ठगी करके अरबों रुपय कमाने के बाद ठग बिल्डर अपने आपको तथा अपनी कम्पनी को दिवालिया घोषित कर देते हैं। दिवालिया घोषित हो जाने के बाद ठग किस्म के बिल्डर जीवन भर मौज-मस्ती करते रहते हैं। इन ठग बिल्डरों के हाथों ठगे जाने वाले आम नागरिक तथा बैंक परेशान घूमते रहते हैं।

उत्तर प्रदेश के नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा से लेकर देश भर में ठगी करने वाले हजारों बिल्डर मौज कर रहे हैं। ठगी करके अरबों रुपय कमाने के बाद ठग बिल्डर अपने आपको तथा अपनी कम्पनी को दिवालिया घोषित कर देते हैं। दिवालिया घोषित हो जाने के बाद ठग किस्म के बिल्डर जीवन भर मौज-मस्ती करते रहते हैं। इन ठग बिल्डरों के हाथों ठगे जाने वाले आम नागरिक तथा बैंक परेशान घूमते रहते हैं। केन्द्र सरकार ने ठगी करने वाले बिल्डरों से निपटने के लिए एक नई पहल की है।
यह स्वागतयोग्य है कि ED अर्थात प्रवर्तन निदेशालय ईसाल्वेंसी और बैंकरप्सी बोर्ड के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था करने जा रहा है, जिससे दीवालिया बिल्डरों और उनके प्रवर्तकों की जब्त की गई संपत्तियों से फ्लैट खरीदारों और बैंकों को राहत दी जा सके। ED की ओर से इस संदर्भ में जो मानक संचालन प्रक्रिया बनाई जा रही है, उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि उसके दायरे में बिल्डरों की जब्त संपत्तियां ही आएंगी। अच्छा हो कि इस प्रक्रिया के दायरे में वे दीवालिया कंपनियां और उनके प्रवर्तक भी आएं, जो बैंकों या बाजार से पैसा लेकर किसी भी तरह की धोखाधड़ी के आरोपित हैं। ऐसे आरोपितों की, बड़ी संख्या है। इनमें वे घोटालेबाज भी शामिल हैं, जो अपने कारोबार को विस्तार देने के नाम पर बैंकों से बड़ा लोन लेकर उसे हड़प गए। आम लोगों और बैंकों से पैसा लेकर उसे हजम कर जाने वालों की संपत्तियों को जब्त कर लेना इसलिए पर्याप्त नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इतने मात्र से पीडि़त पक्षों को कोई लाभ नहीं मिलता। दीवालिया कंपनियों और कारोबारियों की जब्त संपत्ति को लेकर जो वैधानिक कार्रवाई शुरू की जाती है, वह आमतौर पर लंबी खिंचती है। इस दौरान पीडि़त पक्ष परेशान होते रहते हैं, क्योंकि अभी नियम यह है कि मामले का निपटारा होने तक जब्त संपत्ति को बेचा नहीं जा सकता। इसका बुरा असर बैंकों, निवेशकों और आम लोगों पर पड़ता है। इसका कोई मतलब नहीं कि घोटालेबाजों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तो शुरू हो जाए, लेकिन उनकी हजारों करोड़ रुपये की जब्त संपत्ति अनुप्रयुक्त पड़ी रहे।
केन्द्र सरकार के वर्तमान प्रयास से भी ज्यादा जरूरी यह है कि ठगी करने वाले बिल्डरों के कारण ठगी का शिकार बने नागरिकों को जल्दी से जल्दी इंसाफ मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए। न्याय का तकाजा यह कहता है कि घपले-घोटाले के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के साथ ही पीडि़तों को यथाशीघ्र राहत देने की भी कोई व्यवस्था हो। बैंक तो तब भी घोटाले में डूबी रकम वापस पाने की प्रतीक्षा कर सकते हैं, लेकिन आम लोग ऐसा नहीं कर सकते। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बड़ी संख्या में ऐसे बिल्डर हैं, जिन्होंने लाखों लोगों को उनके घर का सपना दिखाकर उनके साथ ठगी की। इनमें से अनेक बिल्डरों ने फ्लैट खरीदारों के साथ बैंकों को भी ठगा। अच्छा होगा कि केंद्र सरकार अपनी विभिन्न एजेंसियों के बीच ऐसा समन्वय कायम करे, जिससे बिल्डरों, के साथ-साथ अन्य दीवालिया कंपनियों के मामलों में फंसे अरबों रुपये की वसूली का रास्ता खुले। इसी के साथ ऐसे भी उपाय करने होंगे, जिससे जानबूझकर दीवालिया होने के तौर-तरीकों पर लगाम लगे। कई मामलों में यह देखने में आया है कि घोटालेबाज दीवालिया होने और इस कारण अपनी संपत्ति की जब्ती के बाद भी पहले की तरह ठाठ से रहते हैं। एक समस्या यह भी है कि ऐसे लोगों के मामलों का निपटारा होने में बहुत अधिक समय लगता है।त