SIR को लेकर विपक्ष का विरोध लोकतंत्र में असहमति के अधिकार को सामने लाता है, लेकिन इसी के साथ आम नागरिक के अधिकारों और रोजमर्रा की जिंदगी का सवाल भी महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग से सवाल पूछना, मतदाता सूची की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज कराना और सरकार से जवाब मांगना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है।

Editrorial : लोकतंत्र केवल सरकार बनाने की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र वह व्यवस्था है जिसमें नागरिकों को सवाल पूछने, असहमति व्यक्त करने और सत्ता के फैसलों का विरोध करने का अधिकार प्राप्त होता है। यही कारण है कि सरकार, चुनाव आयोग अथवा किसी भी संवैधानिक संस्था के फैसले पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा भी है। आज देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक बहस और विरोध का दौर जारी है। विपक्ष इस प्रक्रिया को लेकर लगातार अपनी आपत्तियां और आशंकाएं सामने रख रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं और राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से जनता के बीच इस मुद्दे को उठा रहे हैं। ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद के लिए पर्याप्त जगह है? मेरी दृष्टि में इसका उत्तर स्पष्ट होना चाहिए — हां। यदि विपक्ष किसी संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है तो चुनाव आयोग को उसके प्रतिनिधियों के साथ बैठकर उनकी बात सुननी चाहिए। यदि किसी आपत्ति में तथ्य है तो उसे स्वीकार कर आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए। और यदि कोई आशंका तथ्यों पर आधारित नहीं है तो आयोग को भी पूरी स्पष्टता और प्रमाण के साथ देश के सामने उसका जवाब देना चाहिए। लोकतंत्र में किसी संस्था की मजबूती केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह कितने दृढ़ निर्णय लेती है। उसकी विश्वसनीयता इस बात से भी तय होती है कि वह अपने फैसलों पर उठने वाले सवालों का कितनी पारदर्शिता और धैर्य के साथ जवाब देती है। Editrorial
विपक्ष लंबे समय से चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े विषयों पर सवाल उठा रहा है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल चुनाव के समय सरकार को चुनौती देना नहीं है। विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर नजर रखे, सवाल पूछे और जहां उसे कुछ गलत दिखाई दे वहां आवाज उठाए। लेकिन इसी के साथ विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। किसी भी गंभीर लोकतांत्रिक मुद्दे को राजनीतिक आंदोलन में बदलते समय यह ध्यान रखना होगा कि विरोध की कीमत आम नागरिक को न चुकानी पड़े।
प्रदर्शन कीजिए। पूरी ताकत से कीजिए। सरकार से सवाल पूछिए। चुनाव आयोग से जवाब मांगिए। आवश्यकता हो तो अदालत का दरवाजा खटखटाइए। संवैधानिक संस्थाओं के सामने अपनी बात रखिए। लेकिन लोकतांत्रिक विरोध को आम आदमी के जीवन के लिए संकट मत बनाइए। देश का दुकानदार अपनी दुकान खोलना चाहता है। कर्मचारी अपने कार्यालय जाना चाहता है। विद्यार्थी अपनी परीक्षा देने जाना चाहता है। किसी परिवार को अस्पताल पहुंचना हो सकता है। किसी व्यक्ति को जरूरी काम से यात्रा करनी हो सकती है। यदि किसी आंदोलन के कारण सड़कें बंद हो जाएं, एंबुलेंस रास्ते में फंस जाए, कारोबार ठप हो जाए या सामान्य नागरिक अपने जरूरी काम तक न पहुंच पाए, तो विरोध का उद्देश्य कहीं न कहीं कमजोर पड़ जाता है। Editrorial
राजनीतिक आंदोलन की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने कितनी सड़कें बंद कीं या कितने घंटे सामान्य जीवन बाधित किया। विरोध की असली ताकत इस बात में है कि उसकी आवाज कितनी दूर तक पहुंची और उसके तर्क ने कितने लोगों को सोचने पर मजबूर किया। विपक्ष के सामने आज एक बड़ा अवसर है। वह ऐसा लोकतांत्रिक विरोध खड़ा कर सकता है जिसमें आवाज सबसे बुलंद हो, सवाल सबसे तीखे हों और आम नागरिक को परेशानी सबसे कम हो। सड़क रोकने के बजाय अपनी बात देश तक पहुंचाइए। प्रशासन से टकराने के बजाय तर्क से टकराइए। सरकार से सवाल पूछिए, चुनाव आयोग से जवाब मांगिए और यदि आपको लगता है कि कहीं संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं तो न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं का दरवाजा खटखटाइए। यह रास्ता लोकतांत्रिक संघर्ष को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसे और मजबूत बनाता है। Editrorial
किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी परीक्षा उस समय होती है जब उसके सामने एक मानवीय संकट खड़ा हो। कल्पना कीजिए कि किसी प्रदर्शन के बीच किसी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना जरूरी है। किसी गर्भवती महिला को चिकित्सा सहायता चाहिए। किसी बच्चे की तबीयत बिगड़ गई है। किसी बुजुर्ग को तत्काल उपचार की आवश्यकता है। उस क्षण प्रदर्शनकारी के सामने राजनीतिक विचारधारा से पहले इंसानियत खड़ी होनी चाहिए। यदि किसी प्रदर्शन में किसी की जान बचाने का अवसर मिले तो प्रदर्शनकारी को सबसे पहले रास्ता देना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली ताकत है। क्योंकि लोकतंत्र केवल अधिकारों की बात नहीं करता, वह जिम्मेदारियों की भी याद दिलाता है। Editrorial
इस पूरे विवाद में जिम्मेदारी केवल विपक्ष की नहीं है। सरकार और चुनाव आयोग की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। विपक्ष के सवालों का जवाब देना कमजोरी नहीं है। संवाद करना किसी संस्था की प्रतिष्ठा कम नहीं करता। बल्कि पारदर्शिता और संवाद संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास बढ़ाते हैं। इसी तरह विपक्ष को भी यह समझना होगा कि लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करते समय दूसरे नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करना भी उसकी जिम्मेदारी है। एक नागरिक को विरोध करने का अधिकार है तो दूसरे नागरिक को बिना बाधा अपने काम पर जाने का अधिकार भी है। दोनों अधिकार लोकतंत्र के ही हिस्से हैं। Editrorial
लोकतंत्र की सुंदरता इसी संतुलन में है—सत्ता मजबूत हो, लेकिन निरंकुश न हो; विपक्ष मुखर हो, लेकिन अराजक न हो; संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र हों, लेकिन संवाद से दूर न हों; और जनता को विरोध की आवाज सुनाई दे, लेकिन उसकी रोजमर्रा की जिंदगी कुचली न जाए। आज देश को ऐसे ही लोकतांत्रिक व्यवहार की आवश्यकता है। विरोध लोकतंत्र की आवाज है, लेकिन आम आदमी की जिंदगी की कीमत पर नहीं। लोकतंत्र में असहमति होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए, सवाल होने चाहिए और जरूरत पड़े तो आंदोलन भी होना चाहिए। लेकिन इन सबके बीच एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए— हम जिस लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उसकी सबसे बड़ी ताकत स्वयं आम नागरिक है। उसकी सुरक्षा, सम्मान, आजीविका और सामान्य जीवन की रक्षा करना भी लोकतांत्रिक संघर्ष का ही हिस्सा है। Editrorial
वीरेश तिवारी, लेखक
विज्ञापन