देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के नाम का नेताओं और राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थ के लिए खुलकर इस्तेमाल किया है। हालत यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों को वर्तमान राजनीति ने दलों में बांट दिया। कोई इस दल का आदर्श हो गया तो कोई उस दल का। तमाम ऐसे स्वतंत्रता सेनानी भी हुए जिन्हें किसी दल ने नहीं अपनाया, जिन्हें दल और उनके नेताओं ने अपना आदर्श नहीं माना, परिणाम स्वरूप उनके नाम, उनके काम, उनके बलिदान की गाथाओं पर विस्मृति की धूल की मोटी परत चढ़ गई। नेता और दल अपनी सुविधा से उन नामों को अपनाते चले गये, जो वोट दिला सकते थे या जिनके नाम के सहारे विपक्ष पर कुठाराघात किया जा सकता था।
आज एक ऐसे ही उपेक्षित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की जन्म जयंती है- जिन्होंने क्रांतिकारियों के लिए बम बनाने का कारखाना लगाने में बड़ी भूमिका निभाई। जिन्होंने अमर शहीद सरदार भगत सिंह के साथ असेम्बली में बम फेंका। जिन्होंने काले पानी की कठोर सजा पायी, भयंकर यातनाएं सहीं और जिन्हें भगत सिंह की मातृश्री अपना बेटा मानती थीं। मैं बात कर रहा हूं क्रांतिवीर बटुकेश्वर दत्त की, जिन्हें अपने अंतिम दिनों में आजीविका के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा और जिन्हें किसी तरह की कोई सहायता सरकार की तरफ से नहीं मिली। दु:ख का विषय तो यह है कि आज भी बटुकेश्वर दत्त की जयंती पर सरकारी स्तर पर याद करने की कोई व्यवस्था नहीं है, शायद इसलिये कि यह नाम वोट बटोरू नहीं है।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लोग शहीद दिवस या जन्म दिन के बहाने याद कर लेते हैं लेकिन बटुकेश्वर दत्त की जिंदगी और स्मृति, दोनों की ही आजाद भारत में घनघोर उपेक्षा हुई। कानपुर में पढ़ाई के दौरान तत्कालीन बंगाल के बर्दवान जिले के ओरी गांव में जन्मे बटुकेश्वर दत्त की सरदार भगत सिंह से 1924 में भेंट हुई। भगत सिंह से प्रभावित दत्त उनके क्रांतिकारी संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन से जुड़ गये। दत्त ने बम बनाना सीखा। आगरा में बम फैक्ट्री बनाई गई, जिसमें दत्त की अहम भूमिका थी।
ब्रितानी संसद में पब्लिक सेफ्टी बिल लाया गया, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों पर नकेल कसना था। इस बिल का विरोध करने के लिए बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ने मिलकर संसद में बम फेंके और स्वेच्छा से गिरफ्तार हो गये। बाद में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हुई जबकि बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा मिली।
फांसी की सजा न मिलने से दत्त ने स्वयं को अपमानित महसूस किया। यह पता चलने पर भगत सिंह ने दत्त के नाम एक पत्र लिखा-‘आप दुनिया को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते हैं बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।’ भगत सिंह ने दत्त को समझाया- ‘मृत्यु सिर्फ सांसारिक तकलीफों से मुक्ति का कारण नहीं बननी चाहिए।’… और बटुकेश्वर दत्त ने अपने प्रिय भगत सिंह की बात मानी। दत्त को अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेजा गया। 1937 में बांकीपुर जेल में पटना लाये गये। 1938 में रिहाई हो गई। फिर दत्त महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और जेल गये। चार साल बाद 1945 में रिहा हुए। 1947 में देश आजाद हो गया।
… बस यहीं से बटुकेश्वर दत्त का जिंदगी केz लिए पीड़ादायक संघर्ष शुरू हो गया। कभी सिगरेट कंपनी के एजेंट बने, कभी टूरिस्ट गाइड बनकर पटना की सड़कों की धूल फांकी। पटना में बसों के परमिट के लिए आवेदन किया, कमिश्नर के सामने पेशी हुई तो उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र मांगा गया। जब यह बात राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पता चली तो कमिश्नर ने दत्त से माफी मांगी। 1964 में दत्त अचानक बीमार पड़े। पटना के सरकारी अस्पताल में उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। इस पर उनके पत्रकार मित्र चमन लाल आजाद ने एक लेख लिखा-‘क्या दत्त जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए। परमात्मा ने इतने महान् शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एडिय़ां रगड़ रहा है और कोई उसे पूछने वाला नहीं है।’
इस लेख से सरकार हरकत में आई लेकिन तब तक दत्त की हालत बहुत बिगड़ गई थी। 24 नवंबर 1964 को उन्न्हें दिल्ली लाया गया। 17 जुलाई 1965 को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 को वे दुनिया को अलविदा कह गये। दत्त की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनका अंतिम संस्कार भगत सिंह की समाधि के पास किया गया। दत्त को आज कितने नेता, कितने दल, कितने चैनल याद करते हैं- यह देखना होगा। मुझे नहीं लगता कोई चैनल दत्त पर कोई कार्यक्रम चलाएगा।