Thursday, 27 February 2025

Dharma & Spiritual: मनुष्य जीवन सफल बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए।

 विनय संकोची भगवान ने कृपा कर हमें मानव शरीर, हमारे पूर्व जन्म के भोग भोगने के लिए दिया है। प्रकृति…

Dharma & Spiritual: मनुष्य जीवन सफल बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए।

 विनय संकोची

भगवान ने कृपा कर हमें मानव शरीर, हमारे पूर्व जन्म के भोग भोगने के लिए दिया है। प्रकृति का नियम है कि हम एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकते, अपितु प्रत्येक क्षण आनंद प्राप्ति के लिए ही कार्य करते रहते हैं। अनुकूल परिस्थिति हमारे पूर्व जन्म के संचित गुणों को क्षीण करती है, इसलिए इसका उपयोग प्राणियों की सेवा में लगाकर प्रसन्न रहना चाहिए जबकि प्रतिकूल परिस्थिति हमारे संचित पापों को काटती हैं, इसलिए इसको भगवान का प्रसाद मानकर सहर्ष लेने से हम अपने परमपिता परमात्मा के नजदीक पहुंच सकते हैं। इस प्रकार हमें अनुकूलता या प्रतिकूलता में सजग रहकर दोनों का उपयोग करके अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए।

अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियां, सांसारिकता से संबंध रखती हैं, इसलिए इनकी अनुभूति हमारे अहम को होती है, पर अनुकूलता हमको भगवत सत्ता से दूर कर देती है क्योंकि हम सोचते हैं कि अनुकूलता हमारे परिश्रम का परिणाम है, इसीलिए हमारे अहंकार को पुष्ट करती है। प्रतिकूलता की अनुभूति हमारे अहम को ही होती है, किंतु क्रिया का प्रतिकूल परिणाम मिलने पर हमारी दृष्टि, हमारी असफलता, हमारी असहाय अवस्था, दीन अवस्था की स्थिति पर चली जाती है और हम सोचते हैं कि यह भगवान की कृपा से ही हो रहा है। ऐसा मानकर उस प्रतिकूलता पर संतोष करना पड़ता है क्योंकि प्रकृति का नियम है कि हमें अपनी अच्छाइयां ही दृष्टि में आती हैं और अपनी कमजोरियों पर या असफलताओं पर हमारी दृष्टि कभी जाती ही नहीं। जैसे-जैसे हम प्रतिकूलता में रहते हैं हमारा अहम टूटता जाता है फिर एक दिन भगवान कृपा कर हमारे सूक्ष्म अहम को तोड़कर भगवत सत्ता का अनुभव करा देते हैं। यह उनकी भगवत बस चलता है प्रतिकूलता हमारे जीवन में दीनता लाती है, दीनता आध्यात्मिक जगत में जीव का आभूषण है। दीनता हमारे अहम को उस विराट सत्ता में खो देने का साधन है। यही इस जीवन का सत्य है।

हमारे शरीर और संसार एक ही तत्वों से बना है। इसलिए जड़ एवं नश्वर वस्तु या व्यक्ति में सुख खोजना हमारा स्वभाव-सा बन गया है। यह हमारा अज्ञान ही है, क्योंकि इसमें सुख है ही नहीं। वह हमें सुख कहां से देगा, फिर सारा संसार मिलकर भी हमारे लिए रचे विधान के विपरीत हमारी एक भी चाह की पूर्ति नहीं कर सकता। हम संसार का सदुपयोग न करके, उपभोग करना चाहते हैं और जन्म जन्मांतर से संसार में सुख खोजते हैं। किंतु हमारी सुख की चाह आज तक अपूर्ण ही है। सुख चाहने की यह मान्यता इतनी मजबूती से हमारे मानने में आ गई है कि अब उसको मिटाना इतना आसान काम नहीं रहा। वस्तुतः संसार में सुख है ही नहीं, हमारे मन के अनुकूल फल मिलने पर हमें सुख की अनुभूति होती है और उस वस्तु या व्यक्ति से हमारा राग हो जाता है। इसी तरह प्रतिकूल फल मिलने पर दु:ख हो जाता है और उस वस्तु या व्यक्ति से हमारे द्वेष हो जाता है। इस प्रकार हम राग-द्वेष के चक्कर में फंस कर काम, क्रोध, लोभ, मोह, ममता आदि विकारों में फंसकर बार-बार अनेक योनियों में चक्कर लगाते रहते हैं। यही मानव मात्र की नियति है।

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