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Hazrat Sheikh Salim Chishti: हजरत शेख सलीम चिश्ती का जन्म 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ था। वे चिश्ती सूफी परंपरा के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। उनका जीवन सादगी, सेवा, प्रेम और आध्यात्मिक साधना के लिए जाना जाता है।

Sheikh Salim Chishti: भारत की सूफी परंपरा में कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हें सदियों बाद भी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है। हजरत शेख सलीम चिश्ती उन्हीं महान सूफी संतों में से एक थे। उनकी पहचान सिर्फ एक धार्मिक गुरु के रूप में नहीं बल्कि ऐसे संत के रूप में भी है जिनके आशीर्वाद ने मुगल इतिहास की दिशा बदल दी। कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर संतान न होने की चिंता से परेशान थे और इसी दौरान वे फतेहपुर सीकरी में रहने वाले सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के पास पहुंचे। संत ने अकबर को पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया और कुछ समय बाद उनके यहां पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम अकबर ने सलीम रखा। यही राजकुमार आगे चलकर सम्राट जहांगीर बना।
हजरत शेख सलीम चिश्ती का जन्म 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ था। वे चिश्ती सूफी परंपरा के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। उनका जीवन सादगी, सेवा, प्रेम और आध्यात्मिक साधना के लिए जाना जाता है। उस समय देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग उनसे मिलने और उनका आशीर्वाद लेने आते थे। उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई थी कि मुगल बादशाह अकबर भी उनसे प्रभावित हुए।
अकबर के कई वर्षों तक कोई पुत्र नहीं हुआ था। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने शेख सलीम चिश्ती से मुलाकात की और उनसे दुआ करने का अनुरोध किया। संत ने अकबर को पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। वर्ष 1569 में अकबर के यहां पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम उन्होंने संत के सम्मान में सलीम रखा। बाद में यही सलीम जहांगीर के नाम से मुगल सम्राट बने। इस घटना के बाद अकबर का शेख सलीम चिश्ती के प्रति सम्मान और बढ़ गया।
शेख सलीम चिश्ती की वजह से ही फतेहपुर सीकरी का नाम इतिहास में विशेष महत्व रखता है। अकबर ने संत के सम्मान में यहां अपना दरबार और राजधानी बसाई थी। कुछ वर्षों तक फतेहपुर सीकरी मुगल साम्राज्य की राजधानी भी रही। यहां बने महल, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा और अन्य इमारतें आज भी उस दौर की कहानी सुनाती हैं।
हजरत शेख सलीम चिश्ती की दरगाह उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में स्थित फतेहपुर सीकरी परिसर के अंदर जामा मस्जिद के प्रांगण में मौजूद है। यह दरगाह विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक धरोहरों में गिनी जाती है। सफेद संगमरमर से बनी यह खूबसूरत दरगाह अपनी नक्काशी और जालीदार डिजाइन के लिए भी मशहूर है। इसे मुगल बादशाह अकबर ने संत के सम्मान में बनवाया था।
दरगाह में आने वाले श्रद्धालु यहां मन्नत का धागा बांधते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए दुआ करते हैं। माना जाता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई दुआ कबूल होती है। यही वजह है कि हर धर्म और समुदाय के लोग यहां आते हैं। दरगाह की संगमरमर की जालियां, सुंदर नक्काशी और शांत वातावरण लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करता है।
अगर आप हजरत शेख सलीम चिश्ती की दरगाह जाना चाहते हैं तो सबसे पहले आगरा पहुंच सकते हैं। आगरा रेलवे स्टेशन और आगरा एयरपोर्ट से फतेहपुर सीकरी की दूरी लगभग 35 से 40 किलोमीटर है। यहां तक टैक्सी, बस और निजी वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता है। फतेहपुर सीकरी रेलवे स्टेशन भी दरगाह के नजदीक है। दरगाह परिसर में प्रवेश करने के बाद कुछ दूरी पैदल चलकर जामा मस्जिद परिसर तक पहुंचना होता है जहां यह दरगाह स्थित है।
करीब साढ़े चार सौ साल बाद भी हजरत शेख सलीम चिश्ती की दरगाह लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र बनी हुई है। यहां रोजाना देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इतिहास, वास्तुकला और आध्यात्मिकता का यह अद्भुत संगम फतेहपुर सीकरी को भारत के सबसे खास धार्मिक और पर्यटन स्थलों में शामिल करता है। हजरत शेख सलीम चिश्ती का जीवन आज भी प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश देता है।
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