भगत सिंह का दावा : भाषा भी बन सकती है क्रांति का बड़ा आधार
भारत को आजाद कराने में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का बहुत बड़ा योगदान था। सरदार भगत सिंह के विषय में पूरी दुनिया बहुत कुछ जानती है। भगत सिंह के विषय में सब कुछ जानने का दावा करने वाले बड़े-बड़े जानकार भी उनके विषय में एक महत्वपूर्ण बात नहीं जानते।

Bhagat Singh : भारत को आजाद कराने में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का बहुत बड़ा योगदान था। सरदार भगत सिंह के विषय में पूरी दुनिया बहुत कुछ जानती है। भगत सिंह के विषय में सब कुछ जानने का दावा करने वाले बड़े-बड़े जानकार भी उनके विषय में एक महत्वपूर्ण बात नहीं जानते। लोगों को यह नहीं पता कि भगत सिंह भाषा को लेकर बहुत ही सचेत तथा सतर्क रहते थे। भगत सिंह का स्पष्ट मत था कि हमारी भाषा में वह शक्ति मौजूद है जिसके द्वारा भाषा क्रांति का बड़ा आधार बन सकती है। 23 मार्च को सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि मनाई जाती है। सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि को ‘‘शहीद दिवस” के रूप में मनाया जाता है
सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि शहीद दिवस पर यह जानना जरूरी है
सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि पर यह जानना बेहद जरूरी है कि वें भाषा को कितना महत्व देते थे। आपको बता दें कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह महान क्रांतिकारी, कुशल लेखक और विचारक भी थे, जिन्होंने अपनी कलम से जन-चेतना जगाने का काम किया। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में लिखा, जिसमें हिंदी को भी विशेष महत्व दिया। भगत सिंह की मातृभाषा पंजाबी थी। वे पंजाबी, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और संस्कृत में पारंगत थे सभी भाषाओं में सही ढंग से लिख और पढ़ सकते थे। उनका पहला महत्त्वपूर्ण हिंदी निबंध संभवत: 'पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या' था, जो उन्होंने मात्र 16-17 वर्ष की उम्र में लिखा। यह निबंध पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन की प्रतियोगिता के लिए था, जिसमें उन्हें 50 रुपये का प्रथम पुरस्कार मिला। बाद में यह 28 फरवरी, 1933 को 'हिंदी संदेश' में प्रकाशित हुआ इस लेख में भगत सिंह ने पंजाब की भाषाई समस्या के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण किया और भाषा को मजहबी रंग देने पर दुख जताया।
हिंदी भाषा संस्कार में मिली थी भगत सिंह को
भगत सिंह का जन्म 1907 में उस पंजाब में हुआ, जहां पंजाबी और उर्दू का बोलबाला था, लेकिन हिंदी भी प्रिंट मीडिया और हिंदू परिवारों में व्यापक थी। भगत सिंह का परिवार आर्य समाज से जुड़ा था-उनके दादा सरदार अर्जुन सिंह दयानंद सरस्वती के करीबी थे। कई सिख भी आर्य समाज से जुड़े रहे। इसलिए घर, स्कूल और कॉलेज में हिंदी सीखना स्वाभाविक था। दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. चंद्रपाल सिंह, जो 'भगत सिंह-रीविजिटेड' किताब के लेखक हैं, बताते हैं कि परिवार में हिंदी की परंपरा पहले से मजबूत थी। उन्होंने कई हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं-जैसे, 'प्रताप', 'चांद', 'किरती' आदि में योगदान दिया। छद्म नामों जैसे- 'बलवंत सिंह', 'रणजीत' और 'विद्रोही' से लिखना गिरफ्तारी से बचने का तरीका संकलन नहीं हो सका, जो एक बड़ा नुकसान रहा।
हिन्दी को हथियार बना लिया था भगत सिंह ने
1925 के आसपास भगत सिंह कानपुर गए, जहां गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार 'प्रताप' में काम किया। पीलखाना में प्रेस के पास रहते हुए उन्होंने हिंदी लेखन को और निखारा। 'चांद' पत्रिका ने शहीदों पर विशेषांक निकाला, जिसमें भगत सिंह ने योगदान दिया। हिंदी में उनकी सरल, लेकिन प्रभावशाली शैली से पाठकों की संख्या बढ़ती गई। 'प्रताप' में रहते हुए उन्होंने रिपोर्टिंग भी की। उनके अधिकांश लेख 'किरती', 'प्रताप' और 'चांद' में छपे, जहां वे क्रांतिकारी विचार, राजनीतिक दर्शन और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर लिखते थे। वह पारंपरिक पत्रकार नहीं थे, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान अमूल्य था, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। भगत सिंह की कलम आज भी प्रेरणा देती है-यह बताती है कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम् नहीं, बल्कि क्रांति का हथियार भी हो सकती है। Bhagat Singh
Bhagat Singh : भारत को आजाद कराने में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का बहुत बड़ा योगदान था। सरदार भगत सिंह के विषय में पूरी दुनिया बहुत कुछ जानती है। भगत सिंह के विषय में सब कुछ जानने का दावा करने वाले बड़े-बड़े जानकार भी उनके विषय में एक महत्वपूर्ण बात नहीं जानते। लोगों को यह नहीं पता कि भगत सिंह भाषा को लेकर बहुत ही सचेत तथा सतर्क रहते थे। भगत सिंह का स्पष्ट मत था कि हमारी भाषा में वह शक्ति मौजूद है जिसके द्वारा भाषा क्रांति का बड़ा आधार बन सकती है। 23 मार्च को सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि मनाई जाती है। सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि को ‘‘शहीद दिवस” के रूप में मनाया जाता है
सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि शहीद दिवस पर यह जानना जरूरी है
सरदार भगत सिंह की पुण्यतिथि पर यह जानना बेहद जरूरी है कि वें भाषा को कितना महत्व देते थे। आपको बता दें कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह महान क्रांतिकारी, कुशल लेखक और विचारक भी थे, जिन्होंने अपनी कलम से जन-चेतना जगाने का काम किया। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में लिखा, जिसमें हिंदी को भी विशेष महत्व दिया। भगत सिंह की मातृभाषा पंजाबी थी। वे पंजाबी, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और संस्कृत में पारंगत थे सभी भाषाओं में सही ढंग से लिख और पढ़ सकते थे। उनका पहला महत्त्वपूर्ण हिंदी निबंध संभवत: 'पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या' था, जो उन्होंने मात्र 16-17 वर्ष की उम्र में लिखा। यह निबंध पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन की प्रतियोगिता के लिए था, जिसमें उन्हें 50 रुपये का प्रथम पुरस्कार मिला। बाद में यह 28 फरवरी, 1933 को 'हिंदी संदेश' में प्रकाशित हुआ इस लेख में भगत सिंह ने पंजाब की भाषाई समस्या के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण किया और भाषा को मजहबी रंग देने पर दुख जताया।
हिंदी भाषा संस्कार में मिली थी भगत सिंह को
भगत सिंह का जन्म 1907 में उस पंजाब में हुआ, जहां पंजाबी और उर्दू का बोलबाला था, लेकिन हिंदी भी प्रिंट मीडिया और हिंदू परिवारों में व्यापक थी। भगत सिंह का परिवार आर्य समाज से जुड़ा था-उनके दादा सरदार अर्जुन सिंह दयानंद सरस्वती के करीबी थे। कई सिख भी आर्य समाज से जुड़े रहे। इसलिए घर, स्कूल और कॉलेज में हिंदी सीखना स्वाभाविक था। दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. चंद्रपाल सिंह, जो 'भगत सिंह-रीविजिटेड' किताब के लेखक हैं, बताते हैं कि परिवार में हिंदी की परंपरा पहले से मजबूत थी। उन्होंने कई हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं-जैसे, 'प्रताप', 'चांद', 'किरती' आदि में योगदान दिया। छद्म नामों जैसे- 'बलवंत सिंह', 'रणजीत' और 'विद्रोही' से लिखना गिरफ्तारी से बचने का तरीका संकलन नहीं हो सका, जो एक बड़ा नुकसान रहा।
हिन्दी को हथियार बना लिया था भगत सिंह ने
1925 के आसपास भगत सिंह कानपुर गए, जहां गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार 'प्रताप' में काम किया। पीलखाना में प्रेस के पास रहते हुए उन्होंने हिंदी लेखन को और निखारा। 'चांद' पत्रिका ने शहीदों पर विशेषांक निकाला, जिसमें भगत सिंह ने योगदान दिया। हिंदी में उनकी सरल, लेकिन प्रभावशाली शैली से पाठकों की संख्या बढ़ती गई। 'प्रताप' में रहते हुए उन्होंने रिपोर्टिंग भी की। उनके अधिकांश लेख 'किरती', 'प्रताप' और 'चांद' में छपे, जहां वे क्रांतिकारी विचार, राजनीतिक दर्शन और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर लिखते थे। वह पारंपरिक पत्रकार नहीं थे, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान अमूल्य था, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। भगत सिंह की कलम आज भी प्रेरणा देती है-यह बताती है कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम् नहीं, बल्कि क्रांति का हथियार भी हो सकती है। Bhagat Singh












