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What is Doller: टीवी, अखबार, सोशल मीडिया पर और यहां तक कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों की चर्चा में भी अक्सर सुनने को मिलता है कि "डॉलर मजबूत हो गया" या "रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया"। क्या आपने कभी सोचा है कि ज्यादातर जगह इस्तेमाल होने वाला यह डॉलर है क्या?

अगर दुनिया में किसी एक मुद्रा (Currency) का सबसे ज्यादा नाम लिया जाता है तो वह है डॉलर। टीवी, अखबार, सोशल मीडिया पर और यहां तक कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों की चर्चा में भी अक्सर सुनने को मिलता है कि "डॉलर मजबूत हो गया" या "रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया"। क्या आपने कभी सोचा है कि ज्यादातर जगह इस्तेमाल होने वाला यह डॉलर है क्या? इसकी कीमत कौन तय करता है? दुनिया के लगभग हर देश पर इसका असर क्यों पड़ता है? और भारत के आम लोगों की जिंदगी में डॉलर की भूमिका क्या है? अगर आपके दिमाग में भी इस तरह के सवाल हैं तो इस आर्टिकल में आपको डॉलर से जुड़ी हर जरूरी जानकारी मिल जाएगी। चलिए जानते हैं
डॉलर अमेरिका की आधिकारिक मुद्रा है। जैसे भारत में लेन-देन के लिए रुपया इस्तेमाल किया जाता है वैसे ही अमेरिका में डॉलर का उपयोग होता है। डॉलर को अंग्रेजी में United States Dollar (USD) कहा जाता है और इसे "$" के चिन्ह से दर्शाया जाता है। हालांकि डॉलर सिर्फ अमेरिका में ही नहीं चलता। दुनिया के कई अन्य देश भी डॉलर नाम की मुद्रा का उपयोग करते हैं लेकिन जब हम आर्थिक खबरों में डॉलर की बात करते हैं तो आमतौर पर उसका मतलब अमेरिकी डॉलर से होता है। आज अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे शक्तिशाली और सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा मानी जाती है।
दुनिया के अधिकांश बड़े व्यापार अमेरिकी डॉलर में होते हैं। चाहे कच्चा तेल खरीदना हो, सोना खरीदना हो या अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना हो ज्यादातर सौदे डॉलर में किए जाते हैं। यही कारण है कि लगभग हर देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) में बड़ी मात्रा में डॉलर रखता है। अगर किसी देश को दूसरे देश से सामान खरीदना है तो अक्सर उसे भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। आसान शब्दों में कहें तो डॉलर सिर्फ अमेरिका की मुद्रा नहीं रह गया है बल्कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
बहुत से लोग सोचते हैं कि डॉलर की कीमत अमेरिका की सरकार तय करती होगी लेकिन ऐसा नहीं है। डॉलर की कीमत बाजार में मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होती है। इसे समझने के लिए एक आसान उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए पूरी दुनिया में अचानक अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ जाती है। लोग और कंपनियां ज्यादा डॉलर खरीदने लगती हैं। ऐसे में डॉलर की कीमत बढ़ जाएगी क्योंकि मांग ज्यादा है। वहीं अगर डॉलर बेचने वाले ज्यादा हो जाएं और खरीदने वाले कम हों तो डॉलर की कीमत गिर सकती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी बाजार में किसी चीज की मांग बढ़ने पर उसका भाव बढ़ जाता है।
भारत में डॉलर और रुपये के बीच का मूल्य विनिमय दर (Exchange Rate) कहलाता है। उदाहरण के लिए अगर 1 डॉलर के बदले 86 रुपये मिल रहे हैं तो इसका मतलब है कि 1 USD = 86 INR। यह दर कई कारकों पर निर्भर करती है। यदि विदेशी निवेशक भारत में पैसा लगा रहे हैं तो वे डॉलर बेचकर रुपये खरीदते हैं। इससे रुपये की मांग बढ़ती है और रुपया मजबूत हो सकता है लेकिन अगर निवेशक भारत से पैसा निकालकर अमेरिका ले जाने लगें तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदेंगे। इससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर हो सकता है।
सबसे बड़ा कारण है अंतरराष्ट्रीय व्यापार। दुनिया में कच्चे तेल से लेकर सोना, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य वस्तुओं की खरीद-बिक्री डॉलर में होती है। अगर भारत, जापान, जर्मनी या कोई अन्य देश विदेश से तेल खरीदना चाहता है तो उसे भुगतान अक्सर डॉलर में ही करना पड़ता है। दूसरा बड़ा कारण है अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। वहां की कंपनियां, बैंक और वित्तीय संस्थान वैश्विक स्तर पर प्रभाव रखते हैं। इसलिए निवेशकों का भरोसा डॉलर पर बना रहता है। तीसरा कारण विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) है। दुनिया के ज्यादातर देशों के केंद्रीय बैंक अपने रिजर्व में बड़ी मात्रा में डॉलर रखते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि संकट के समय डॉलर सबसे सुरक्षित मुद्रा मानी जाती है। चौथा कारण वैश्विक भरोसा है। जब दुनिया में युद्ध, आर्थिक संकट या अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक सोने के साथ-साथ डॉलर खरीदना शुरू कर देते हैं। इसलिए डॉलर को 'Safe Haven Currency' भी कहा जाता है। पांचवां कारण अमेरिकी वित्तीय बाजार हैं। दुनिया भर के बड़े निवेशक अमेरिकी बॉन्ड, शेयर बाजार और अन्य निवेश साधनों में पैसा लगाते हैं। इसके लिए उन्हें डॉलर की जरूरत पड़ती है जिससे डॉलर की मांग हमेशा बनी रहती है।
मान लें कुछ समय पहले 1 डॉलर की कीमत 80 रुपये थी और अब 1 डॉलर की कीमत 86 रुपये हो गई है। इसका मतलब यह हुआ कि अब पहले की तुलना में एक डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। वहीं अगर 1 डॉलर की कीमत 86 रुपये से घटकर 82 रुपये हो जाए तो इसका मतलब होगा कि रुपया मजबूत हुआ है।
डॉलर की मजबूती कई कारणों से बढ़ सकती है। जब अमेरिका की अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में होती है वहां रोजगार बढ़ते हैं और निवेशक अमेरिकी बाजार में पैसा लगाना चाहते हैं तब डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इसके अलावा जब दुनिया में आर्थिक संकट या युद्ध जैसी स्थिति पैदा होती है तो निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में डॉलर खरीदते हैं। ऐसे समय में भी डॉलर मजबूत हो जाता है। अमेरिका का केंद्रीय बैंक (Federal Reserve) जब ब्याज दरें बढ़ाता है तब भी दुनिया भर के निवेशक डॉलर की ओर आकर्षित होते हैं और डॉलर की कीमत बढ़ सकती है।
भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है और उसका भुगतान डॉलर में किया जाता है। जब डॉलर महंगा होता है तो भारत को उतना ही तेल खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसका असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा विदेशों से आने वाले कई इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनें और अन्य वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।
जी हां, डॉलर मजबूत होने से कुछ लोगों को फायदा भी मिलता है। जो भारतीय विदेशों में काम करते हैं और डॉलर में कमाई करते हैं उन्हें भारत पैसा भेजने पर ज्यादा रुपये मिलते हैं। इसी तरह जो भारतीय कंपनियां विदेशों में सामान बेचती हैं और डॉलर में भुगतान प्राप्त करती हैं उन्हें भी लाभ हो सकता है क्योंकि उन्हें अधिक रुपये मिलते हैं।
भारत के पास डॉलर कई स्रोतों से आते हैं। जब विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करती हैं तो वे डॉलर लेकर आती हैं। भारतीय कंपनियां जब विदेशों में सामान बेचती हैं तो बदले में डॉलर प्राप्त करती हैं। विदेशों में रहने वाले भारतीय भी अपने परिवारों को डॉलर या अन्य विदेशी मुद्रा भेजते हैं। इन सभी माध्यमों से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर जमा होते हैं।
फिलहाल पूरी तरह से नहीं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा अभी भी डॉलर में होता है। हालांकि हाल के वर्षों में भारत कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है ताकि डॉलर पर निर्भरता कम हो सके। फिर भी आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है।
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उसकी वित्तीय व्यवस्था मजबूत है और वैश्विक व्यापार में उसकी बड़ी हिस्सेदारी है। इसी वजह से निवेशकों और देशों को डॉलर पर भरोसा रहता है। यही भरोसा डॉलर को दुनिया की सबसे प्रभावशाली मुद्रा बनाता है।
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