दिवस विशेष : 4 दिसंबर को ही भारत में हुआ था 'सती प्रथा' का अंत!
भारत
चेतना मंच
04 Dec 2021 05:57 AM
विनय संकोची
यह पौराणिक प्रसंग तो सुना ही होगा कि पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने से क्षुब्ध होकर मां दुर्गा के सती रूप ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। कुछ लोग मानते हैं कि सती प्रथा की शुरुआत वहीं से हुई थी। हालांकि इस प्रसंग को सती प्रथा से नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि सती के पति जीवित थे, जबकि पति की मृत्यु पर उसके शव के साथ सती होने पर कथित प्रथा थी।
यह बहस का विषय हो सकता है कि सती प्रथा कब से शुरू हुई, लेकिन इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि भारत में सती प्रथा का अंत 4 दिसंबर 1829 को हुआ था। ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागृत किया, जिसके फलस्वरूप उनके आंदोलन को बल मिला और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को सती प्रथा रोकने के लिए कानून बनाना पड़ा, जो 4 दिसंबर 1829 को पारित हुआ।...और इस तरह सदियों से चली आ रही, सभ्य समाज के नाम पर कलंक कुप्रथा 'सती प्रथा' से महिलाओं को मुक्ति मिली।
इतिहास कहता है कि गुप्त काल में 510 ईसवी के आसपास सती प्रथा होने के प्रमाण मिलते हैं। महाराजा भानु प्रताप के राजघराने के गोपराज की युद्ध में मृत्यु हो जाने के बाद उनकी पत्नी ने अपने प्राण त्याग दिए थे। इस घटना को होते देखकर भी मौन रहने वाले यदि ऐसा ना होने देते तो सती प्रथा जन्म ही नहीं लेती। लेकिन कुछ लोगों ने मृत पति की जायदाद हड़पने के लिए उनकी पत्नियों को जबरन सती होने पर जोर दिया। इस तरह लालच और धर्म की आड़ में विधवाओं को मृत पति के साथ जलकर प्राण त्यागने के लिए मजबूर करने का पाप किया जाता रहा और समाज इस पाप को होते हुए देखता रहा।
19वीं शताब्दी में इस कुप्रथा के विरूद्ध समाज में थोड़ी चेतना जागृत हुई। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को समाप्त करने के बहुत प्रयास किए, जिसमें एक था विधवा विवाह को समाज में स्वीकृति दिलाना। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा सरीखी गलत परंपराओं और उनके बुरे प्रभावों के साथ उसके निवारण पर हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला भाषा में पुस्तकें लिख कर मुफ़्त बंटवाई। राजा राममोहन राय के प्रयास ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। परिणाम यह हुआ कि 4 दिसंबर 1829 को लॉर्ड विलियम बेंटिक की अगुवाई और महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय के प्रयासों से भारत में सती प्रथा पर पूरी तरह से रोक लग गई।
प्राचीन काल में सती प्रथा का एक सबसे मुख्य कारण यह था कि आक्रमणकारियों द्वारा जब युद्ध में पुरुषों की हत्या कर दी जाती थी, उसके बाद उनकी विधवाओं अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए पति की चिता के साथ आत्मदाह करने को विवश हो जाती थीं। सती प्रथा एक सामाजिक कुरीति थी, यह कोई धार्मिक प्रथा नहीं थी, लेकिन समाज के कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसे अनिवार्य धार्मिक कृत्य के रूप में स्थापित कर डाला। राजा राममोहन राय का समाज सदैव ऋणी रहेगा जिन्होंने इस कुप्रथा को समाप्त करने का बीड़ा उठाकर उसे समाप्त कर दिखाया।