समय के साथ उन बुजुर्गों की आबादी बढ़ती जा रही है, बढ़ती जाएगी जो अपने घरों में उपेक्षा और उत्पीड़न के दमघोटू वातावरण में जीने को मजबूर हैं। इस समय दुनिया भर में जिस आयु वर्ग की आबादी सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रही है, वह है 80 वर्ष या उससे ज्यादा आयु का वर्ग। अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक एशिया में रहने वाले प्रत्येक चार में से एक व्यक्ति 60 वर्ष का होगा।
अपने देश में हुए एक सर्वे में बड़ा दु:खद और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि 90 प्रतिशत बुजुर्गों से तब दुर्व्यवहार किया जाता है जब वे अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए आर्थिक मदद मांगते हैं। यह सच्चाई आज जगजाहिर है कि परिवार के युवा सदस्य अपने बुजुर्गों को बोझ के रूप में देखते हैं। हमारे तथाकथित संस्कारी समाज में एक तिहाई से ज्यादा बुजुर्ग परिवार द्वारा की गई उपेक्षा और शारीरिक उत्पीड़न का शिकार हैं। बुजुर्गों के प्रति उनके अपने ही घर परिवारों में उपेक्षा का भाव तेजी से पनपा है और इस तेजी के थमने के आसार दूर तक नजर नहीं आते हैं।
क्या विडंबना है कि वृद्ध माता-पिता का अपने ही बच्चों से संवाद नहीं हो पा रहा है। दादा-दादी तो घोर उपेक्षा का दंश झेल ही रहे हैं। परिवारों में संवेदनहीनता बढ़ गई है, जिससे हमारे सांस्कृतिक मूल्य छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। परिवार एकाकीपन, उदासीनता और मानसिक तनाव जैसी समस्याओं के मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी उपभोक्तावादी युग में अपने कर्तव्य को भूलती जा रही है। माता-पिता अकेले होते जा रहे हैं और नई पीढ़ी भावनाओं के मामले में बहुत पीछे रह गई है।
आर्थिक विषमताओं के कारण जीवन में आए परिवर्तनों ने संयुक्त परिवार की मजबूत इमारत को ध्वस्त कर के रख दिया है। जब परिवारों का विघटन होता है, तो पारिवारिक मूल्यों की मान्यता समाप्त होती जाती है और संबंधों में सौहार्द के बदले कलह-क्लेश, संघर्ष का वातावरण बन जाता है। यह कहने बताने की आवश्यकता नहीं है कि आज पिता-पुत्र के संबंध-सूत्र मजबूत नहीं रहे हैं, उनमें औपचारिकता और बनावटीपन पूरी तरह से घर कर गया है। ...और मां की स्थिति तो और ज्यादा दर्दनाक हो गई है। एक सर्वे के मुताबिक बुजुर्ग पुरुषों की अपेक्षा 4 प्रतिशत अधिक उत्पीड़न बुजुर्ग महिलाओं का होता है।
कितने दु:ख का विषय है कि आज बुजुर्गों को मृत्यु से उतना भय नहीं लगता जितना अकेलेपन से लगता है। अकेलेपन और बच्चों द्वारा की जाने वाली उपेक्षा की दीमक बुजुर्गों को मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद खोखला बना रही है। संपन्न परिवारों के बुजुर्ग तक आज आंसू बहाते देखे जा सकते हैं। गरीब और मध्यमवर्गीय बुजुर्गों का तो कोई पुरसा हाल है ही नहीं। वृद्धाश्रमों के बुजुर्गों की पीड़ा बयान करने में कलम कांपती है। देश में वृद्धाश्रमों की बढ़ती अप्रत्याशित संख्या संकेत दे रही है कि परिवारों को वृद्धों की जरूरत ही नहीं है।
आज का युवा वृद्धों को निरर्थक और अनुपयोगी समझ रहा है। दादा-दादी, नानानानी वाली पीढ़ी एक समय में भारतीय परंपरा और परिवेश में अतिरिक्त आदर की अधिकारी हुआ करती थी। इन्हीं से परिवार का रुतबा और शान समाज में स्थापित होते थे। मगर आज तो माता-पिता ही बच्चों को बोझ लगने लगे हैं, तो दादा-दादी, नाना-नानी किसी गिनती में कैसे आएंगे। आज बच्चे बुजुर्गों के अनुभवों, सूझबूझ, ज्ञान संपदा और समृद्ध विचारों का लाभ लेने को तनिक भी उत्सुक नहीं दिखाई देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि पुरानी पीढ़ी को नए जमाने के हिसाब से जीने का सलीका नहीं आता है। नई पीढ़ी समझती है कि बुजुर्ग उनके आगे बढ़ने की इच्छाओं के लिए अवरोधक की तरह हैं। नई पीढ़ी यह नहीं सोच पा रही है कि आने वाले समय में उसे भी बूढ़ा होना है और जैसे उपेक्षा उत्पीड़न वह अपने बुजुर्गों का कर रही है, उसी तरह की परिस्थितियों से उसे भी गुजरना होगा। प्रत्येक मानव का जन्म ही एक न एक दिन बूढ़ा होने के लिए हुआ है। इस बात को ध्यान में रखकर यदि युवा वर्ग अपने बुजुर्गों के प्रति व्यवहार करे तो इस स्थिति में सुधार संभव है। लेकिन नई पीढ़ी सब कुछ पाने की अंधी दौड़ में भूल गई है कि कल को वह भी बूढ़ी होगी और उसे भी किसी न किसी पर आश्रित होना होगा। शायद तब उसे पश्चाताप होगा कि उसने अपने बुजुर्गों के साथ अन्याय कर अच्छा नहीं किया था। 'बुजुर्गों की सेवा को प्राथमिकता देने से जीवन में खुशहाली आती है' - ऐसा बुजुर्गों का कहना है शायद इसीलिए युवा इसे मानना पसंद नहीं करते हैं।