भारत का खजाना खाली होने पर भारत सरकार ने जो क्रांतिकारी कदम उठाया था उस कदम ने भारत की दशा तथा दिशा ही बदल डाली थी।

भारत का खजाना खाली तथा 24 जुलाई का क्रांतिकारी फैसला :
24 जुलाई की तारीख भारत के लिए कोई सामान्य तारीख नहीं है। 24 जुलाई की ही वह तारीख थी जब भारत की सरकार ने क्रांतिकारी फैसला लिया था। यह अलग बात है कि वह 24 जुलाई की तारीख वर्ष 2026 की नहीं बल्कि वर्ष-1991 की थी। उस समय चारों तरफ एक ही शोर था कि भारत का खजाना खाली है। भारत का खजाना खाली होने पर भारत सरकार ने जो क्रांतिकारी कदम उठाया था उस कदम ने भारत की दशा तथा दिशा ही बदल डाली थी।
35 साल पहले लिया गया वह फैसला जिसने भारत की आर्थिक दिशा बदल दी
24 जुलाई 1991 भारतीय गणराज्य के आर्थिक इतिहास की उन चुनिंदा तारीखों में शामिल है, जिसने देश की विकास यात्रा को पूरी तरह बदल दिया। ठीक 35 वर्ष पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में ऐसा बजट और नई आर्थिक नीति पेश की, जिसने दशकों पुराने "लाइसेंस-परमिट राज" को तोड़ते हुए भारत को उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के रास्ते पर आगे बढ़ा दिया। उस समय लिया गया यह निर्णय केवल एक बजट नहीं था, बल्कि भारत की आर्थिक सोच में ऐतिहासिक परिवर्तन था। आज जिस भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, वह 1991 में गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम रह गया था कि देश के पास मुश्किल से दो सप्ताह का आयात करने लायक पैसा बचा था। तेल खरीदना तक कठिन हो गया था और भारत पर अंतरराष्ट्रीय भुगतान चूक (डिफॉल्ट) का खतरा मंडरा रहा था। हालात इतने गंभीर थे कि सरकार को विदेशी ऋण जुटाने के लिए सोना गिरवी रखना पड़ा। ऐसे समय में सरकार ने परंपरागत राजनीति से ऊपर उठकर कठिन लेकिन दूरगामी निर्णय लिया।
1991 के फैसले ने क्या बदला?
नई आर्थिक नीति के तहत कई ऐतिहासिक बदलाव किए गए—
35 वर्षों में भारत कितना बदल गया?
यदि आज के भारत और 1991 के भारत की तुलना की जाए तो अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
आज भारत—
लेकिन हर बदलाव की एक कीमत भी होती है
आर्थिक सुधारों ने अवसर दिए, लेकिन नई चुनौतियां भी पैदा कीं।
क्या अब दूसरी आर्थिक क्रांति का समय है?
35 वर्ष पूरे होने पर सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत को अब "दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों" की आवश्यकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अब सुधारों का फोकस इन क्षेत्रों पर होना चाहिए—
24 जुलाई 1991 का निर्णय केवल आर्थिक नीति नहीं था, बल्कि यह उस राजनीतिक इच्छाशक्ति का उदाहरण था जिसमें तत्कालीन नेतृत्व ने अलोकप्रिय होने का जोखिम उठाकर देश के भविष्य को प्राथमिकता दी। इतिहास बताता है कि बड़े राष्ट्र अक्सर कठिन समय में लिए गए साहसिक फैसलों से ही नई दिशा प्राप्त करते हैं। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब 1991 की भावना को याद करना आवश्यक है। हालांकि, केवल उदारीकरण पर्याप्त नहीं होगा। आने वाले वर्षों की आर्थिक नीतियों का केंद्र समावेशी विकास, रोजगार सृजन, तकनीकी नवाचार, कृषि सुधार और सामाजिक न्याय होना चाहिए। आर्थिक वृद्धि तभी सार्थक होगी जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
35 वर्ष पहले भारत ने आर्थिक संकट से निकलने के लिए साहस दिखाया था। अब चुनौती केवल तेज विकास की नहीं, बल्कि संतुलित, टिकाऊ और न्यायपूर्ण विकास की है। इतिहास का पहला अध्याय 1991 में लिखा गया था; अगला अध्याय आज के नीति-निर्माताओं को लिखना है।
(लेखक चेतना मंच समाचार समूह के संस्थापक, सम्पादक तथा प्रसिद्ध पत्रकार हैं)
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