गांधी मात्र एक नाम नहीं वरन संपूर्ण पाठशाला है ,अद्वितीय है बाबू
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 09:13 PM
चारूल अग्रवाल
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, सत्य, अहिंसा की प्रतिमूर्ति, महान मानवतावादी, आध्यात्मिक तेज, पुंज, आत्म संयम एवं सादगी की मिशाल, भारतीय मानस को एकता के सूत्र में पिरोकर संगठित करने वाले, जन-जन को जागृत कर स्वातंत्र्यसमर में अपना सर्वस्व त्याग करने के लिए प्रेरित करने वाले, प्रेरणास्रोत, महापुरुष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 153वी जयंती पर प्रस्तुत है उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता आलेख-
'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढालसाबरमती के संत तूने कर दिया कमाल'
हां यह कमाल ही तो था, जिसने बिना शस्त्र उठाए, विश्व की सबसे बड़ी ताकत ब्रिटेन को झुकने पर मजबूर कर दिया और सदियों से परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े हमारे देश भारत को आजाद करा दिया। श्री मोहनदास करमचंद गांधी जी, जिन्हें हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं बापू के नाम से जानते हैं, भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। इनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 काठियावाड़ के पोरबंदर में हुआ था। पिता करमचंद उत्तमचंद गांधी एवं माता का नाम पुतलीबाई गांधी था। वह सत्याग्रह के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे। उनकी इस अवधारणा की नीव संपूर्ण अहिंसा के सिद्धांत पर रखी गई थी। जिसने भारत को आजादी दिला कर संपूर्ण विश्व में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता के प्रति आंदोलन के लिए प्रेरित किया।
उन्हें दुनिया में आम जनता महात्मा गांधी के नाम से जानती है। संस्कृत भाषा में महात्मा अथवा महान आत्मा एक सम्मान सूचक शब्द है। गांधी जी को महात्मा के नाम से सबसे पहले 1915 ईस्वी में राज वैद्य जीवराम कालिदास ने संबोधित किया था। वह महात्मा ही थे, जो कहते थे 'पाप से घृणा करो,पापी से नहीं', जो लक्ष्य और उसे प्राप्त करने के साधन दोनों के पवित्र होने की वकालत करते थे। जो एक गाल पर थप्पड़ मारने पर दूसरा गाल आगे करने को कहते थे, जिसके भजन में अगर ईश्वर था तो अल्लाह भी।
सर्वप्रथम 6 जुलाई 1944 को सुभाष चंद्र बोस ने रंगून रेडियो से गांधीजी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कह कर संबोधित करते हुए आजाद हिंद फौज के लिए उनका आशीर्वाद एवं शुभकामनाएं मांगी थी। संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एवं अपने संपूर्ण जीवन दर्शन में अहिंसा का मार्ग अपनाने के कारण 2 अक्टूबर को 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस'के रूप में भी मनाया जाता है।
जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसको गांधी जी ने अपने विचारों से प्रभावित ना किया हो। जहां दर्शन के क्षेत्र में गांधी दर्शन की बात होती है, वही राजनीति शास्त्र की बात करें तो गांधीजी एक संपूर्ण राजनीतिक विचारक थे, अर्थशास्त्र की बात हो तो गांधी जी का ग्राम स्वराज स्वदेशी आंदोलन ग्रामीण विकास खादी ग्रामोद्योग चर्चा में रहते हैं, अपरिग्रह एवं ट्रस्टीशिप का सिद्धांत जहां एक ओर समाजशास्त्र से जुड़ते हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक अर्थशास्त्र के लिए भी चिंतन का विषय है।
श्री मोहनदास करमचंद गांधी के राजनीतिक जीवन का आरंभ सन 1893 में दक्षिण अफ्रीका से हुआ, जब दादा अब्दुल्ला के बुलावे पर वह उनके मुकदमे की पैरवी करने के लिए दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। उनके दक्षिण अफ्रीका प्रवास की एक घटना अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसने गांधीजी के जीवन और विचारधारा में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में प्रथम श्रेणी के रेलवे कोच में यात्रा कर रहे थे, किंतु उन्हें उस कोच से वैध यात्रा टिकट होने पर भी इस आधार पर बाहर कर दिया गया कि, उनकी रंग व जाति अंग्रेजों जैसी नहीं थी। इस घटना ने गांधी जी को अंग्रेजों की विभेदकारी नीतियों के विरुद्ध आंदोलन के लिए तैयार किया। दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने अंग्रेजों के रंग एवं नस्लभेद के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाया और सफलताएं हासिल की। श्री गोपाल कृष्ण गोखले के आवाहन पर गांधीजी सन 1915 में अफ्रीका से भारत आए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वमान्य नेता बन गए।
सन 1917 और चंपारण सत्याग्रह-
बिहार राज्य के चंपारण में अंग्रेजों द्वारा किसानों से तीन कठिया एग्रीमेंट के तहत नील की खेती कराने के विरोध में यह आंदोलन आरंभ किया गया था। जिसमें गांधी जी को बड़ी सफलता हासिल हुई। गांधी जी के प्रयासों से ब्रिटिश गवर्नर द्वारा इंडिगो कमीशन की नियुक्ति की गई, जिसके एक सदस्य गांधी जी भी थे। कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर न केवल तीन कठिया प्रथा समाप्त हुई, बल्कि किसानों को मुआवजा भी दिया गया। इस आंदोलन की सफलता ने गांधी जी को राजनीतिक नेता के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया । इस आंदोलन के बाद गांधी जी द्वारा गुजरात के खेड़ा जिले में भी अकाल एवं सूखे के कारण फसल ना होने पर भी किसानों से जबरदस्ती लगान वसूली के विरोध में आंदोलन आरंभ किया गया। गुजरात के पाटीदार किसानों से सूखे के कारण उनका उत्पादन एक बटा चार से भी कम रह जाने के बावजूद लगान की जबरन वसूली की जा रही थी। जबकि नियमों के अनुसार यदि फसल एक बटा चार से कम हो तो लगान की वसूली नहीं की जा सकती थी, किंतु न केवल किसानों से जबरन लगान की वसूली की जा रही थी, बल्कि उसमें 23 परसेंट की वृद्धि भी कर दी गई थी, जिसके विरुद्ध यह आंदोलन आरंभ हुआ। गांधीजी द्वारा ब्रिटिश सरकार के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया की जो किसान लगान लेने में सक्षम हो केवल उन्हीं से लगान की वसूली की जाए, बाकी किसानों के लगान माफ कर दिए जाएं। ब्रिटिश सरकार द्वारा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया।
सन 1919 रौलट एक्ट एवं जलियांवाला बाग हत्याकांड
1919 में ब्रिटिश सरकार रौलट एक्ट लेकर आई। जिसमें यह प्रावधान था कि किसी भी व्यक्ति के राज्यद्रोही होने के शक पर ही, उसे जेल में डाला जा सकता था। इस एक्ट के विरुद्ध यह कहा जाता था कि इसमें ना तो वकील है, ना तो दलील और ना ही अपील, केवल जेल की ही व्यवस्था है। इस एक्ट के विरुद्ध अनेक प्रदर्शन हुए। अमृतसर के जलियावाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को एक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में जनरल डायर द्वारा अंग्रेज सिपाहियों के साथ सभा में आए लोगों पर बिना किसी चेतावनी के गोलियां चलाई गई जिसमें 400 लोग मारे गए। इस हत्याकांड से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक नए युग की शुरुआत हुई। यद्यपि कांग्रेस में गरम दल की स्थापना पहले ही हो चुकी थी
सन 1920 असहयोग आंदोलन
1 अगस्त सन 1920 से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अगले चरण के रूप में असहयोग आंदोलन का आरंभ हुआ। जिसमें मुख्य रूप से अंग्रेजों के साथ सहयोग न करने की अपील थी। इस आंदोलन के तहत विद्यार्थियों को अंग्रेजी स्कूलों का बहिष्कार करना था। वकीलों को अंग्रेजी अदालतों में वकालत नहीं करनी थी। अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करना शामिल था। अंग्रेजों की दुकानों से कुछ भी सामान ना खरीदना, अंग्रेजों को किसी प्रकार की सेवाएं न देना, स्वदेशी का प्रचार प्रसार, चरखे पर बने वस्त्रों का प्रयोग, इस आंदोलन की मुख्य विशेषताएं थी । इसी आंदोलन के दौरान गोरखपुर के चौरी चौरा में एक ऐसी घटना घटी, जिससे गांधी जी के अहिंसक मन को अत्यंत चोट पहुंची। गोरखपुर के चौरी चौरा में सिपाहियों के दुर्व्यवहार से छुब्ध होकर प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने थाने में आग लगा दी। जिसमें 22 सिपाही मारे गए। इस हिंसक घटना से व्यथित होकर गांधी जी द्वारा 22 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि गांधीजी को यह आभास हो गया था कि आंदोलन के लक्ष्यों की प्राप्ति ना हो पाने के कारण, आंदोलन हिंसक दिशा में मुड़ रहा है। और अगर आंदोलन हिंसक होता है तो सरकार बलपूर्वक इसे कुचल देगी। जिससे जन सामान्य, जो इस आंदोलन में शामिल है, भयभीत होकर किसी भी तरह के प्रदर्शन और आंदोलनों से पृथक हो जाएगा।
सन 1930, सविनय अवज्ञा आंदोलन
ऐसा नहीं है की सन 1922 में असहयोग आंदोलन वापस ले लिए जाने के बाद देश में राजनैतिक शून्य उत्पन्न हो गया था, अथवा स्वतंत्रता के लिए किए जा रहे प्रयास बंद कर दिए गए थे। किंतु पूरे स्वतंत्रता आंदोलन का वर्ष दर वर्ष लेखा जोखा तैयार किया जाए तो यह लेख अत्यंत विस्तृत हो जाएगा। गांधी जी के नेतृत्व में भारत की स्वतंत्रता के लिए चरणबद्ध रूप से किए गए जन सामान्य की सर्वाधिक सहभागिता वाले आंदोलनों का ही उल्लेख करना ही समीचीन प्रतीत होता है। अंग्रेज शासकों की नीतियों से क्षुब्ध होकर गांधी जी द्वारा 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया गया। पूर्व में गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन में जहां अंग्रेज संस्थाओं एवं अंग्रेजी वस्तुओं से असहयोग का आवाहन किया गया था, वही इस आंदोलन में असहयोग के साथ-साथ अंग्रेज शासकों को करो का भुगतान न किया जाना भी शामिल था। इस आंदोलन का आरंभ गांधी जी द्वारा 12 मार्च 1930 को दांडी यात्रा के द्वारा किया गया। दांडी यात्रा के दौरान गांधी जी द्वारा साबरमती आश्रम से दांडी तक की लगभग 400 किलोमीटर की यात्रा पैदल चलकर 6 अप्रैल 1930 को दांडी में अंग्रेजों की अनुमति के बिना नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा गया, एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया गया।
सन 1942 भारत छोड़ो आंदोलन
सन 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। आरंभ के वर्षों में ब्रिटेन की विरोधी शक्तियां विश्व युद्ध में विजय प्राप्त कर रही थी।।जापान की सेनाएं भारत की सीमाओं तक आ पहुंची थी। भारतीय नेताओं को यह प्रतीत हो रहा था कि भारत में ब्रिटेन का साम्राज्य होने के कारण ही भारत पर जापानी आक्रमण की संभावनाएं बन रही है। यदि ब्रिटेन भारत छोड़कर चला जाए तो जापान उस पर आक्रमण नहीं करेगा, और भारत विश्व युद्ध के घातक प्रभावों से बच जाएगा। अतः 8 अगस्त 1942 को मुंबई के अधिवेशन में गांधी जी के नेतृत्व में भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित हुआ । 9 अगस्त 1942 को ही गांधीजी सहित कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्यों को जेल में डाल दिया गया। यद्यपि यह आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया था, फिर भी उत्तर प्रदेश के बलिया महाराष्ट्र के सतारा एवं बंगाल के मिदनापुर में स्थानीय नेताओं के द्वारा अंग्रेज सरकार को उखाड़ कर, समानांतर खुद की सरकारें स्थापित कर ली गई। यह पहला आंदोलन था जिसमें गांधी जी द्वारा 'करो या मरो' का नारा दिया गया था। अंग्रेजों से स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए और अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश करने हेतु जान की बाजी लगाकर मजदूरों, किसानों, छात्रों, युवाओं एवं सामान्य नर नारियों द्वारा यह आंदोलन चलाया गया। फिर भी देश ने एकजुट होकर इस आंदोलन को चलाया। यद्यपि हजारों लोगों ने अपना बलिदान दिया और हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया। फिर भी आंदोलन लगातार बढ़ता ही गया। अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के उपरांत, 15 अगस्त 1947 को हजारों वर्षो की गुलामी एवं लाखों बलिदानों के बाद हमें स्वतंत्रता की प्राप्ति हुई।
यह विडंबना ही कही जाएगी की अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी का अंत हिंसा के द्वारा हुआ। 30 जनवरी सन 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी जी की हत्या कर दी गई। यद्यपि गांधी जी आज हमारे बीच नहीं हैं, पर गांधीजी मात्र एक व्यक्ति नहीं थे गांधीजी एक विचार हैं, गांधी जी पूरा दर्शन है, गांधीजी एक शाश्वत सत्य है, और सत्य कभी नष्ट नहीं होता। गांधी जी हमेशा जिंदा रहेंगे। हमारे विचारों में, हमारी भावनाओं में, हमारे राजनय और हमारे जीवन दर्शन में गांधीजी सदैव जीवित रहेंगे। हमारे स्वच्छता अभियान में सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास में गांधी जीवित रहेंगे। पंचायती राज व्यवस्था में गांधी जीवित रहेंगे। सस्टेनेबल रूरल डेवलपमेंट में गांधी जीवित रहेंगे। स्वदेशी में गांधी जीवित रहेंगे। वोकल फॉर लोकल में गांधी जीवित रहेंगे। आत्मनिर्भर भारत में आज गांधी जयंती पर गांधीजी को शत शत नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि।
आओ हम सब मिलकर गांधीगिरी करें। बंद करें यह कहना कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी, क्योंकि महात्मा गांधी मजबूरी का नहीं मजबूती का नाम है।