वेद वाक्य 'सत्यमेव जयते' को नारे के रूप में जन-जन तक पहुंचाने का काम करने वाले महामना मदन मोहन मालवीय जी की आज पुण्यतिथि है। वह महामना ही थे, जिन्होंने 4 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की नींव डालकर भारतीयों को अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी का एक विषय के रूप में अध्यापन आरंभ कराया। उनका जीवन पूर्णत: हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान को समर्पित था।
मदन मोहन मालवीय अपने हृदय की महानता के कारण 'महामना' कहलाए। आज तक उनके अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति इस उपाधि का अधिकारी नहीं बन पाया है। मालवीय जी का जीवन व्रत था - 'सिर जाए तो जाए, प्रभु मेरा धर्म न जाए।'
मालवीय जी को एक कुशल अधिवक्ता, निर्भीक पत्रकार, संवेदनशील समाज सुधारक, भारत की भावी पीढ़ी को भारतीयता का पाठ पढ़ाने वाले एक सफलतम शिक्षाविद के रूप में जाना जाता है। साथ ही मालवीय जी को स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने के लिए भी याद किया जाता है। महामना ने न केवल सामाजिक न्याय और समानता पर मजबूती से अपना पक्ष रखा, अपितु अस्पृश्यता, अशिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह पर भी खुलकर बोले और लिखा।
मालवीय जी की योग्यता का लोहा ब्रिटिश सरकार भी मानती थी। आखिर उन्होंने चौरी चौरा कांड में उन 170 क्रांतिकारियों के मुकदमे की पैरवी की थी, जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने फांसी की सजा सुनाई थी। महामना ने 151 लोगों को अपने अकाट्य तर्कों के आधार पर फांसी की सजा से मुक्त करवाया था।
पंडित मालवीय बनारस हिंदू विश्व विद्यालय के लिए देशभर से चंदा एकत्रित कर रहे थे, उस समय की एक बड़ी रोचक घटना है। हैदराबाद के निजाम ने चंदे के रूप में मालवीय जी को अपनी जूती देने की बात कह दी। निजाम ने दान देने से साफ मना करते हुए बदतमीजी से कहा - 'दान में देने के लिए हमारे पास सिर्फ जूती है।' महामना ने मन ही मन कुछ निर्णय किया और निजाम की जूती ही उठा कर ले आए। बाजार में आकर पंडित मालवीय ने निजाम की जूतियों की नीलामी शुरू कर दी। खबर निजाम तक पहुंची तो उसे लगा उसकी जूतियां की ही नहीं, उसकी इज्जत भी नीलाम हो रही है। निजाम ने तत्काल मालवीय जी को बुला भेजा और उन्हें भारी भरकम दान देकर सम्मान विदा किया।
अंग्रेजी राज में एक स्वदेशी विश्वविद्यालय का निर्माण मालवीय जी की महानतम उपलब्धियों में से एक है। पंडित मालवीय ने पेशावर से कन्याकुमारी तक की यात्रा करके उस जमाने में एक करोड़ 64 लाख रुपए की भरी रकम इकट्ठा की थी। मालवीय जी के अथक प्रयासों से विश्वविद्यालय के लिए 1360 एकड़ जमीन दान में मिली थी, जिसमें 11 गांव, 70 हजार पेड़, 100 पक्के कुएं, 20 कच्चे कुएं, 860 कच्चे मकान, 40 पक्के मकान, एक मंदिर और धर्मशाला शामिल थे। 1915 तक पूरा पैसा जमाकर 5 लाख गायत्री मंत्रों के जाप के साथ विश्व विद्यालय का भूमि पूजन हुआ।
मालवीय जी 50 वर्षों तक कांग्रेस में सक्रिय रहे। इतना ही नहीं वे 1909, 1918,1930 और 1932 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। महात्मा गांधी के हृदय में मालवीय जी के प्रति अपार सम्मान था। महात्मा गांधी ने एक अवसर पर कहा था - 'जब मैं मालवीय जी से मिला वह मुझे गंगा की धारा की तरह निर्मल और पवित्र लगे। मैंने तय कर लिया मैं उसी निर्मल धारा में गोता लगाऊंगा।' आज न तो गंगा निर्मल है और न ही दिनों दिन सड़ांध मारती राजनीति में महामना मदन मोहन मालवीय जैसे महामानव के लिए कोई स्थान। महापुरुषों के नाम को कैशकर स्वार्थ सिद्धि की होड़ जरूर है। महामना को उनकी पुण्यतिथि पर शत शत नमन।