हर साल अगस्त महीने के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ दोस्ती का जश्न मनाने के लिए नहीं बल्कि अपने रिश्तों को समझने और उन्हें परखने का भी मौका देता है।

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसे इंसान खुद चुनता है। परिवार हमें जन्म से मिलता है लेकिन दोस्त हमारी पसंद होते हैं। यही वजह है कि सच्चा दोस्त जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है जबकि गलत दोस्त कई बार सबसे बड़ी परेशानी भी बन सकता है। हर साल अगस्त महीने के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ दोस्ती का जश्न मनाने के लिए नहीं बल्कि अपने रिश्तों को समझने और उन्हें परखने का भी मौका देता है। अगर हम भारतीय ग्रंथों की बात करें तो महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने दोस्ती को लेकर ऐसी बातें कही हैं जो आज के दौर में भी पूरी तरह लागू होती हैं। उन्होंने युधिष्ठिर को समझाया था कि हर दोस्त एक जैसा नहीं होता और हर रिश्ते की अपनी एक वजह होती है। अगर इंसान इन बातों को समझ ले तो वह सही और गलत लोगों की पहचान आसानी से कर सकता है।
महाभारत युद्ध के बाद जब भीष्म पितामह बाणों की शैया पर लेटे हुए थे तब युधिष्ठिर ने उनसे जीवन, धर्म और रिश्तों से जुड़े कई सवाल पूछे। इन्हीं सवालों में एक प्रश्न यह भी था कि सच्चा मित्र कौन होता है और किस पर भरोसा करना चाहिए। भीष्म पितामह ने जवाब दिया कि किसी भी इंसान की असली पहचान अच्छे समय में नहीं होती। परिस्थितियां बदलने पर ही पता चलता है कि कौन आपके साथ मजबूती से खड़ा है और कौन सिर्फ अपने मतलब तक आपके करीब था। उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ रिश्ते बदल सकते हैं। कभी कोई करीबी व्यक्ति दूर हो सकता है और कभी कोई अनजान इंसान सबसे बड़ा सहारा बन जाता है। इसलिए दोस्ती को सिर्फ शब्दों से नहीं बल्कि व्यवहार और समय की कसौटी पर परखना चाहिए।
भीष्म पितामह ने बताया कि दुनिया में बनने वाली हर दोस्ती एक जैसी नहीं होती। कुछ रिश्ते स्वार्थ से जुड़ते हैं, कुछ परिवार की वजह से बनते हैं, कुछ दिल से बनते हैं और कुछ परिस्थितियों के कारण। अगर इंसान इन चार प्रकार की दोस्ती को समझ ले तो उसे रिश्तों को लेकर कभी भ्रम नहीं होगा।
कुछ लोग सिर्फ इसलिए दोस्ती करते हैं क्योंकि उन्हें सामने वाले से किसी न किसी तरह का लाभ मिलता है। जब तक उन्हें फायदा मिलता रहता है तब तक रिश्ता भी मजबूत दिखाई देता है लेकिन जैसे ही उनका मतलब पूरा हो जाता है या लाभ मिलना बंद हो जाता है वे धीरे-धीरे दूरी बना लेते हैं। आज के समय में ऐसी दोस्ती सोशल मीडिया, बिजनेस या व्यक्तिगत फायदे के लिए भी देखने को मिलती है। ऐसे लोग बुरे हों, यह जरूरी नहीं है लेकिन उनकी दोस्ती किसी उद्देश्य पर आधारित होती है। इसलिए ऐसे रिश्तों से उम्मीदें सीमित रखना ही समझदारी मानी जाती है।
कुछ दोस्त ऐसे होते हैं जो हमारे परिवार या रिश्तेदारी के कारण जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। चचेरे भाई-बहन, मामा, फूफा, बुआ के बच्चे या परिवार से जुड़े दूसरे लोग अक्सर इसी श्रेणी में आते हैं। इन रिश्तों की शुरुआत दोस्ती से नहीं होती बल्कि परिवार के कारण होती है। समय के साथ इनमें अपनापन बढ़ सकता है और कई बार यही रिश्तेदार हमारे सबसे अच्छे दोस्त भी बन जाते हैं। हालांकि हर पारिवारिक रिश्ता मजबूत हो, ऐसा जरूरी नहीं है। विश्वास और व्यवहार यहां भी उतने ही जरूरी होते हैं।
भीष्म पितामह के अनुसार सबसे स्वाभाविक दोस्ती वही होती है जो बिना किसी लालच के अपनेपन से बनती है। स्कूल, कॉलेज, पड़ोस, ऑफिस या किसी सफर के दौरान बने दोस्त अक्सर इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसी दोस्ती किसी मजबूरी या लाभ के लिए नहीं होती। इसमें एक-दूसरे की खुशी और दुख दोनों साझा किए जाते हैं। मुश्किल समय में जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है वही सहज मित्र कहलाता है। यही दोस्ती सबसे लंबे समय तक टिकती है और जीवन में सबसे ज्यादा सुकून देती है।
कई बार जीवन ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देता है जहां इंसान को अपनी सुरक्षा, काम या किसी बड़े उद्देश्य के लिए ऐसे लोगों से संबंध बनाने पड़ते हैं जिनसे उसका कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता। भीष्म पितामह ने इसे कृत्रिम मित्रता कहा। इसका मतलब यह नहीं कि यह दोस्ती हमेशा गलत होती है, बल्कि यह किसी विशेष परिस्थिति या जरूरत के कारण बनती है। जब वह परिस्थिति खत्म हो जाती है, तो अक्सर ऐसा रिश्ता भी पहले जैसा नहीं रहता।
आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में दोस्त बनाना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। सोशल मीडिया पर हजारों लोग हमारी फ्रेंड लिस्ट में हो सकते हैं लेकिन जरूरत के समय कितने लोग साथ खड़े होंगे, यही असली परीक्षा होती है। भीष्म पितामह की सीख हमें यह समझाती है कि हर मुस्कुराकर बात करने वाला व्यक्ति सच्चा दोस्त नहीं होता। किसी भी रिश्ते को समय, व्यवहार और विश्वास के आधार पर परखना चाहिए। जो व्यक्ति बिना किसी उम्मीद के आपकी खुशी में खुश हो और मुश्किल वक्त में आपका साथ न छोड़े वही असली मित्र कहलाने का हकदार है।
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