Health News : पान के पत्ते में छुपा है अनेक रोगों का निदान!
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 11:46 AM
विनय संकोची
Health : भारत की इतिहास और परंपराओं से गहरे तक जुड़ा पान तांबूली या नागवल्ली नामक लता का पत्ता है। वैज्ञानिक दृष्टि से पान महत्वपूर्ण वनस्पति है। भारत में पान उत्तर पूर्व और दक्षिण में उगाया जाता है। वैज्ञानिक आधार पर पान की पांच प्रमुख प्रजातियां हैं- बांग्ला, मघई, सांची, देशावरी और कपूरी। यह वर्गीकरण पत्तों की रासायनिक गुणों के आधार पर किया गया है पान के औषधीय गुणों का वर्णन 'चरक संहिता' में भी मिलता है। 'हितोपदेश' के अनुसार पान के औषधीय गुण हैं - मुख शुद्धि, अपच, बलगम हटाना और श्वसन संबंधी बीमारियों का निदान।
भारत में सांस्कृतिक दृष्टि से पान का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहां यह आराध्य देव को अर्पित किया जाता है, वहीं श्रृंगार और प्रसाधन के रूप में भी इस्तेमाल होता है। संस्कृत की एक सूक्ति कहती है - तांबूल वातध्न, कृमि नाशक, कफदोषदूरक, मुख-दुर्गंध नाशक और कामाग्नि संदीपक है। पुराणों, संस्कृत साहित्य के ग्रंथों, स्त्रोतों आदि में पान का उल्लेख मिलता है। यहां तक कि वेदों में भी पान के सेवन की पवित्रता का वर्णन है। 'धनवंतरी निघंटु' में पान के 13 ऐसे गुणों का वर्णन है, जो स्वर्ग में भी दुर्लभ है। संस्कृत में तांबूल, तेलुगु में पक्कू, तमिल और मलयालम में वेटिलाई, मराठी में नागवेल और गुजराती में नागुर वेल नाम से प्रसिद्ध पान में वाष्पशील तेलों के अतिरिक्त अमीनो एसिड, कार्बोहाइड्रेट और कुछ विटामिन प्रचुर मात्रा में होते हैं। इन्हीं पोषक तत्वों की मौजूदगी पान को एक औषधि के रूप में प्रस्तुत करती है। पान के पत्तों में प्रोपेन, टैनिन और एंटीफंगल गुण भी होता है, जो पेट के बैक्टीरिया और फंगस को नष्ट करने में सहायता करता है।
आइए जानते हैं पान के गुण-उपयोग के बारे में-
• पान के पत्ते में टैनिन, प्रोपेन और एल्कलाइड होते हैं, जो शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करते हैं। जिससे शरीर अनेक रोगों के जोखिम से बचा रहता है।
• पान डायबिटीज को नियंत्रित करने में मददगार है। सूखे पान के पत्तों के चूर्ण में टाइप-2 डायबिटीज के रोगियों के रक्त में शर्करा की मात्रा को कम करने का गुण होता है। बड़ी बात यह भी है कि इस चूर्ण का कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता है।
• पान का पत्ता बैड कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को कम करने और गुड कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) के स्तर को बढ़ाने में सहायक है। पान के पत्ते में मौजूद प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट, यूजिनॉल, लिपिड को कम करता है, जिससे हृदय को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है।
• पाचन संबंधी समस्याओं के कारण अक्सर गैस्टिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। पान के पत्ते के नियमित सेवन से एसिडिटी की समस्या में राहत मिलती है और इसमें मौजूद एंजाइम पेट के अम्लीय स्तर को कम करके पीएच स्तर को सामान्य बनाने में सहायता करता है।
• पान के कुछ पत्तों को किसी कपड़े की सहायता से कान के चारों ओर कुछ देर बांधने से सिर दर्द में बड़ी राहत मिलती है।
• पान के पत्ते चबाने से लार अधिक बनती है। लार की अधिकता के कारण उसमें पाए जाने वाले एंजाइम खाद्य पदार्थों को अच्छी तरह तोड़ पाते हैं, जिससे पाचन बहुत आसान हो जाता है।
• पान के पत्ते के सेवन से भूख कम या नहीं लगने की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। पान भूख बढ़ाने वाले हार्मोन को सक्रिय करने में सक्षम है, इससे भूख न लगने की परेशानी दूर हो जाती है, साथ ही पाचन प्रणाली भी मजबूत होती है।
• पान के पत्ते पर सरसों का तेल लगाकर गरम करने के बाद सर्दी-खांसी से पीड़ित व्यक्ति की छाती पर रखकर सिकाई करने से राहत मिलती है। छाती और फेफड़ों की अकड़न भी कम होती है।
• पान के सेवन से बैक्टीरिया के कारण दांतों को होने वाले नुकसान को ठीक करने में मदद मिल सकती है। इसके अतिरिक्त मुंह के संक्रमण से भी निजात पाई जा सकती है।
• पान के पत्तों के अर्क का उपयोग कर शरीर की दुर्गंध को दूर किया जा सकता है।
• पान के पत्तों के अर्क में एंटी कैंसर गुण पाए जाते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं को पनपने से रोकने में सहायता कर सकता है।
• पान के पत्तों में एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण होता है, इसलिए पान के उपयोग से सूजन से लड़ने में मदद मिल सकती है।
जरूरी बात : अधिक पान चबाने से रक्तचाप वृद्धि, हृदय गति बढ़ने, पसीना निकलने की शिकायत हो सकती है। गर्भावस्था में पान का सेवन भ्रूण और उसके विकास में हानिकारक हो सकता है। पान के अत्यधिक सेवन से थायराइड की समस्या हो सकती है। पान के पत्तों का अधिक सेवन खाद्य नली और मुंह के कैंसर का कारण बन सकता है। विशेष : यहां पान के पत्तों के गुण व उपयोग के बारे में विशुद्ध सामान्य जानकारी दी गई है। इनकी सफलता का हम कोई दावा नहीं करते हैं। किसी भी रोग के उपचार में पान के पत्तों को औषधि के रूप में इस्तेमाल करने से पहले योग्य चिकित्सक/आयुर्वेदाचार्य से परामर्श आवश्यक और अनिवार्य है। कोई भी घरेलू नुस्खा चिकित्सा परामर्श का विकल्प नहीं है।