में आधिकारिक दर्जा मिला और 13 नवंबर 'विश्व दयालुता दिवस' के रूप में स्थापित हो गया।
दयालुता मानवीय स्थिति का एक मूलभूत हिस्सा है जो जाति, धर्म, राजनीति, लिंग और स्थान के विभाजन को पाटता है। 'विश्व दयालुता दिवस' एक ऐसा दिन है जो व्यक्तियों को सीमाओं, नस्ल और धर्म की अनदेखी करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
दया का भाव मनुष्य की प्रवृत्ति का हिस्सा है, लेकिन फिर भी सभी लोग दयावान नहीं होते हैं, दया नहीं दिखाते हैं, यह भी मानव स्वभाव का अंग है। सोच सबकी अलग-अलग होती है विचार अलग-अलग होते हैं तो निश्चित रूप से भाव और भावना भी अलग ही होंगे, एक जैसे नहीं। यह याद रखने वाली बात है कि इंसान ही इंसान की मदद करता है और यही संदेश दया के पौधे को सींचता है।
महाभारत कहता है - 'दया सबसे बड़ा धर्म है', संत कबीर कहते हैं - 'जहां दया तहं धर्म है, जहां लोभ तहं पाप। जहां क्रोध तहं काल है, जहां क्षमा तहं आप।।' गोस्वामी तुलसीदास दया का महत्व बताते हैं - 'दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया ना छांडिए जब तक घट में प्राण।।' मुंशी प्रेमचंद दया को मनुष्य का स्वाभाविक गुण मानते हैं। शेक्सपियर का कहना है - 'हम सभी ईश्वर से दया की प्रार्थना करते हैं और वही प्रार्थना हमें दया करना सिखाती है।'
फ्रांसिस का कथन है - 'न्याय करना ईश्वर का काम है, आदमी का काम तो दया करना है।' क्लॉडियस मानते हैं कि दयालुता हमें ईश्वर तुल्य बनाती है। बेली कहते हैं कि दयालु चेहरा सदैव सुंदर होता है। सोफोक्लीज की मान्यता है कि दयालुता दयालुता को जन्म देती है। होम का कहना है - 'जो सचमुच दयालु है वही सचमुच बुद्धिमान है और जो दूसरों से प्रेम नहीं करता उस पर ईश्वर की कृपा नहीं होती है।' शेख सादी का मानना है कि जो असहायों के ऊपर दया नहीं करता, उसे शक्तिशालियों के अत्याचार सहने पड़ते हैं। जूलिया कार्नी का कहना है - 'दया के छोटे-छोटे से कार्य, प्रेम के जरा-जरा से शब्द हमारी पृथ्वी को स्वर्ग बना देते हैं।' हजरत मोहम्मद साहब का कथन है - 'मुझे दया के लिए भेजा है शाप देने के लिए नहीं।'
दया एक ऐसी भाषा है जिसे बोलने की जरूरत नहीं होती। जिस मनुष्य में दया नहीं उसे पशु के समान बताया गया है। कोई भी समझदार व्यक्ति पशु से तो अपनी तुलना नहीं कराना चाहेगा, लेकिन पशु से तुलना न हो तो इसके लिए दयालु होना होगा। भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों ने दया को धर्म के समान माना है, आज 'विश्व दयालुता दिवस' पर दयावान बनने का संकल्प लें और उस पर दृढ़ रहें तो हमारा संसार बहुत सुखी हो जाएगा।