अगर सरदार वल्लभभाई पटेल न होते तो क्या आज का भारत इतना एकजुट और अखंड दिखाई देता? यह सवाल केवल कल्पना नहीं, बल्कि आजादी के बाद के उस दौर को समझने का जरिया है जब भारत के सामने सैकड़ों रियासतों के एकीकरण की बड़ी चुनौती खड़ी थी।

दृष्टिकोण | वीरेश तिवारी
भारत की आजादी को हम अक्सर 15 अगस्त 1947 की तारीख से जोड़कर देखते हैं। लेकिन क्या अंग्रेजों के भारत छोड़ने के साथ ही भारत का राष्ट्र निर्माण पूरा हो गया था? शायद नहीं। वास्तव में आजादी के बाद भारत के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी थी, जिसका समाधान आने वाले दशकों के भारत का स्वरूप तय करने वाला था। सवाल यह था कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में खड़ा होगा या फिर सैकड़ों रियासतों और अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों में बंट जाएगा? यही वह ऐतिहासिक मोड़ था, जहां सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व भारतीय इतिहास में असाधारण महत्व के साथ सामने आता है।
1947 में ब्रिटिश सत्ता समाप्त होने के साथ ही देशी रियासतों के सामने अपनी राजनीतिक स्थिति तय करने का प्रश्न खड़ा हो गया। उस समय करीब 565 रियासतें थीं। इनमें से प्रत्येक के सामने यह सवाल था कि वह भारत में शामिल होगी, पाकिस्तान के साथ जाएगी या अपनी अलग राह तलाशेगी। यह केवल राजाओं और नवाबों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का विषय नहीं था। इसके पीछे भारत के भविष्य का प्रश्न छिपा था। कल्पना कीजिए कि यदि अलग-अलग रियासतें अपनी स्वतंत्र राजनीतिक व्यवस्था कायम कर लेतीं, तो आज का भारत कैसा होता? क्या एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना उतना ही सहज होता? क्या पूरे देश में एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था संभव होती? क्या आर्थिक नीतियां, व्यापार, सुरक्षा और राष्ट्रीय योजनाएं उसी प्रभावी ढंग से लागू हो पातीं? इन सवालों का जवाब हमें उस दौर के इतिहास को समझकर ही मिल सकता है।
सरदार वल्लभभाई पटेल केवल राजनीतिक भाषणों के नेता नहीं थे। उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी—व्यावहारिक निर्णय लेने की क्षमता। 25 जून 1947 को States Department की स्थापना हुई और सरदार पटेल को इसका प्रमुख बनाया गया। वी.पी. मेनन ने सचिव के रूप में उनके साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों ने मिलकर रियासतों के एकीकरण की जटिल प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। पटेल ने जहां संवाद और समझाइश का रास्ता अपनाया, वहीं आवश्यकता पड़ने पर कठोर राजनीतिक निर्णय लेने से भी पीछे नहीं हटे। उनका उद्देश्य किसी राजा या नवाब को पराजित करना नहीं था। लक्ष्य इससे कहीं बड़ा था—भारत को राजनीतिक रूप से एक रखना।
रियासतों का भारत में विलय कोई आसान प्रक्रिया नहीं थी। हर रियासत की अपनी परिस्थितियां, शासक और राजनीतिक हित थे। जूनागढ़ का प्रश्न हो या हैदराबाद का, परिस्थितियां अलग-अलग थीं। कहीं राजनीतिक जटिलताएं थीं तो कहीं भौगोलिक और सामरिक प्रश्न। ऐसे समय में पटेल की भूमिका केवल एक प्रशासक की नहीं थी। वह ऐसे नेता के रूप में सामने आए, जो यह समझते थे कि राष्ट्र निर्माण केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि स्पष्ट राजनीतिक निर्णयों से भी होता है। यही कारण है कि इतिहास में उन्हें “लौह पुरुष” की उपाधि मिली।
इतिहास में “अगर” का कोई निश्चित उत्तर नहीं होता। फिर भी इतिहास को समझने के लिए कभी-कभी यह सवाल पूछना जरूरी होता है कि यदि कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया गया होता तो परिस्थितियां किस दिशा में जा सकती थीं। अगर रियासतों का व्यापक एकीकरण उस समय नहीं हो पाता, तो संभव है कि भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक अलग-अलग राजनीतिक केंद्र बने रहते। आंतरिक सीमाएं, अलग प्रशासनिक व्यवस्थाएं, व्यापारिक बाधाएं और सुरक्षा संबंधी जटिलताएं भारत के विकास को कहीं अधिक कठिन बना सकती थीं। एक मजबूत केंद्रीय व्यवस्था के लिए भी यह चुनौती होती कि राष्ट्रीय नीतियों को पूरे भूभाग में समान रूप से कैसे लागू किया जाए। इसलिए आज जब हम भारत को एक विशाल और एकीकृत राष्ट्र के रूप में देखते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि यह एकता अपने आप नहीं बनी थी। इसके पीछे आजादी के बाद लिए गए कठिन और दूरगामी निर्णयों की लंबी कहानी है।
यहां इतिहास के साथ संतुलित दृष्टिकोण रखना भी जरूरी है। भारत का निर्माण केवल किसी एक नेता के प्रयासों का परिणाम नहीं था। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव आंबेडकर और असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों तथा प्रशासकों ने अपने-अपने स्तर पर राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि सरदार पटेल की भूमिका को सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने भारत की राजनीतिक एकता को व्यवहारिक रूप देने का काम किया। यही उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक देन थी। आज हम उत्तर प्रदेश से दिल्ली, राजस्थान से गुजरात, महाराष्ट्र से कर्नाटक या किसी भी राज्य में जाते हैं तो हमारे सामने कोई अलग राजनीतिक सीमा नहीं होती। हमारे पास एक संविधान है, एक सर्वोच्च राष्ट्रीय सत्ता है और एक साझा राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था है। आज यह सब स्वाभाविक लगता है। लेकिन आजादी के समय यह स्वाभाविक नहीं था। इसे स्थापित करना पड़ा था। और इसी तथ्य को नई पीढ़ी के सामने रखना जरूरी है। सरदार पटेल को केवल “लौह पुरुष” कह देना उनके योगदान को समझना नहीं है। उनके निर्णयों के पीछे मौजूद राजनीतिक दूरदृष्टि, प्रशासनिक समझ और राष्ट्रीय एकता की भावना को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
आज जब हम भारत के नक्शे को देखते हैं तो हमें एक अखंड भूगोल दिखाई देता है। लेकिन राष्ट्र केवल नक्शे पर खींची गई सीमाओं से नहीं बनता। राष्ट्र बनता है साझा संविधान से, संस्थाओं से, नागरिकों के विश्वास से और उस राजनीतिक इच्छाशक्ति से जो कठिन परिस्थितियों में भी देश की एकता को प्राथमिकता देती है। सरदार पटेल का योगदान इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। उन्होंने यह संदेश दिया कि राष्ट्र की एकता कोई स्वतः मिलने वाली चीज नहीं है। उसे लगातार मजबूत करना पड़ता है।
वीरेश तिवारी के शब्दों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है— “अगर उस समय भारत को जोड़ने वाला इतना दृढ़ नेतृत्व नहीं मिलता, तो क्या आज का भारत इतना एकजुट भारत होता?” इस प्रश्न का निश्चित उत्तर इतिहास नहीं देता, लेकिन इतिहास हमें इतना जरूर बताता है कि 1947 के बाद भारत के सामने एकीकरण की चुनौती वास्तविक थी और सरदार पटेल ने उसे स्वीकार किया। उनके नेतृत्व में रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया ने भारत के राजनीतिक नक्शे को वह स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसकी बदौलत आज हम एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में भारत को देखते हैं। इसलिए सरदार पटेल को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह उस ऐतिहासिक प्रक्रिया को समझना है, जिसने भारत के वर्तमान की नींव रखी। देश का नक्शा केवल जमीन से नहीं बनता। उसे दूरदृष्टि, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना से बनाया जाता है। और शायद यही वह इतिहास है, जिसे नई पीढ़ी को बार-बार पढ़ाना चाहिए।
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