Feminism: महिलाएं सजग हैं लेकिन समानता को तरसती हैं!
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 06:24 PM
विनय संकोची
युग नायक स्वामी विवेकानंद जी का नारी समानता के संदर्भ में एक बयान उल्लेखनीय है- 'किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है, वहां की महिलाओं की स्थिति। हमें नारियों को ऐसी स्थिति में पहुंचा देना चाहिए, जहां वे अपनी समस्याओं को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सकें। हमें नारी शक्ति के उद्धारक नहीं वरन् उनके सेवक और सहायक बनना चाहिए। भारतीय नारियां संसार की अन्य किन्हीं भी नारियों की भांति अपनी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता रखती हैं, आवश्यकता है उन्हें उपयुक्त अवसर देने की इसी आधार पर भारत के उज्जवल भविष्य की संभावनाएं सन्निहित हैं।'
आधुनिक भारत में महिलाओं को आधे-अधूरे समानता के अधिकार प्राप्त हैं। इसके बावजूद दूसरे विकासशील देशों की तुलना में हमारे देश में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर है। यद्यपि यह तो नहीं कहा जा सकता कि महिलाओं की स्थिति पूरी तरह से बदल गई है लेकिन पहले की तुलना में इस क्षेत्र में तरक्की तो बहुत हुई है। यह भी सच है कि महिलाओं की स्थिति में सुधार ने देश के आर्थिक सामाजिक सुधार के मायने ही बदल कर रख दिए हैं।
आज महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति बहुत अधिक सजग हैं। अपनी पेशेवर जिंदगी को लेकर बेहद जागरूक हैं। महिला समानता की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन आज भी स्त्री को एक स्त्री से अलग एक शक्ति, एक सहयोगी के रूप में देखने वालों की संख्या बहुत बड़ी नहीं है। इस सोच में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। सामाजिकता के निर्वहन में स्त्री-पुरुष को समान रूप से सहभागी बनना होगा और इसके लिए नारी पुरुष को अपना प्रतिद्वंद्वी ना समझे और पुरुष भी नारी को देह नहीं एक इंसान के रूप में स्वीकार करें। यह वक्त की आवश्यकता है, लेकिन बाजारवाद ने, आधुनिकता ने पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण और अपनी सनातन संस्कृति की उपेक्षा ने नारी के उच्च स्वरूप को विकृत कर दिया है, जिसके बारे में गर्व से कहा जाता था - 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता' भावार्थ है कि जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। नारी शक्ति का सम्मान आवश्यक है। यह होना ही चाहिए लेकिन पूरी क्षमा याचना के साथ एक प्रश्न है कि क्या नारियों को ऐसा श्रेष्ठ आचरण नहीं करना चाहिए, ऐसा आदर्श प्रस्तुत नहीं करना चाहिए, जिससे प्रभावित होकर पुरुष हृदय से उनके प्रति श्रद्धावनत हो जाएं। नारी हो अथवा पुरुष, पूजा उसी की होती है सम्मान उसी का होता है, जो इन गुणों से भरा पूरा हो, आप्लावित हो, जिनके प्रभाव में सामने वाला स्वत: नतमस्तक हो, स्वयं को धन्य समझे।
इस बात पर चिंतित होने की आवश्यकता है कि देश में महिलाओं के प्रति दिन दिन-प्रतिदिन अपराधों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है। आज भी महिलाओं को सामाजिक असुरक्षा और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ रहा है। आज भी तमाम धार्मिक रीति-रिवाजों, रूढ़ियों यौन अपराधों, लैंगिक भेदभाव, घरेलू हिंसा, अशिक्षा, कुपोषण, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज और असमानता का दंश महिलाओं को झेलना पड़ रहा है। वैदिक युग में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त थे। हमने प्रत्येक क्षेत्र में बहुत तरक्की की है। विकासशील से विकसित कहलाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन महिलाओं को समानता का अधिकार देने-दिलाने में पिछड़े हुए हैं, आखिर क्यों? इस क्यों पर चिंतन और चिंता करने की आवश्यकता है। हमें शिक्षा को केंद्र में रखकर महिलाओं के उत्थान की दिशा में भगीरथ प्रयास करने होंगे। शिक्षित में शिक्षित स्त्री न केवल अपना बल्कि परिवार की तीन पीढ़ियों का सर्वतोभद्र कल्याण कर सकती है। नारियों को भी प्रयास कर शिक्षा के प्रति अपने भीतर भूख जगाने का काम करना चाहिए। शिक्षित होंगी तो जागरूक बन कर पुरुषों से समानता का अधिकार ले ही लेंगी, इसमें संशय की कोई गुंजाइश नहीं है।