अपनी असाधारण ऊंचाई के कारण, हिमालय-पर के हमारे निकट पड़ोसी तिब्बत ने एक ओर जहां 'दुनिया की छत' की उपाधि प्राप्त की है, वहीं अपनी दुर्गम स्थिति, शेष दुनिया से अलग-थलग बने रहने की परंपरागत नीति और अद्भुत धर्म संस्कृति के कारण उसने संसार के सबसे रहस्यपूर्ण एवं अज्ञात प्रदेश होने की भी ख्याति पाई है। इस क्षेत्र का नाम तिब्बत क्यों पड़ा इस पर भी शोध हुए हैं। प्राचीन काल में कुछ दस्तावेजों के अनुसार इस देश का राजा 'दीबा' कहलाता था, जो लंगूत, तातारों की एक प्राचीन जाति के वंशजों में से एक था। सन 433 ईसवी में तिब्बत के पूर्व में किसी एक राजा ने एक नए साम्राज्य की नींव डाली, जिसे वह 'तुबत' कहता था। तातारी जातियों में एक परिवार विशेष की कई पीढ़ियों तक 'तुबत' के नाम से प्रसिद्ध था, जिसके कारण भी इस भूभाग का नाम 'तिब्बत' हो जाना संभव है।
तिब्बती अपनी उत्पत्ति के विषय में बड़ी रोचक कहानी कहते हैं। यह कहानी प्राचीन काल से प्रचलित है। आदि काल में एक आदमी अपने तीन पुत्रों को साथ लेकर हिमालय के पहाड़ों में घूमा करता था। उस जमाने में अधिक ठंड नहीं पड़ती थी और गरीबी का नामोनिशान नहीं था। चावल अपने आप ही पैदा होता था, चाय के पौधे लहलहाया करते थे। पेड़ों पर खूब फल फूल लगते थे। परंतु बाद में समय बीतने पर गौतम बुद्ध ने शाप देकर उस उपजाऊ प्रदेश को पथरीला और ऊसर बना दिया। उसी समय वह आदमी मर गया। उसके पुत्र पिता की मृत देह पर अधिकार करके अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार उसका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। इसी बात पर तीनों पुत्रों में झगड़ा हुआ। बड़ा पुत्र अपने पिता का सिर लेकर पूर्व की ओर चला गया और उससे चीनियों की उत्पत्ति हुई। मंझला पुत्र मृत पिता के हाथ पैर लेकर मरुभूमि की ओर चला गया, उसकी संतान मंगोल कहलाई। तीसरा और सबसे छोटा लड़का अपने मृत पिता का वक्षस्थल और उदर लेकर वहीं रहने लगा और उसकी संतान तिब्बती कहलाई, जो अपने शील स्वभाव,
स्पष्टवादिता, सहानुभूति तथा वीरता और साहस के लिए विख्यात हुई।
तिब्बत के लोगों की मंत्र-तंत्र और जादू-टोने में आस्था रही है। इनकी धारणा है कि किसी भी प्रकार के दुर्भाग्य, जैसे कारोबार में कमी, रोग, शारीरिक व्याधियां-बाधाएं आदि को मंत्र और जादू टोने के प्रयोग से दूर किया जा सकता है। किसी महान लामा के सिर का बाल या उसके पोशाक का पुराना टुकड़ा मूल्यवान समझकर बड़ी सावधानी से चांदी की डिबिया में रखना तिब्बती बहुत शुभ मानते रहे हैं। भारत की भांति तिब्बत में भी स्वास्तिक का चिन्ह शुभ का प्रतीक माना जाता है। घर के द्वार, दीवार और कड़ियों पर यह चिन्ह अंकित किया जाता है। लोगों का विश्वास है कि स्वास्तिक जीवन का द्योतक होता है। तिब्बत की एक विशेष उल्लेखनीय वस्तु वहां की धार्मिक ध्वजा पताकाएं हैं। वहां ऊंचे खंभों पर हर कहीं छपी पताकाएं फहराती रहती हैं। छोटे-छोटे झंडे जिन पर मंत्र छपे रहते हैं, नदियों या पुलों के आरपार रस्सी में बांधकर लटका दिए जाते हैं। अथवा वृक्षों की टहनियों में बांध दिए जाते हैं। खेत में हल चलाते हैं याक के सींग में भी ऐसी ही एक छोटी सी झंडी बांध दी जाती है ताकि अच्छी पैदावार हो। बड़ी धूमधाम और समारोह के साथ ही धार्मिक पताकाएं फहराई जाती हैं।
तिब्बती स्त्री का अपने पतियों पर विशेष प्रभाव रहता है और घर पर भी उनका ही पूरा नियंत्रण रहता है। प्रत्येक तिब्बती परिवार में संतान की इच्छा बड़ी प्रबल होती है और बच्चों को बड़े लाड प्यार के साथ पाला जाता है। तिब्बती लोगों का विश्वास है कि मृत्यु के बाद उनके धर्म पुरोहित दलाई लामा की आत्मा दूसरे शरीर में पुनर्जन्म लिया करती है।