पुण्यतिथि : आजीवन विद्रोह के स्वर गुंजाते रहे थे 'लालाजी'
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 03:01 AM
विनय संकोची
जिनकी मौत का बदला लेने के लिए शहीद-ए- आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने सांडर्स की हत्या कर फांसी का फंदा चूमा था, आज उन्हीं पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की पुण्यतिथि है। आजीवन विद्रोह के स्वर मुखरित करने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी लाला जी ने 17 नवंबर 1928 को अंतिम सांस ली थी।
लाला जी सही मायने में ऐसे क्रांतिकारी थे जो क्रांति के जरिए भारत की आजादी चाहते थे। यही कारण था कि उदारवादी कांग्रेसियों से उनके विचार मेल नहीं खाए। 28 जनवरी 1865 को फिरोजपुर जिले के ढूढीके गांव में जन्मे लाला जी की किशोरवय में स्वामी दयानंद सरस्वती से भेंट होने के बाद आर्य समाजी विचारों के समर्थक हो गए थे।
पढ़ाई पूरी कर लालाजी ने जगरांव में वकालत शुरु कर दी। बाद में उन्होंने रोहतक और हिसार में वकालत की। आर्य समाज के सक्रिय कार्यकर्ता थे, इसलिए उन्होंने दयानंद कालेज के लिए धन जुटाने का काम भी किया। स्वामी दयानंद सरस्वती के निधन के बाद लालाजी ने एंग्लो वैदिक कॉलेज के विकास के प्रयास शुरू किए। इसी के साथ लालाजी कांग्रेस में भी शामिल हो गए। 1892 में वे लाहौर चले गए। जब 1897 और 1899 में देश में के कई हिस्सों में अकाल पड़ा, तो लालाजी ने राहत कार्यो में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया, यहां तक कि पीड़ितों को अपने घर तक में ठहराया।
जब अंग्रेजों ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया, तो लाला जी ने बंगाल के प्रमुख आंदोलनकारियों सुरेंद्रनाथ बनर्जी और विपिन चंद्र पाल से हाथ मिला लिया और बंगाल विभाजन का जमकर विरोध किया। उन्होंने संपूर्ण भारत में स्वदेशी वस्तुएं अपनाने के लिए अभियान चलाया। 3 मई 1907 को ब्रिटिश सरकार ने उन्हें रावलपिंडी में गिरफ्तार कर लिया। रिहा होने के बाद लालाजी दोगुने जोश के साथ आजादी के संघर्ष में कूद पड़े।
लालाजी ने कांग्रेस में रहकर गांधी जी के द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। लाला लाजपत राय के नेतृत्व में यह आंदोलन पंजाब के कोने-कोने में फैल गया और जल्द ही उन्हें लोग 'पंजाब केसरी' या 'पंजाब का शेर' नाम से पुकारने लगे। लालाजी ने सर्वोच्च बलिदान साइमन कमीशन के समय दिया। 3 फरवरी 1928 को कमीशन भारत पहुंचा, जिसके विरोध की आग सारे देश में भड़क उठी। लाहौर में 30 अक्टूबर 1928 को लाला जी के नेतृत्व में साइमन कमीशन का विरोध कर रहे युवाओं को पुलिस ने लाठियों से जमकर पीटा। पुलिस ने लालाजी की छाती पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं। लालाजी बुरी तरह से घायल हो गए और अंततः लाठियों की चोट के कारण 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया।
पंजाब केसरी लाला जी आजादी के दीवाने ही नहीं एक महान समाज सुधारक और महान समाजसेवी भी थे। लाला जी का जितना सम्मान गांधीवादी करते थे उतना ही सम्मान क्रांतिकारियों के दिल में भी था। अन्य किसी नेता का ऐसा प्रभाव संभवतः नहीं था। 'पंजाब केसरी लालाजी' को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन!