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Indian Passport: पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं हैं। यह सवाल बुधवार शाम से इंटरनेट पर कई लोग पूछ रहे हैं। इसने सोशल मीडिया पर एक बहस को जन्म दिया है। आखिर ये पूरा विवाद क्या है?

Indian Passport: भारत का पासपोर्ट क्या भारतीय नागरिकता का सबूत नहीं है। ये सवाल बुधवार शाम से इंटरनेट पर कई लोग पूछ रहे हैं। इसने सोशल मीडिया पर एक बहस को जन्म दिया है। आखिर ये पूरा विवाद क्या है? हम इसे भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव से समझेंगे लेकिन पहले जानते हैं कि यह मुद्दा उठा क्यों।?
बुधवार को कई मीडिया रिपोर्ट्स में विदेश मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी के हवाले से कहा गया कि पासपोर्ट लोगों की नागरिकता का सबूत नहीं है।
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू के मुताबिक विदेश मंत्रालय (MEA) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार (24 जून, 2026) को कहा कि भारतीय पासपोर्ट एक "यात्रा दस्तावेज़" है, न कि "नागरिकता का डॉक्यूमेंट"। अधिकारी ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट का मकसद भारतीयों को विदेशी बंदरगाहों व इलाकों से आने-जाने और यात्रा करने में मदद करना है। इसकी तुलना नागरिकता के अधिकार साबित करने वाले दूसरे दस्तावेज़ों से नहीं की जानी चाहिए।
बयान से मचा हंगामा
विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद हंगामा तो मचना ही था क्योंकि आम समझ यही है कि पासपोर्ट एक व्यक्ति की नागरिकता का सबूत होता है।
मशहूर शायर और फिल्म पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने एक्स पर लिखा, "विदेश मंत्रालय का कहना है कि पासपोर्ट यात्रा का एक दस्तावेज़ है, न कि नागरिकता का सबूत। सच में? तो क्या वे कुछ लोगों को यह यात्रा दस्तावेज इसलिए दे रहे हैं क्योंकि उन्हें पूरा यकीन नहीं है कि वे भारतीय नागरिक हैं? यह बात बेतुकी है।'
शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे ने भी सरकार से ऐसे ही सवाल पूछे। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या हमारा देश गैर-भारतीयों को भी ट्रैवल डॉक्यूमेंट के तौर पर पासपोर्ट देता है?
पूर्व विदेश सचिव ने क्या कहा?
इस मुद्दे पर सबसे संतुलित और विस्तृत टिप्पणी पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव की रही। उन्होंने विस्तार से समझाया कि सरकार के बयान के मायने क्या हैं।
"पासपोर्ट सेवा दिवस पर दिए गए बयान को लेकर समझदारी से ज्यादा गरमा-गरमी देखने को मिली। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पासपोर्ट यात्रा के लिए एक डॉक्यूमेंट है, न कि नागरिकता का दस्तावेज़। कानूनी तौर पर यह बात सही है। पासपोर्ट 'पासपोर्ट एक्ट' के तहत जारी किया जाता है, जबकि नागरिकता 'नागरिकता अधिनियम, 1955' के तहत तय होती है। एक कानून दस्तावेज़ को नियंत्रित करता है, तो दूसरा कानूनी दर्जे को।"
कानूनी सच्चाई vs व्यावहारिक हकीकत
निरुपमा राव ने आगे समझाया कि लेकिन कानून और लोगों की समझ हमेशा एक जैसी नहीं होती। उन्होंने कहा, "ज्यादातर भारतीयों के लिए, पासपोर्ट सबसे भरोसेमंद डॉक्यूमेंट है। इस पर रिपब्लिक ऑफ इंडिया का नाम होता है, धारक की पहचान होती है। इसे दुनिया भर में माना जाता है क्योंकि विदेशी सरकारों को भरोसा होता है कि भारत ने इसे जारी करने से पहले धारक की राष्ट्रियता वेरिफ़ाई कर ली है। इसलिए कई लोग सवाल कर रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है, तो फिर क्या है?
निरुपमा राव लिखती हैं, "पासपोर्ट से नागरिकता नहीं मिलती है। और न ही यह वह कानूनी दस्तावेज़ है जो अदालत में नागरिकता पर सवाल उठने पर उसे पक्के तौर पर तय करता है। कई लोकतांत्रिक देशों की तरह, भारत में भी नागरिकता कानून और पासपोर्ट कानून के बीच फर्क किया जाता है। धोखाधड़ी, माता-पिता के बारे में विवाद या गैर-कानूनी तरीके से नागरिकता हासिल करने जैसे दुर्लभ मामलों में, नागरिकता को 'नागरिकता अधिनियम' के प्रावधानों और सहायक सबूतों के ज़रिए साबित करना पड़ सकता है। इसीलिए कानून की नज़र में पासपोर्ट को हर स्थिति में पक्का सबूत नहीं माना जाता है। लेकिन इस तथ्य से इसका व्यावहारिक महत्व कम नहीं हो जाता है। पासपोर्ट तभी जारी किया जाता है जब सरकार को यह यकीन हो जाए कि आवेदक इसके योग्य है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी और विदेश यात्रा के दौरान, यह भारतीय नागरिकता का सबसे मज़बूत सबूत है जो ज़्यादातर नागरिकों के पास होता है। MEA (विदेश मंत्रालय) के किसी बयान से यह बात नहीं बदलती। नई दिल्ली में दिए गए किसी कानूनी स्पष्टीकरण की वजह से विदेश में कोई भी इमिग्रेशन अधिकारी अचानक भारतीय पासपोर्ट को शक की नज़र से नहीं देखेगा।"
बड़ी चुनौती क्या है?
पूर्व विदेश सचिव लिखती हैं, "भारत में सिविल रजिस्ट्रेशन (नागरिक पंजीकरण) की व्यवस्था कई दशकों तक एक समान रूप से विकसित नहीं हो पाई। लाखों बुजुर्ग भारतीयों का जन्म उस समय हुआ था जब जन्म पंजीकरण प्रक्रिया पूरी नहीं थी। स्कूल के सर्टिफिकेट, ज़मीन के रिकॉर्ड और वोटर लिस्ट में नाम अलग-अलग तरह से दर्ज हो जाते थे। असम एनआरसी के दर्दनाक अनुभव ने दिखाया कि जब नागरिकता ही कानूनी जांच का विषय बन जाती है, तो कागज़ात में गड़बड़ियां कितनी बड़ी मुश्किलें पैदा कर सकती हैं। भारत को ज़्यादा मज़बूत नागरिक पंजीकरण, सभी के लिए जन्म पंजीकरण और भरोसेमंद रिकॉर्ड-रखने की व्यवस्था की ज़रूरत है, ताकि नागरिकता कभी भी कागज़ात की कमी या उनमें गड़बड़ी की वजह से फंस न जाए।
'ये बात ऐसे कही जानी थी'
निरुपमा राव ने कहा, "कभी-कभी कानूनी तौर पर एकदम सही बात भी लोगों में बेवजह घबराहट पैदा कर सकती है, खासकर तब जब उसके साथ कोई साफ-साफ जानकारी न दी जाए। इसे कहने का एक बेहतर तरीका यह हो सकता था: - पासपोर्ट तभी जारी किया जाता है जब सरकार यह पुष्टि कर लेती है कि आवेदक भारतीय नागरिक है। जहां नागरिकता से जुड़े मामले 'नागरिकता अधिनियम' के तहत आते हैं, वहीं पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए देश का सबसे भरोसेमंद दस्तावेज है और आम जीवन में भारतीय नागरिकता का सबसे स्पष्ट प्रमाण है।- यह बात कानूनी तौर पर सही भी है और भरोसा दिलाने वाली भी। देश के सबसे अहम दस्तावेजों में से एक पर जनता का भरोसा भी कम नहीं होना चाहिए। बात का सार यह है:- पासपोर्ट इसलिए जारी किया जाता है क्योंकि सरकार इस बात से संतुष्ट हो जाती है कि आप भारत के नागरिक हैं। इसलिए, आम ज़िंदगी और अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान यह नागरिकता का एक मज़बूत सबूत होता है। लेकिन नागरिकता से जुड़े किसी कानूनी विवाद में, नागरिकता कानून (Citizenship Act) ही लागू होता है, और पासपोर्ट कोई ऐसा पक्का सबूत नहीं है जो बाकी सभी सबूतों से ऊपर हो।"
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