लगभग 16000 साल से मनुष्य के साथ रहता आ रहा कुत्ता वफादारी का पर्याय माना जाता है। कुत्ते ने आदमी से बहुत कुछ सीखा है। आदमी ने कुत्ते से कितना सीखा यह शोध का विषय है। हो सकता है, इस पर शोध हो भी रहा हो। बहरहाल आज आपको एक ऐसे कुत्ते की व्यथा कथा से अवगत करा रहा हूं जो अपने ही बिरादरी वालों से परेशान हो गया था। यह कथा पंचतंत्र से है और यूं है-
एक गांव में चित्रांग नाम का एक कुत्ता रहता था। वहां दुर्भिक्ष पड़ गया। अन्न के अभाव में कई कुत्तों का वंश नाश हो गया। चित्रांग ने भी दुर्भिक्ष से बचने के लिए दूसरे गांव की राह ली। वहां पहुंच कर उसने एक घर में जाकर चोरी से भर पेट खाना खा लिया। जिसके घर खाना खाया था, उसने तो कुछ नहीं कहा लेकिन घर के बाहर निकला तो आज-पास के सब कुत्तों ने उसे घेर लिया। भयंकर लड़ाई हुई चित्रांग के शरीर पर कई घाव लग गए। चित्रांग ने सोचा इससे तो अपना गांव ही अच्छा था। वहां केवल दुर्भिक्ष है, जान के दुश्मन कुत्ते तो नहीं है।
ऐसा सोचकर वह वापस आ गया अपने गांव। आने पर उससे सब कुत्तों ने पूछा -' चित्रांग दूसरे गांव की बात सुना। गांव कैसा है वहां के लोग कैसे हैं। वहां खाने-पीने की चीजें कैसी हैं?
चित्रांग ने उत्तर दिया-'मित्रों उस गांव में खाने-पीने की चीजें तो बहुत अच्छी हैं। लोग भी नरम स्वभाव के हैं, किंतु दूसरे गांव में एक ही दोष है अपनी ही बिरादरी के कुत्ते बड़े नालायक हैं।
यह तो पंचतंत्र का कुत्ता चित्रांग था, जिसे मात्र एक घटना से ही सच्चाई का ज्ञान हो गया पर एक दूसरा कुत्ता कालू था, जो हमेशा गलतफहमी का शिकार रहा। कालू की कहानी कुछ यूं है कि एक बड़े गांव में कालू नाम का कुत्ता रहता था जो एक किसान का पालतू था। कालू की विशेष आदत थी कि जब भी किसान बैलगाड़ी लेकर जाता तो कालू बैलगाड़ी के नीचे घुस जाता और उसी के नीचे चलता हुआ शहर तक जाता और वैसे ही वापस आता। असल में क्या है कि कालू को एक बहुत बड़ी गलतफहमी थी कि बैलगाड़ी उसके चलाए से चल रही है। मतलब उसे लगता था कि चूंकि वह गाड़ी के नीचे चल रहा है, इसलिए गाड़ी चल पा रही, जिससे किसान का भला हो रहा है। कालू स्वयं को बड़ा भारी स्वामी भक्त और परोपकारी मानता था उस अज्ञानी को बैलों की मेहनत का कोई ज्ञान नहीं था। बैलों के श्रम का उसकी नजर में कोई मोल नहीं था। अहंकारी कालू भ्रमित था। एक दिन कालू बैलगाड़ी के नीचे चल रहा था, तो उसने एक प्रयोग करने के बारे में सोचा। चलते-चलते अचानक रुक गया उसे लगा उसके रुकते बैलगाड़ी रुक जाएगी, लेकिन गाड़ी को न रुकना था न रुकी। कालू ने यह देखा और गाड़ी के नीचे पहुंच गया। उसे रुकते और फिर से गाड़ी के नीचे जाते किसी ने नहीं देखा था, इस बात का कालू को संतोष था। कालू अपने भ्रम को जिंदा रखकर अपना अहंकार पालते रहना चाहता था, यही उसके जीवन का लक्ष्य था।
कुत्तों में और भी तमाम तरह की आदतें होती हैं। कुछ कुत्ते ऐसे होते हैं, जो अपने मालिक पर भी हमलावर हो जाते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो अजनबियों को देखकर भी आंख मूंदकर लेट जाते हैं। ऐसे कुत्ते भी होते हैं, जो केवल टुकड़ा डालने वाले के आगे पीछे ही दुम हिलाते घूमते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो सब किसी के सामने इसलिए दुम हिलाते रहते हैं कि पता नहीं कौन उसकी थी हिलती दुम पर फिदा होकर उसे रोटी खिला दे। सब कुत्तों का भाव व्यक्त करने का अंदाज ही अलग-अलग नहीं होता है, बल्कि मुद्राएं भी अलग-अलग होती हैं। कुछ कुत्ते मात्र डराने के लिए भोंकते हैं, तो कुछ हर हाल में भगाने के लिए। कुछ ऐसे भी होते हैं जो बिना आहट के पीछे से आ रहे हैं चुपचाप काट लेते हैं। हजारों वर्षों के साथ-साथ रहने की वजह से कुत्तों का इंसानों पर और इंसानों का कुत्तों पर स्वाभाविक रूप से प्रभाव पड़ा होगा। एक दूसरे की आदतों का आदान-प्रदान हो गया होगा। फिलहाल ज्यादा विस्तार में जाने का रिस्क नहीं लेना चाहता हूं और अंत में इतना ही कहता हूं कि चित्रांग और कालू जैसे कुत्ते हर हाल में, हर काल में पाए जाते हैं। इस काल में भी, कलिकाल में तो कुछ ज्यादा ही।