Dharm-Karm : सटीक और श्रेष्ठ है 'भारतीय संवत्' की काल गणना!
भारत
चेतना मंच
02 Apr 2022 03:57 PM
विनय संकोची
अनादि काल से हिंदुओं को समय का अत्यंत सूक्ष्म ज्ञान रहा। हमारे विद्वान पूर्वज काल एवं ग्रह-नक्षत्र आदि की स्थिति से भलीभांति परिचित थे। इस 'काल-ज्ञान' के लिए भारतीय ज्योतिष विज्ञान ने गहन विचार किया गया है। काल गणना में कल्प, मन्वंतर, युग आदि के पश्चात संवत्सर का नाम आता है। युग भेद से सतयुग में ब्रह्म-संवत्, त्रेता में वामन-संवत् परशुराम-संवत् तथा श्रीराम-संवत्, द्वापर में युधिष्ठिर-संवत् और कलि में विक्रम, विजय, नागार्जुन और कल्कि संवत् प्रचलित हुए हैं या भविष्य में होंगे। इन सम्वतों के अलावा अनेक राजाओं तथा संप्रदाय के आचार्यों के नाम पर भी संवत् चलाए गए हैं। भारतीय संवत् अत्यंत प्राचीन है, साथ ही गणित की दृष्टि से भारतीय संवत् अत्यंत सुगम और सर्वथा उचित गणना के माध्यम से निश्चित किए गए हैं। भारत में कुछ महापुरुषों के संवत्सर उनके अनुयायियों द्वारा श्रद्धावश भी चलाए गए। लेकिन भारत का सर्वमान्य संवत् 'विक्रम संवत्' ही है, जिसे महाराज विक्रमादित्य ने चलाया था।
नवीन संवत चलाने की शास्त्रीय विधि यह है कि जिस राजा को अपना संवत् चलाना हो, उसे संवत् चलाने के दिन से पहले कम से कम अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के भी ऋणी हों, उनका कर्ज अपनी तरफ से चुकाना होता है। भारत के बाहर इस नियम का किसी देश में पालन हुआ हो ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन महाराज विक्रमादित्य इस कड़े नियम का पालन करते हुए राज्य के संपूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस जाति, जिस धर्म, जिस संप्रदाय, जिस वर्ग के व्यक्ति का हो स्वयं देकर अपने नाम का संवत् चलाने के अधिकारी बने।
विक्रम संवत् के महीनों के नाम विदेशी सम्वतों की तरह देवता, मनुष्य या संख्यावाचक कृत्रिम नाम नहीं है। महीनों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय-अस्त से संबंध रखते हैं। ठीक यही बात तिथि तथा दिनांक पर भी लागू होती है। वे सभी सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित, आश्रित हैं। विक्रम संवत पूरी तरह से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। गणितीय दृष्टि से भारत के राष्ट्रीय संवत् विक्रम संवत् में आज तक न तो गणना संबंधी कोई अंतर पड़ा है और न ही भविष्य में ऐसा कुछ होने की संभावना है।
भारत के अतिरिक्त अन्य देशों प्रायः मुस्लिम देशों में चंद्र वर्ष तथा दूसरों में सौर और सावन वर्षों से काल गणना की जाती है। भारत में लौकिक वर्ष गणना सौर वर्ष से होती है। विभिन्न गणना सिद्धांतों में वर्षों का यदि कल्पों तक की गणना में उपयोग किया जाए, तो उनमें सूर्य सिद्धांत का मान ही सटीक, भ्रमहीन और सर्वश्रेष्ठ प्रमाणित होता है। यह जानकर निश्चित रूप से आश्चर्य होना चाहिए कि सृष्टि-संवत् के प्रारंभ से यदि आज की तारीख तक का गणित फैलाया जाए, तो सूर्य सिद्धांत के अनुसार एक दिन का भी अंतर नहीं पड़ता है। सूर्य सिद्धांत के मान में एक पल कम कर के गणित करने से 5000 वर्ष तक के दिन आदि सब ठीक मिलते हैं, जबकि अन्य सिद्धांत गणित में खरे नहीं उतरते हैं।
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार नव संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है। मान्यता है कि इसी तिथि को ब्रह्मा जी ने संपूर्ण सृष्टि और लोकों का सृजन किया था। इसी दिन श्री हरि विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था। एक संवत् में छह ऋतु में होती हैं। एक संवत् में 12 महीने होते हैं, जिनका क्रम चैत्र से फाल्गुन तक निश्चित होता है। मान्यता यह भी है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी किसी दिन हुआ था। शक्ति और भक्ति के प्रतीक नवरात्रि इसी दिन से प्रारंभ होते हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati) ने आर्य समाज की स्थापना कर 'कृणवंतो विश्वआर्यम्' का संदेश दिया था। विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को पराजित कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठ राज्य स्थापना के लिए इसी दिन को चुना था। सिक्खों के दूसरे गुरु अंगद देव जी का जन्म इसी दिन हुआ था।
नव संवत्सर का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व तो है ही, इसका प्राकृतिक महत्व कम नहीं है। इस समय जलवायु समशीतोष्ण रहती है। वसंत आगमन के साथ ही पतझड़ की विदाई हो जाती है। संवत्सर को मात्र अंकों का खेल मानने की गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह तो एक ऐसा आईना है, जिसमें प्रकृति का प्रत्येक अंग और रंग स्पष्ट दिखाई देता है। विद्वानों के अनुसार संवत्सरों की संख्या 60 है और नवीन विक्रम संवत 2079 का नाम 'नल' है।