दीपावली को पंच पर्व क्यों कहा जाता है और धनतेरस से भैया दूज तक मनाए जाने वाले पांच त्योहारों का भारतीय संस्कृति में क्या महत्व है ? दीपावली केवल दीप जलाने और खुशियां मनाने का पर्व है या इसके पीछे सामाजिक एकता, भाईचारे और सौहार्द का भी गहरा संदेश छिपा है।

विनोद शर्मा
Editorial : दीपावली महज दीपों का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। धनतेरस से लेकर भैया दूज तक चलने वाले ये पांच पर्व (पंच पर्व) सदियों से भारतीय जीवन के आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक पक्षों को एक सूत्र में पिरोते आए हैं। समय के साथ इनका स्वरूप बदला है, पर इनका मूल संदेश - प्रकाश की अंधकार पर विजय, सामूहिकता और भाईचारा - अखंड रहा है।
पंच पर्व का इतिहास पुराणों और लोक स्मृति दोनों में गहराई से जुड़ा है। धनतेरस समुद्र मंथन से जुड़े धन्वंतरि के आविर्भाव और आरोग्य के महत्व को रेखांकित करता है। नरक चतुर्दशी कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध और अत्याचार से मुक्ति की कथा से जुड़ी है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। मुख्य दीपावली उत्तर भारत में भगवान राम के अयोध्या लौटने और दक्षिण व अन्य क्षेत्रों में लक्ष्मी पूजा से जुड़ा है। गोवर्धन पूजा योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है, जबकि भैया दूज यमुना-यम के भाई-बहन संबंध का उत्सव है। ऐतिहासिक दृष्टि से अल-बिरूनी जैसे यात्रियों के वृत्तांत और प्राचीन शिलालेखों में कार्तिक अमावस्या पर दीप प्रज्वलन का उल्लेख मिलता है। यह पर्व फसल उत्सव, व्यापारिक लेखा-जोखा के नवीनीकरण और सामुदायिक समारोह का भी माध्यम रहा है। जैन परंपरा में महावीर निर्वाण और सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस जैसे आयाम इसे बहुधार्मिक बनाते हैं।
पंच पर्व भारतीय समाज को जोड़ने वाले दुर्लभ अवसरों में से एक हैं। धनतेरस पर नए बर्तन और सोना-चांदी खरीदने की परंपरा आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा देती है, जबकि दीपावली पर घरों की सफाई, रंगोली, मिठाई बांटना और पड़ोसियों से मिलना सामाजिक दूरी को मिटाता है। गोवर्धन पूजा में अन्नकूट और सामूहिक भोजन सामुदायिक सहभागिता का उदाहरण है। भैया दूज भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करता है और परिवार की एकता का संदेश देता है।बदलते समय में ये पर्व और समावेशी हो गए हैं। शहरों में अपार्टमेंट सोसाइटियों में सामूहिक आयोजन, डिजिटल दीपदान और पर्यावरण अनुकूल हरित पटाखों का चलन बढ़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रूप बरकरार है, जबकि महानगरों में व्यावसायिक उत्सव के साथ-साथ सामाजिक दायित्व भी जुड़ गया है। विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग इन आयोजनों में भाग लेते हैं, जो भारतीय समाज की सहिष्णुता और सौहार्द को दर्शाता है।
व्यावसायीकरण और उपभोक्तावाद ने कुछ हद तक पर्वों के आंतरिक अर्थ को प्रभावित किया है, पर साथ ही इन्होंने रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ाया है। प्रदूषण की चिंता के बीच हरित दीपावली का अभियान एक सकारात्मक बदलाव है। डिजिटल युग में वीडियो कॉल से दूर बैठे परिवार भैया दूज मना रहे हैं, जो भाईचारे के विस्तार को दिखाता है।अंततः पंच पर्व हमें याद दिलाते हैं कि प्रकाश केवल दीपों में नहीं, बल्कि आपसी संबंधों, सामूहिक जिम्मेदारी और सामाजिक एकता में भी है। जब पूरा भारत एक साथ दीप जलाता है, तो वह सिर्फ घरों को नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को भी प्रकाशित करता है। बदलते स्वरूप के बावजूद इन पर्वों की मूल शक्ति—एकजुटता, सौहार्द और भाईचारा—आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सदियों पहले थी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
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